दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में इन दिनों दाखिले का दौर चल रहा है. सीट अलॉटमेंट पोर्टल को बार-बार रीफ्रेश करने की घबराहट, कटऑफ की उलझनें और देश के इस सबसे प्रतिष्ठित अंडरग्रेजुएट इकोसिस्टम में एक सीट पाने की जंग बेहद जानी-पहचानी है. लेकिन 16 जुलाई को जारी हुए कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम (CSAS) के पहले राउंड के शोर-शराबे के बीच एक ऐसी चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है, जो बेहद परेशान करने वाली है. एक RTI के जरिए मिली जानकारी में खुलासा हुआ है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले 31 सालों से कोई भी नया पारंपरिक कॉलेज नहीं खुला है.
डीयू ने आखिरी बार साल 1995 में एक पारंपरिक आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स कॉलेज खोला था, जिसका नाम 'भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज' था. इसके बाद यूनिवर्सिटी में जो भी नए संस्थान जुड़े, वे नर्सिंग स्कूल, डेंटल इंस्टीट्यूट या फिजियोथेरेपी कॉलेज जैसे स्पेशलाइज्ड संस्थान थे. साल 1995 के बाद से ऐसा एक भी कॉलेज नहीं खोला गया जो सामान्य अंडरग्रेजुएट एजुकेशन देता हो, जो कि असल में डीयू की मुख्य पहचान है.
आंकड़ों का खेल: एक-एक सीट के लिए मारामारी
इस साल डीयू में अंडरग्रेजुएट कोर्सेज में एडमिशन के लिए कुल 2,73,751 उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन कराया था. इनमें से 2,18,284 छात्रों ने फेज-1 की प्रक्रिया पूरी की और 2,08,043 छात्रों ने अपने कोर्स और कॉलेज की प्राथमिकताओं (Preferences) को लॉक किया.
सीटों का गणित समझिए
डीयू के 69 कॉलेजों और विभागों में कुल 73 प्रोग्राम्स के तहत सिर्फ 71,624 सीटें ही उपलब्ध हैं. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हर एक सीट पर करीब 3.8 रजिस्टर्ड आवेदक हैं. अगर सिर्फ उन गंभीर दावेदारों की बात करें जिन्होंने अपनी चॉइस लॉक की है, तो भी हर एक सीट के लिए लगभग 2.9 (करीब 3) छात्रों के बीच कड़ा मुकाबला है. कॉलेजों के विस्तार न होने की वजह से छात्रों पर यह दबाव हर साल बढ़ता ही जा रहा है.
तीन दौर में बंटी दिल्ली यूनिवर्सिटी की कहानी
RTI से मिले डेटा के मुताबिक, दिल्ली यूनिवर्सिटी के विकास के सफर को साफ तौर पर तीन अलग-अलग दौर में देखा जा सकता है:
पहला दौर (1881-1946): नींव रखने का समय (कुल 8 कॉलेज)
यह वह दौर था जिसने दिल्ली यूनिवर्सिटी को उसके 'नगीने' दिए, जिनके नाम आज भी हर छात्र की जुबान पर रहते हैं. साल 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज की शुरुआत हुई, जिसके बाद 1899 में हिंदू कॉलेज, 1917 में रामजस कॉलेज, 1924 में इंद्रप्रस्थ महिला कॉलेज, 1925 में जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज और 1926 में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) वजूद में आए. एक सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ये कॉलेज देश के टॉप स्कोरर्स की पहली पसंद बने हुए हैं.
दूसरा दौर (1947-2000): महा-विस्तार का दौर (कुल 76 कॉलेज)
आजादी के बाद के दशकों में डीयू ने जिस रफ्तार से विस्तार किया, वैसी गति फिर कभी नहीं देखी गई. साल 1948 में हंसराज कॉलेज और मिरांडा हाउस खुले. इसके बाद 1956 में लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वुमेन, 1957 में किरोड़ीमल कॉलेज, 1961 में श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, 1967 में गार्गी कॉलेज और 1968 में जीसस एंड मैरी कॉलेज की स्थापना हुई. यह रफ्तार 20वीं सदी के अंत तक जारी रही, जिसमें 1987 में शहीद सुखदेव कॉलेज ऑफ बिजनेस स्टडीज और 1990 में दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज खुले. इस सुनहरे दौर का अंत 1995 में भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज के साथ हुआ, जो डीयू का आखिरी पारंपरिक अंडरग्रेजुएट कॉलेज साबित हुआ.
