(अदालती लड़ाइयों और नीतिगत फैसलों से परे क्लासरूम, हॉस्टल्स, कोचिंग सेंटरों और घरों में एक समानांतर कहानी चल रही है. कोटा और सीकर से रिपोर्ट करते हुए, यह सीरीज डेटा, जांच, अर्थशास्त्र और एक और मौका पाने की तैयारी कर रहे छात्रों के अनुभवों के जरिए NEET री-टेस्ट के रास्ते को ट्रैक करती है. यह हमारी ग्राउंड रिपोर्ट का पहला भाग है.)
वैसे कोटा जाने वाली नाइट बस कंफर्टेबल होनी चाहिए थी, लेकिन वो थी नहीं. एयर-कंडीशनिंग ठीक से काम नहीं कर रही थी, कंबल बहुत पतले थे और नींद सिर्फ टुकड़ों में आ रही थी. सुबह करीब 7:30 बजे जब बस कोटा में दाखिल हुई, तब तक मैं रात का अधिकांश वक्त अपनी सीट पर करवटें बदलते और सुबह होने का इंतजार करते हुए बिता चुका था.
बाहर शहर धीरे-धीरे जाग रहा था और खुद को एक और नए दिन के लिए तैयार कर रहा था. मैं सड़क किनारे एक स्टॉप पर उतरा, जहां ऑटो-रिक्शा और ई-रिक्शा चालकों की भीड़ के बीच यात्रियों को उतारा जा रहा था. उनमें से एक ने तुरंत मुझे होटल ले जाने की पेशकश की.
जल्द ही मेरा बैग एक ई-रिक्शा में लोड हो गया और हम शहर की सड़कों से गुजरने लगे. इस सफर ने मुझे कोटा की पहली वास्तविक झलक दिखाई, और यह वैसा बिल्कुल नहीं था जैसा मैंने सोचा था. शहर में कोई आपाधापी या भीड़भाड़ महसूस नहीं हो रही थी. सड़कें साफ-सुथरी थीं, कचरे का कोई नामोनिशान नहीं था और दुकानें काफी व्यवस्थित थीं.
यह शहर किसी ऐसे कस्बे जैसा लग रहा था जिसे अस्थायी छात्रों के बजाय लगातार आने वाले पर्यटकों के हिसाब से डिजाइन किया गया हो. फिर भी कोटा, कई मायनों में, पूरी तरह से छात्रों के इर्द-गिर्द बसा शहर है. यहां सब कुछ यानी अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग मार्केट और यहां तक कि ट्रांसपोर्ट नेटवर्क भी, सिर्फ और सिर्फ छात्रों के भरोसे चलता है.
जैसे-जैसे हमारा सफर आगे बढ़ा, कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन दिखने शुरू हो गए. सड़कों के ऊपर हॉस्टल की इमारतें खड़ी थीं. नाश्ते की दुकानें खुल रही थीं और पीठ पर बैग टांगे छात्र कोचिंग सेंटरों की तरफ बढ़ते नजर आ रहे थे.
यहां हर चीज का उद्देश्य केवल एक ही...प्रतियोगी परीक्षाएं
शहर के बड़े-बड़े होर्डिंग्स से शुभम कुमार और कबीर छिल्लर नीचे देख रहे थे, जिनकी तस्वीरें जेईई एडवांस्ड 2026 (JEE Advanced 2026) में टॉप रैंक हासिल करने के बाद कोटा के लैंडस्केप का हिस्सा बन चुकी हैं. पहली बार कोटा आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, खासकर उस छात्र के लिए जो अपने सामान से ज्यादा भारी सपने लेकर आया हो, इन पोस्टरों के आकर्षण और उम्मीदों से बचना नामुमकिन है.
लेकिन कोटा के इस कोचिंग हब में समय बिताने के बाद मुझे अहसास हुआ कि यह शहर सिर्फ छात्रों की ऊर्जा से नहीं चल रहा है. हर अभ्यर्थी के पीछे आमतौर पर एक माता या पिता होते हैं, जो टेस्ट की तारीखों पर नजर रखते हैं, रैंक लिस्ट की चिंता करते हैं, कट-ऑफ पर चर्चा करते हैं और खुद डरे होने के बावजूद बच्चे के सामने शांत दिखने का नाटक करते हैं.
असल में प्रतियोगी परीक्षाओं का यह दबाव क्लासरूम के दरवाजे पर खत्म नहीं होता. ये हॉस्टल के कमरों, पीजी (Paying-Guest) और किराए के अपार्टमेंट्स तक परिवारों का पीछा करता है.
