क्या देश की राजधानी दिल्ली का रियल एस्टेट मार्केट अपने सबसे बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. यह एक ऐसा सवाल है जो आज हर घर खरीदने वाले, निवेशक और रियल एस्टेट विश्लेषक के मन में है. एक तरफ जहां दिल्ली में जमीन खत्म होने की बातें कही जा रही हैं और लाखों लोग गुड़गांव या नोएडा का रुख कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञ इसे अब भी देश का सबसे स्थिर और परिपक्व बाजार मान रहे हैं.
आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में रियल एस्टेट एक्सपर्ट पवनदीप सिंह के साथ हुई बातचीत में दिल्ली, गुड़गांव और नोएडा के रियल एस्टेट बाजारों के कई अनकहे और दिलचस्प पहलू सामने आए हैं.
आमतौर पर यह माना जाता है कि दिल्ली का बाजार अब सैचुरेट हो चुका है और यहां विकास की गुंजाइश खत्म हो गई है. लेकिन पवनदीप सिंह इस धारणा को पूरी तरह खारिज करते हैं. 'दिल्ली एक बेहद मैच्योर और स्टेबल मार्केट है. यहां नई जमीनों की सप्लाई बहुत सीमित है. यही कारण है कि मंदी के दौर में भी दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतें गिरने या करेक्शन होने के चांसेस बहुत कम होते हैं. '
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दिल्ली शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा प्रमुख और विशाल महानगर है, जहां अभी तक बड़े पैमाने पर 'वर्टिकल डेवलपमेंट की अनुमति नहीं दी गई थी. दिल्ली सरकार का नया मास्टर प्लान (MPD) और टीओडी (Transit-Oriented Development) पॉलिसी गेम-चेंजर साबित होने वाली हैं. इनमें वर्डिंग और वर्टिकल ग्रोथ को शामिल किया जा रहा है. एक बार जब ये पॉलिसियां पूरी तरह लागू हो जाएंगी, तो दिल्ली रिटर्न के मामले में नोएडा और गुड़गांव को बहुत आक्रामक तरीके से टक्कर देगी.
दिल्ली बनाम नोएडा-गुड़गांव का भ्रम
पवनदीप सिंह कहते हैं- 'अक्सर यह माना जाता है कि पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में उतनी तेजी से कीमतें नहीं बढ़ीं जितनी एनसीआर में बढ़ी हैं, लेकिन आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है. साल 2021 के बाद दिल्ली में भी प्लॉट के दाम लगभग दोगुने हुए हैं. वहीं नोएडा और गुड़गांव में यह बढ़ोतरी करीब ढाई गुना रही है. ऐसा नहीं है कि एनसीआर में कीमतें पांच-छह गुना बढ़ गई हों. '
दिल्ली मुख्य रूप से एक 'एंड-यूज़र' मार्केट है, यानी यहां लोग रहने के लिए घर या प्लॉट खरीदते हैं. इसके विपरीत, नोएडा और गुड़गांव 'स्पेकुलेटिव मार्केट' हैं, जहां बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग और सट्टेबाजी होती है.
पवनदीप कहते हैं- 'जहां भी सट्टेबाजी और ट्रेडिंग ज्यादा होगी, वहां कीमतें तेजी से बढ़ेंगी तो सही, लेकिन बाजार ठंडा होने पर उतनी ही तेजी से गिरने का खतरा भी रहेगा. एनसीआर में लोग अक्सर सिर्फ 30% पैसा अपनी जेब से लगाकर, लोन या रीसेल के भरोसे बड़ी प्रॉपर्टीज ले लेते हैं. वहीं दिल्ली में लोग ज्यादातर अपनी पूरी पूंजी लगाकर घर खरीदते हैं, इसलिए दिल्ली में लिक्विडिटी का संकट नहीं आता. '
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दिल्ली की सबसे बड़ी ताकत उसकी 'लिक्विडिटी' है, यहां आज आप प्रॉपर्टी बेचने निकलेंगे, तो कल ग्राहक तैयार मिल जाएगा. नोएडा-गुड़गांव में कई जगह लोग अपनी प्रॉपर्टी बेचना चाहते हैं, लेकिन वे फंसे हुए हैं क्योंकि वहां लिक्विडिटी की भारी कमी है.
क्यों एनसीआर आकर्षित करता है?
एक्सपर्ट पवनदीप सिंह ने एक बेहद महत्वपूर्ण वित्तीय थ्योरी समझाई, जिसे 'गैप स्क्वीज़' कहा जाता है. इसे साउथ दिल्ली के ग्रेटर कैलाश (GK) और गुड़गांव के डीएलएफ फेज-1 के उदाहरण से समझा जा सकता है. 20 साल पहले डीएलएफ फेज-1 में प्लॉट के रेट ग्रेटर कैलाश के रेट का महज 10% हुआ करते थे. आज यह फासला घटकर करीब 50% पर आ गया है. यानी गुड़गांव ने दिल्ली के मुकाबले ज्यादा तेजी से इस गैप को कम किया है.
पवनदीप सिंह बताते हैं- "आज के समय में गुरुग्राम मुख्य शहर बन चुका है. जैसे न्यूयॉर्क में 'मैनहटन' मुख्य शहर है, जहां नौकरियां हैं, वैसे ही आज दिल्ली-एनसीआर में गुड़गांव वह केंद्र है जहां कॉर्पोरेट नौकरियां और दफ्तर हैं. दिल्ली के लोग रोज सुबह काम करने के लिए गुड़गांव जाते हैं. '
गुरुग्राम जाने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं, जो विशेषकर युवा खरीदारों को प्रभावित कर रहे हैं. दिल्ली से गुड़गांव आने-जाने में रोज 2 से ढाई घंटे का ट्रैफिक और ट्रैवल टाइम बर्बाद होता है. इस थकान से बचने के लिए लोग वहीं शिफ्ट होना पसंद कर रहे हैं, जहां उनकी नौकरी है. दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतें आज भी आसमान छू रही हैं. अगर किसी का बजट सीमित है और उसे 2000 स्क्वायर फीट का बड़ा और खुला घर चाहिए, तो वह बजट दिल्ली में फिट नहीं बैठता, वही स्पेस उसे गुड़गांव में आसानी से मिल जाती है.
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