भारत को रक्षा और ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और बड़ी कामयाबी मिली है. देश में ही विकसित किए जा रहे भारी-भरकम वजन उठाने वाले (हैवी-लिफ्ट) ड्रोन प्रोजेक्ट 'SABAL-200' को केंद्र सरकार की ओर से ₹30.01 करोड़ का फंड मंजूर किया गया है.
यह वित्तीय प्रोत्साहन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के रिसर्च एंड डेवलपमेंट इनिशिएटिव (RDI) फंड के तहत दिया गया है. इस बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर नोएडा की जानी-मानी यूएवी (UAV) स्टार्टअप कंपनी 'एंड्योरएयर सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड' (EndureAir Systems) काम कर रही है.
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इस रकम का इस्तेमाल SABAL-200 ड्रोन को 'टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल-5' (TRL 5) से एडवांस करके 'TRL 9' तक पहुंचाने में किया जाएगा. मतलब यह है कि अब यह ड्रोन केवल एक प्रयोगशाला का मॉडल नहीं रहेगा, बल्कि इसे अत्याधुनिक अनुसंधान, बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग, तकनीकी अपग्रेडेशन और जमीन पर कड़े फील्ड-टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से गुजारकर सेना और नागरिक सेवाओं के लिए पूरी तरह तैयार कर दिया जाएगा.
क्या है SABAL-200 और क्यों है यह इतना खास?
SABAL-200 एक वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (VTOL) अनमैन्ड एरियल सिस्टम है. इस ड्रोन को उड़ान भरने या उतरने के लिए किसी हवाई पट्टी या रनवे की जरूरत नहीं होती; यह एक हेलीकॉप्टर की तरह सीधे एक ही जगह से ऊपर उठ सकता है और कहीं भी उतर सकता है. यह खूबी इसे भारत के पहाड़ों, जंगलों और तटीय इलाकों के लिए सबसे उपयुक्त बनाती है.
अगर इसकी तकनीकी क्षमताओं की बात करें, तो यह ड्रोन अपने आप में बेजोड़ है...
इस ड्रोन को इतनी ताकत देने के लिए इसमें 'वेरिएबल-पिच रोटर आर्किटेक्चर', एक शक्तिशाली टर्बोचार्ज्ड इंटरनल कम्बशन इंजन और एक बेहद एडवांस मैकेनिकल पावरट्रेन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है. यह कॉम्बिनेशन इसे बेहद खराब मौसम और कम ऑक्सीजन वाले पहाड़ी इलाकों में भी लंबी दूरी की भारी-भरकम उड़ानें भरने की ताकत देता है.
सेना और सिविल दोनों क्षेत्रों में मचेगी हलचल
SABAL-200 का मुख्य उद्देश्य उन दुर्गम इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों में रसद (लॉजिस्टिक्स) पहुंचाना है, जहां पारंपरिक वाहनों, गाड़ियों या सामान्य हेलीकॉप्टरों का पहुंचना बेहद कठिन या जोखिम भरा होता है. इसके उपयोग को दो मुख्य भागों में देखा जा रहा है...
सैन्य और रक्षा उपयोग: भारत की सीमाएं लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे अत्यंत ऊंचे और बर्फीले पहाड़ों से सटी हैं. सर्दियों में इन फॉरवर्ड पोस्ट (अग्रिम चौकियों) का संपर्क कट जाता है. ऐसे समय में SABAL-200 ड्रोन हमारे सैनिकों के लिए जीवनरक्षक साबित होगा. यह बिना किसी मानवीय जोखिम के हथियार, गोला-बारूद, दवाइयां और राशन सीधे अग्रिम मोर्चों तक पहुंचा सकेगा.
नागरिक (सिविल) उपयोग: आपातकालीन स्थितियों, जैसे बाढ़, भूकंप या भूस्खलन के समय यह ड्रोन संकटमोचक की भूमिका निभाएगा. इसके जरिए प्रभावित इलाकों में भारी मात्रा में राहत सामग्री और मेडिकल किट भेजी जा सकेगी. इसके अलावा, देश के बुनियादी ढांचे के विकास और उन जगहों पर सप्लाई चेन को बनाए रखने में भी इसकी मदद ली जाएगी जहां रास्ते नहीं बने हैं.
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IIT कानपुर की नर्सरी से निकला स्वदेशी 'बाहुबली'
SABAL-200 की सफलता के पीछे एक लंबी तकनीकी यात्रा है. इसे बनाने वाली कंपनी 'एंड्योरएयर सिस्टम्स' की शुरुआत साल 2018 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के इकोसिस्टम के भीतर हुई थी. संस्थान के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इसे खास तौर पर भारत की भौगोलिक परिस्थितियों, जैसे सियाचिन की हाड़ कंपाने वाली ठंड और थार की झुलसाने वाली गर्मी को ध्यान में रखकर डिजाइन किया है.
SABAL-200 से पहले कंपनी इसके छोटे वर्जनों- SABAL-20 और SABAL-40 का सफल निर्माण कर चुकी है. ये दोनों छोटे ड्रोन पहले से ही भारतीय सेना और नागरिक सेवाओं में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में इनका प्रदर्शन बेहतरीन रहा है. अब 200 किलो क्षमता वाले बड़े भाई के आ जाने से भारत की वायु-परिवहन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव आएगा.
शिवानी शर्मा