तीसरा दौर (2001-2019): विस्तार पर लगी 'ब्रेक' (महज 7 संस्थान)
साल 1995 के बाद सब कुछ बदल गया. अगले दो दशकों में डीयू से सिर्फ सात नए संस्थान जुड़े और ये सभी हेल्थकेयर, शिक्षा या रिहैबिलिटेशन से जुड़े प्रोफेशनल कॉलेज थे. इनमें स्कूल ऑफ रिहैबिलिटेशन साइंसेज (2002), दुर्गाबाई देशमुख कॉलेज ऑफ स्पेशल एजुकेशन (2006), होली फैमिली कॉलेज ऑफ नर्सिंग (2011), मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज (2013) और फ्लोरेंस नाइटिंगेल कॉलेज ऑफ नर्सिंग (2019) शामिल हैं. इनमें से एक भी पारंपरिक आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स कॉलेज नहीं था.
अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में कैसा रहा विस्तार?
RTI के आंकड़ों से साफ है कि सरकारों के बदलने के बाद भी पारंपरिक कॉलेजों को लेकर रवैया एक जैसा ही रहा:
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (1998-2004): इस दौरान 3 संस्थान जोड़े गए. ये इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (1998), अमर ज्योति इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोथेरेपी (1999) और स्कूल ऑफ रिहैबिलिटेशन साइंसेज (2002) तीनों ही हेल्थकेयर से जुड़े थे.
मनमोहन सिंह सरकार (2004-2014): इस कार्यकाल में 5 नए संस्थान दुर्गाबाई देशमुख कॉलेज ऑफ स्पेशल एजुकेशन (2006), होली फैमिली कॉलेज ऑफ नर्सिंग (2011), चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय (2012), कॉलेज ऑफ नर्सिंग-आर्मी हॉस्पिटल (2013) और मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज (2013) आए. यानी नर्सिंग, डेंटिस्ट्री और स्पेशल एजुकेशन पर ही फोकस रहा.
नरेंद्र मोदी सरकार (2014 से अब तक): साल 2014 के बाद से डीयू में सिर्फ एक संस्थान जोड़ा गया, जो कि 2019 में खुला 'फ्लोरेंस नाइटिंगेल कॉलेज ऑफ नर्सिंग' था. पहले की तरह यह भी एक स्पेशलाइज्ड हेल्थकेयर कॉलेज ही था.
क्या इस साल बदलेगी तस्वीर? वीर सावरकर कॉलेज से जगी उम्मीद
कागजों पर अब थोड़े बदलाव की उम्मीद नजर आ रही है. 3 जनवरी 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डीयू के दो नए परिसरों की आधारशिला रखी थी और 'वीर सावरकर कॉलेज' खोलने की घोषणा की थी. चूंकि यह कॉलेज अभी पूरी तरह चालू नहीं हुआ है, इसलिए इसका जिक्र आरटीआई के आंकड़ों में नहीं है.
हालांकि, हालिया रिपोर्ट्स (27 जून 2026) के मुताबिक, नजफगढ़ में बनने वाला यह वीर सावरकर कॉलेज इसी साल से काम करना शुरू कर सकता है, लेकिन इसकी कक्षाएं अपनी खुद की बिल्डिंग में नहीं चलेंगी. कैंपस का निर्माण कार्य अभी अधूरा होने के कारण डीयू इस नए कॉलेज की क्लासेज को दीन दयाल उपाध्याय (DDU) कॉलेज के कैंपस से चलाने की योजना बना रहा है. डीडीयू कॉलेज ने डीयू के अनुरोध पर इसके लिए सहमति दे दी है और अब यूनिवर्सिटी से औपचारिक मंजूरी का इंतजार है. योजना के मुताबिक, शुरुआत सिर्फ फर्स्ट ईयर के छात्रों के साथ की जाएगी. अगर ऐसा होता है, तो साल 1995 के बाद यह पहला मौका होगा जब डीयू में पारंपरिक कोर्सेज के लिए अंडरग्रेजुएट सीटों का इजाफा होगा.
अशोक उपाध्याय