NEET री-एग्जाम की दहलीज पर खड़े देश के 22 लाख छात्रों और उनके सहमे हुए माता-पिता के व्हाट्सएप ग्रुप्स में इस वक्त एक ही सवाल तैर रहा है, क्या सरकार ने टेलीग्राम को इसलिए ब्लॉक किया ताकि पेपर लीक की खबरों को दबाया जा सके? सोशल मीडिया पर इसे 'फ्री स्पीच' और 'सेंसरशिप' से जोड़कर देखा जा रहा है. सरकार के सूत्र इसे लेकर कुछ और ही कहानी कह रहे हैं. आइए समझते हैं क्या है इस बैन के पीछे का सच.
'ब्लैंकेट बैन' नहीं, 'सर्जिकल स्ट्राइक' है!
सबसे पहले यह साफ करना जरूरी है कि टेलीग्राम पर कोई हमेशा के लिए ताला नहीं लगाया जा रहा है. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह एक बेहद सीमित, नपा-तुला और समयबद्ध (Time-bound) फैसला है. ये पाबंदी सिर्फ NEET री-एग्जाम के संवेदनशील विंडो यानी लगभग 22 जून तक के लिए है. इसके बाद, मैसेज एडिटिंग से जुड़े तकनीकी जोखिमों को देखते हुए इस पर 30 जून तक पैनी नजर रखी जाएगी.
इसका निशाना आम यूजर्स या उनकी अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है. इसका टारगेट वह टाइम-विंडो है, जिसमें छात्र सबसे ज्यादा घबराए हुए और मानसिक रूप से कमजोर होते हैं यानी ठीक परीक्षा से कुछ घंटे पहले.
'पेपर लीक' नहीं, यह 'पैनिक करके वसूली' का धंधा है
असल में ग्राउंड रियलिटी यह है कि टेलीग्राम पर "PAPER LEAKED NEET" और "Re-NEET 2026" जैसे बड़े-बड़े नामों से सैकड़ों चैनल्स कुकुरमुत्ते की तरह उग आए थे. ये कोई व्हिसलब्लोअर नहीं हैं जो सच सामने ला रहे हैं, बल्कि ये एक संगठित वित्तीय धोखाधड़ी का इकोसिस्टम चला रहे हैं.
तनाव की कीमत ₹25,000 से ₹10 लाख
डरे हुए छात्रों से फर्जी पेपर के बदले ₹14,000 से लेकर ₹25,000 तक वसूले जा रहे थे. कुछ शातिर वीआईपी ग्रुप्स में तो यह बोली ₹10 लाख रुपये तक जा रही थी. जैसे ही छात्र या परेशान माता-पिता ने पैसे ट्रांसफर किए, उधर से अकाउंट ब्लॉक. कोई पेपर वजूद में था ही नहीं. यह फ्री स्पीच का मुद्दा नहीं, सीधे-सीधे जबरन वसूली (Extortion) का बाजार है, और किसी भी फ्रॉड मार्केट को रेगुलेट नहीं, सीधे बंद किया जाता है.
टेलीग्राम क्यों बना 'ठगों का स्वर्ग'?
आखिर टेलीग्राम ही क्यों? व्हाट्सएप या अन्य ऐप्स क्यों नहीं? इसके पीछे टेलीग्राम का एक खास तकनीकी फीचर है, जिसे स्कैमर्स ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया. बता दें कि टेलीग्राम पर कोई भी एडमिन अपने पुराने से पुराने मैसेज को कभी भी 'एडिट' कर सकता है, और सबसे खतरनाक बात यह है कि इससे मैसेज का मूल टाइमस्टैम्प नहीं बदलता. मान लीजिए, स्कैमर ने 4 जून को एक फर्जी पेपर डाला, तो वह उसे एडिट करके ऐसा दिखा सकता है जैसे उसने वह मैसेज 1 जून (परीक्षा से पहले) ही भेज दिया था.
इस टाइम-ट्रैवलिंग ट्रिक से छात्रों और अभिभावकों को यह भरोसा दिलाया गया कि 'देखो, हमारे पास तो पेपर पहले से ही था.' इस नकली सबूत ने पूरे देश में पैनिक क्रिएट किया.
जब कानून को ठेंगा दिखा दे प्लेटफॉर्म, तो सरकार क्या करे?
भारत सरकार ने इन चैनल्स को एक-एक करके हटाने की कोशिश की, लेकिन टेलीग्राम का एल्गोरिदम ऐसा है कि एक चैनल बंद करो, तो चार नए खड़े हो जाते हैं. सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि टेलीग्राम भारत में एक 'Bad Faith Actor' यानी दुर्भावना से काम करने वाले संगठन की तरह व्यवहार करता रहा है.
भारत में न तो इसका कोई रजिस्टर्ड ऑफिस है, न ही कोई ग्रीवांस ऑफिसर (शिकायत अधिकारी). इस तरह यह भारतीय कानूनों के प्रति पूरी तरह जवाबदेही से बचता रहा है.
संयुक्त राष्ट्र (UNODC) की रिपोर्ट खुद कहती है कि टेलीग्राम वैश्विक स्तर पर चोरी के डेटा, डीपफेक फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग का गढ़ बन चुका है, जिससे हर साल $27-36 बिलियन का अवैध कारोबार होता है. 2025 में वियतनाम भी इसी धोखाधड़ी और ड्रग ट्रैफिकिंग के चलते इसे ब्लॉक कर चुका है.
जब कोई विदेशी प्लेटफॉर्म आपके देश के 22 लाख बच्चों के भविष्य और मानसिक शांति से खिलवाड़ होने दे और कानूनी सहयोग न करे, तो संप्रभु सरकार के पास दखल देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.
भारत का कदम सबसे नरम
अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो परीक्षाओं के दौरान डिजिटल पाबंदियां कोई नई बात नहीं हैं:
इराक बोर्ड परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए पूरे देश का इंटरनेट बंद कर देता है.
केन्या ने राष्ट्रीय परीक्षाओं के दौरान पूरे 3 सप्ताह के लिए टेलीग्राम ब्लॉक किया था.
अल्जीरिया, सीरिया और जॉर्डन जैसे देश हर साल डिप्लोमा परीक्षाओं में सोशल मीडिया ब्लॉक करते हैं.
इनकी तुलना में भारत का एक्शन बेहद छोटा और सटीक है यहां केवल एक ऐप, महज 7 दिनों के लिए, वो भी सिर्फ एक खास परीक्षा को सुरक्षित रखने के लिए कर रहा है.
आजतक एजुकेशन डेस्क