भारतीय शेयर बाजार का माहौल खराब है, पिछले करीब 20 महीने से बाजार एक दायरे में कारोबार कर रहा है. इस बीच अब निवेशकों का धैर्य जवाब दे रहा है, आखिर कब तक इंतजार करें. फिलहाल भारतीय भारत में दबाव का सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली है. पिछले कुछ महीनों से विदेशी संस्थागत निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली से बाजार बिल्कुल संभल नहीं पा रहा है.
अब सवाल उठता है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर दूसरे बाजारों में क्यों ले जा रहे हैं? विदेशी निवेशकों ने साल 2025 में 1.60 लाख करोड़ रुपये और इस साल अभी तक 2.20 लाख करोड़ रुपये भारतीय बाजार से निकाल चुके हैं. इनके भारतीय बाजार से मोहभंग के क्या कारण हैं और क्या इन्हें रोका जा सकता है? फिलहाल FII के भारतीय बाजार से भागने के पीछे मुख्यतौर पर 3 कारण हैं.
1. रुपया कमजोर होने से FII को नुकसान
विदेशी निवेशकों के लिए सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि भारतीय शेयर कितना दौड़ रहा है, बल्कि यह भी मायने रखता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कैसा प्रदर्शन कर रहा है. रुपया कमजोर होने से FII का मुनाफा कम हो जाता है.
एक उदाहरण से समझते हैं, मान लीजिए किसी FII ने भारत में डॉलर को रुपये में बदलकर निवेश किया और उसे स्टॉक मार्केट से 10% का शानदार रिटर्न मिला. लेकिन इसी दौरान अगर डॉलर के मुकाबले रुपया 4 से 5 फीसदी कमजोर हो गया, तो जब वह अपना पैसा वापस डॉलर में बदलकर अपने देश ले जाएगा, तो उसका वास्तविक मुनाफा घटकर सिर्फ 5 से 6 फीसदी ही रह जाएगा.
दरअसल, कमजोर रुपया FII के मुनाफे को सीधे खा जाता है, जब रुपया लगातार रिकॉर्ड निचले स्तरों की तरफ फिसलता है, तो विदेशी निवेशक अपने पोर्टफोलियो को करेंसी लॉस से बचाने के लिए भारतीय बाजार से पैसा निकालना ही समझदारी मानते हैं.
2. ट्रेडिंग कॉस्ट से FII परेशान
इसी साल बजट में केंद्र सरकार की ओर से फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) और शेयरों की खरीद-बिक्री पर STT (Securities Transaction Tax) में बढ़ोतरी की गई, उससे FII के मुनाफे पर सीधा असर पड़ा है. यानी ट्रेडिंग कॉस्ट बढ़ गया है. FII पूरी दुनिया के बाजारों में पैसा लगाते हैं. वे देखते हैं कि किस देश में निवेश करने की लागत कितनी है. भारत में टैक्स बढ़ने से यहां ट्रेडिंग करना दुनिया के कई अन्य इमर्जिंग मार्केट्स के मुकाबले काफी महंगा हो गया है.
बढ़े हुए टैक्स ने निवेशकों के सेंटीमेंट को बिगाड़ दिया है. जब बड़े फंड्स को लगता है कि उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में चला जाएगा, तो वे अपने फंड को ऐसे बाजारों में शिफ्ट कर देते हैं, जहां टैक्स स्ट्रक्चर भारत के मुकाबले कम हैं.
3. भारतीय कंपनियों की अर्निंग पर दबाव
बाजार की रिकॉर्ड तेजी को सही ठहराने के लिए कंपनियों का मुनाफा भी उसी रफ्तार से बढ़ना चाहिए. लेकिन पिछली कुछ तिमाहियों के नतीजे इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं. खासकर भारतीय आईटी सेक्टर दबाव में है, वैसे तो दुनियाभर में टेक कंपनियां AI की वजह से परेशान दिख रही हैं. शहरी मांग में सुस्ती, बढ़ती इनपुट कॉस्ट और मार्जिन पर दबाव के कारण कंपनियों के नतीजे ठंडे रहे हैं. फिर FII ऐसी कंपनियों पर दांव लगाने से हिचक रहे हैं.
जब वैल्यूएशन महंगा हो और अर्निंग्स में कमजोरी दिखने लगे, तो FII को समझ आ जाता है कि बाजार में अब शॉर्ट-टर्म में और बड़ी तेजी की गुंजाइश कम है. ऐसे में वे रिस्क कम करने के लिए मुनाफावसूली मोड में आ जाते हैं.
यही वजह है कि विदेशी निवेशक इस समय भारत से पैसे निकालकर चीन जैसे सस्ते बाजार या अमेरिका जैसे सुरक्षित बॉन्ड मार्केट्स में लगा रहे हैं. जब तक इन तीनों मोर्चों पर चीजें स्थिर नहीं होती हैं, बाजार में FII की तरफ से बड़ी और लगातार खरीदारी की उम्मीद थोड़ी कम है. विदेशी निवेशकों (FII) का सीधा फॉर्मूला है, 'महंगे बाजार से मुनाफावसूली करो और सस्ते बाजार में पैसा लगाओ.'
क्या STT पर विचार करेगी सरकार?
बाजार में जारी इस गिरावट और FII के पलायन के बीच निवेशकों में पर यह चर्चा जोरों पर है कि क्या सरकार ट्रेडर्स और निवेशकों को राहत देने के लिए STT (सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स) में कोई कटौती या बदलाव करेगी. मार्केट पार्टिसिपेंट्स और ट्रेडर्स का मानना है कि बजट में बढ़ाए गए STT के कारण भारत में ट्रेडिंग की लागत दुनिया के कई बड़े बाजारों के मुकाबले बहुत ज्यादा हो गई है.
हालांकि आमतौर पर सरकार रेवेन्यू कलेक्शन के मोर्चे पर बहुत आसानी से पीछे नहीं हटती है, क्योंकि STT से सरकार को एक तय और मोटा टैक्स रेवेन्यू मिलता है. लेकिन बाजार में बढ़ते दबाव को कम करने के लिए सरकार टैक्स स्ट्रक्चर की समीक्षा जरूर कर सकती है. खबर ये भी है कि सरकार आने वाले समय में STT या लॉन्ग टर्म/शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दरों में कुछ राहत देकर सेंटीमेंट बदल सकती है.
अमित कुमार दुबे