यह हकीकत 21 जून को होने वाले नीट री-एग्जाम (RE-NEET) की तैयारियों के बीच और भी साफ दिखाई दे रही थी. हालांकि मुख्य परीक्षा और उसके बाद हुए पेपर लीक विवाद के बाद बहुत कम छात्र कोटा में रुके थे, लेकिन जो रुके थे, उनके साथ उनके माता-पिता भी डटे हुए थे. उनकी मौजूदगी इस बात की याद दिलाती है कि कोटा में परीक्षाएं कभी भी किसी एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं होतीं. यह पूरे परिवार का एक साझा प्रोजेक्ट बन जाती हैं, जहां अनिश्चितता, उम्मीदें और जागकर बिताई गई रातें सिर्फ छात्र की डेस्क तक सीमित नहीं रहतीं.
मेडिकल या इंजीनियरिंग की सीट के पीछे भागते हुए कोटा पहुंचने वाले लाखों छात्रों में से एक है उत्कर्ष, जिसकी जिंदगी अब केवल कोचिंग शेड्यूल, मॉक टेस्ट और एक ही परीक्षा पर टिके भविष्य के इर्द-गिर्द घूम रही है. कोटा के 'अदृश्य' छात्र 19 वर्षीय उत्कर्ष उत्तर प्रदेश के अपने गृहनगर कानपुर को छोड़कर अपनी मां के साथ कोटा आ गया था. वह भी उन हजारों मेडिकल अभ्यर्थियों में शामिल हो गया जो हर साल एक सरकारी एमबीबीएस (MBBS) सीट की चाह में भारत की इस कोचिंग राजधानी में आते हैं.
उसके परिवार के लिए यह कदम एक पुराने सपने में किया गया निवेश था, कि एक दिन उत्कर्ष सफेद कोट पहनेगा और अपने परिवार का पहला डॉक्टर बनेगा. बीते 3 मई को 22 लाख से ज्यादा छात्र नीट परीक्षा में बैठे थे. परीक्षा के बाद के दिनों में कोटा में चर्चा इस बात पर केंद्रित थी कि पेपर उम्मीद से आसान था और कट-ऑफ बहुत ऊपर जा सकती है.
दूसरी बार नीट की कोशिश कर रहे उत्कर्ष के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट सुरक्षित करने की राह पहले से ही कठिन दिख रही थी. उसे तब यह नहीं पता था कि जल्द ही पेपर लीक के आरोप सामने आएंगे, जिससे इस परीक्षा के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद खड़ा हो जाएगा और यह सवाल उठेगा कि क्या कुछ उम्मीदवारों को गलत तरीके से फायदा मिला है.
जैसे-जैसे पेपर लीक के आरोपों की जांच तेज हुई, उत्कर्ष को याद आया कि परीक्षा वाले दिन ही उसने इंस्टाग्राम पर एक रील देखी थी, जिसमें दिखाया गया कॉन्सेप्ट बिल्कुल वैसा ही था जैसा बाद में नीट के पेपर में आया था. हालांकि वीडियो में दिखाया गया समाधान अलग था, लेकिन मूल सिद्धांत वही था. उसके मुताबिक, वह रील परीक्षा से चार दिन पहले अपलोड की गई थी.
जब पेपर लीक के दावों की जांच बढ़ी, तो उसने देखा कि इसी तरह के सवाल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कई टेलीग्राम चैनलों पर धड़ल्ले से शेयर किए जा रहे थे, जिससे पहले से ही नतीजों को लेकर परेशान छात्रों की चिंता और बढ़ गई.
उत्कर्ष ने बेहद धीमी आवाज में मुझे बताया, 'परीक्षा अच्छी नहीं गई थी. मुझे करीब 550 नंबरों की उम्मीद थी, और पेपर देखने के बाद मुझे लगा कि कट-ऑफ बहुत ऊपर जाएगी. कोटा में कई छात्र कह रहे थे कि 300 से ज्यादा उम्मीदवार परफेक्ट 720 स्कोर कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो हम जैसे बाकी लोगों के लिए सीट पाना और मुश्किल हो जाता है. जब मैंने अपने फीड पर वही सवाल देखा तो मैं स्तब्ध रह गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस पर कैसे रिएक्ट करूं या किसे बताऊं.'
जब वह बोलता है, तो उसका दर्द साफ झलकता है. उत्कर्ष ने महीनों तक एक ऐसी परीक्षा के लिए मेहनत की थी जो केवल योग्यता को पुरस्कृत करने के लिए जानी जाती थी. पेपर लीक की आशंका और कुछ छात्रों को मिलने वाले अनुचित फायदे ने अनिश्चितता को और गहरा कर दिया. कोटा के इस उथल-पुथल भरे माहौल में अकेले संघर्ष कर रहे कई छात्रों के उलट, उत्कर्ष के साथ उसकी मां थीं. परीक्षा से पांच दिन पहले वह कानपुर लौट गया था, लेकिन जब एनटीए (NTA) ने परीक्षा रद्द करके री-नीट (RE-NEET) की घोषणा की, तो वह दोबारा तैयारी करने कोटा आ गया.
परिवार के लिए यह घोषणा मिले-जुले जज्बात लेकर आई थी. इसने स्कोर सुधारने का एक और मौका तो दिया, लेकिन उस मानसिक तनाव को भी दोबारा जिंदा कर दिया जिसे वे पीछे छोड़ चुके थे. जैसे-जैसे परीक्षा की नई तारीख नजदीक आ रही है, वे खुद को उन्हीं सवालों के सामने खड़ा पाते हैं जो विवाद शुरू होने के बाद से बने हुए हैं, क्या इस बार प्रक्रिया निष्पक्ष होगी? क्या कट-ऑफ बदलेगी? और महीनों की इस कड़ी तपस्या के बाद, क्या यह कोशिश आखिरकार उसे मेडिकल सीट दिला पाएगी?
एक मां जो इंतजार करती है...
आज उत्कर्ष और उसकी मां एक साधारण से दो कमरों के मकान में रहते हैं, जिसका किराया बिजली बिल को छोड़कर करीब ₹9,000 प्रति महीना है. कमरा छोटा है लेकिन पूरी तरह से एक ही लक्ष्य के इर्द-गिर्द व्यवस्थित है जहां हर तरफ नोट्स, टेस्ट पेपर्स, किताबें और स्टडी शेड्यूल नजर आते हैं.
हर दिन की शुरुआत एक तय दिनचर्या से होती है. उसकी मां उत्कर्ष से पहले उठती हैं, नाश्ता तैयार करना होता है, दिन के खाने की प्लानिंग करनी होती है और पढ़ाई के घंटे शुरू होने से पहले घर के सारे काम निपटाने होते हैं. बेटे का टाइमटेबल ही अब मां का टाइमटेबल बन चुका है.
कोटा के इस अत्यधिक दबाव वाले कोचिंग इकोसिस्टम में, उन्होंने माता-पिता और सपोर्ट सिस्टम दोनों की भूमिका संभाल रखी है. सुबह जल्दी जगाने और खाना बनाने से लेकर घर के कामकाज संभालना ताकि उनका बेटा सिर्फ एक ही लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सके, वो है-नीट क्रैक करना.
उत्कर्ष की मां कहती हैं कि मैं इस बात का पूरा ध्यान रखती हूं कि वह रोजमर्रा की घरेलू जिम्मेदारियों के कारण विचलित न हो. मेरी कोशिश रहती है कि उसका पूरा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर रहे. नीट पेपर लीक ने छात्रों पर दबाव और बढ़ा दिया है. अब उनमें से कई फिर से तैयारी कर रहे हैं और शुरू से सब कुछ रिवाइज कर रहे हैं.
पूरे कोटा में उत्कर्ष जैसी कहानियां कोई अनोखी बात नहीं हैं. एक दूसरे हॉस्टल के कमरे में, विदुषी और उसकी मां भी महत्वाकांक्षा, अनिश्चितता और त्याग के एक बेहद मिलते-जुलते सफर से गुजर रही हैं.
परीक्षा के साए में जिंदगी
18 वर्षीय विदुषी नीट-यूजी 2024 के विवाद के बाद कोटा आई थी. वह अब अपनी मां के साथ एक हॉस्टल में रहती है. कमरा बड़ा नहीं है, लेकिन इसके भीतर एक पूरी दुनिया समाई हुई है. कोनों में रखी किताबों के ढेर, सीमित जगहों में करीने से रखे कपड़े, टिफिन के डिब्बे, स्टडी मटेरियल... यह दो लोगों की ऐसी दिनचर्या है जो पूरी तरह तैयारी के साए में सिमट चुकी है. जब विदुषी पढ़ाई करती है, तो उसकी मां बाकी सब कुछ संभालती हैं जैसे कपड़े धोना, बाजार के काम, शॉपिंग और खाना बनाना. अगर विदुषी को बाजार से कुछ चाहिए, तो उसकी मां जाती हैं. अगर उसे पढ़ाई से ब्रेक चाहिए, तो मां उसे टहलाने ले जाती हैं.
विदुषी की मां रितु (47 वर्ष) कहती हैं कि स्थिति अच्छी नहीं है. छात्रों ने पिछले दो सालों में बहुत कुछ झेला है. मेरी बेटी विदुषी बहुत डरी हुई है, और उसका यह डर हमें और ज्यादा डरा देता है. वैसे कोटा में डर की चर्चा अक्सर छात्रों के नजरिए से की जाती है. लेकिन यहां पर्याप्त समय बिताने पर एक और हकीकत सामने आती है.
कोटा में कई माता-पिता अपने बच्चों के साथ सिर्फ इसलिए रह रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी अनहोनी का डर है और वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर वे बच्चों को अकेला छोड़ देंगे तो क्या होगा.
यह चिंता हाई-स्टेक्स परीक्षाओं से जुड़ी तीव्र प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता से तो पैदा होती ही है, साथ ही यह उस डर से भी जुड़ी है जिसके बारे में कभी खुलकर बात नहीं की जाती. पिछले कुछ वर्षों में, कोटा छात्रों की आत्महत्याओं (सुसाइड) के कारण बार-बार राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है. हालांकि ऐसी त्रासदियों पर तभी ध्यान जाता है जब वे घटती हैं, लेकिन उनके पीछे छूट जाने वाला स्थायी डर शायद ही कभी चर्चा का विषय बनता है.
उसे उम्मीद है कि इस बार नीट पेपर लीक की कोई खबर सामने नहीं आएगी. उसकी मां उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी हुई हैं. कई माता-पिता ने हमें बताया कि वे अपने बच्चों को अकेला छोड़ने के बजाय उनके साथ कोटा में रहना पसंद करते हैं. यह फैसला हमेशा सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं होता. कई लोगों के लिए, यह बच्चे के पास मौजूद रहने, उनके मूड में आने वाले बदलावों को भांपने, किसी कठिन टेस्ट के बाद उन्हें ढांढस बंधाने और एक बेहद थका देने वाले दिन के अंत में किसी का साथ सुनिश्चित करने के बारे में है.
एक तरह से, कोटा में माता-पिता अपने बच्चों के सफर में 'सह-अभ्यर्थी' बन गए हैं.
उनकी कहानियां अलग हो सकती हैं, फिर भी वे उन हजारों परिवारों के अनुभवों को दर्शाती हैं जो हर साल कोटा आते हैं और अपने रहने के कमरों से कहीं ज्यादा भारी आकांक्षाओं का बोझ उठाते हैं.
परीक्षा हॉल के बाहर की परीक्षा
कोटा के विकास को करीब से देखने वाले एक फैकल्टी मेंबर के अनुसार, री-नीट में शामिल होने वाले 30,000 से अधिक छात्र अभी भी शहर में मौजूद हो सकते हैं. वे कहते हैं कि कई छात्र चले गए और वापस नहीं लौटे, लेकिन एक बड़ी संख्या रुकी भी हुई है. लगभग 80 प्रतिशत छात्र पहले ही घर जा चुके हैं.
जैसे ही लैंडमार्क सिटी (Landmark City) में शाम ढली, सड़कों पर चहल-पहल बढ़ गई. छात्र कोचिंग क्लासों से बाहर आने लगे. बातचीत मॉक टेस्ट, रैंक प्रेडिक्शन और भविष्य के प्लान के इर्द-गिर्द घूम रही थी. हालांकि SRG (Special Rankers Group) के छात्र सड़कों पर बमुश्किल ही दिखाई देते हैं. री-नीट की परीक्षा देने जा रहे एक छात्र राजा सिंह ने जमीनी हकीकत पर रोशनी डाली.
उसने बताया कि SRG ग्रुप के छात्र शायद ही कभी बाहर कदम रखते हैं. वे टच-स्क्रीन फोन तक इस्तेमाल नहीं करते. ज्यादातर कीपैड फोन का इस्तेमाल करते हैं. उनमें से कई पहले ही डॉक्टर बनने का मन बना चुके हैं. वे बहुत आश्वस्त हैं और वे सिर्फ नीट पास करने को लेकर चिंतित नहीं हैं.
रात होते-होते ज्यादातर छात्र अपने कमरों में लौट जाएंगे. और उन कमरों में से कई में कोई उनका इंतजार कर रहा होगा एक माता या पिता जिन्होंने पूरा दिन यह सुनिश्चित करने में बिताया कि बच्चे को कोई परेशानी न हो. डिनर तैयार होगा. कल के शेड्यूल पर चर्चा होगी. सुबह के लिए अलार्म सेट किया जाएगा. आखिरकार परीक्षा हॉल में तो छात्रों को ही बैठना है. लेकिन कोटा में, उस परीक्षा के इर्द-गिर्द का दबाव, अनिश्चितता और उम्मीदें माता-पिता और छात्रों दोनों द्वारा हर एक दिन साझा की जाती हैं.
ऋषभ चौहान