कोई जिम नहीं, सिर्फ 'खाना', दिल्ली जिमखाना विवाद से छूटे देश के एलीट क्लबों के पसीने!

भारत की कुछ सबसे कीमती और सरकारी ज़मीनों पर काबिज़, दिल्ली से लेकर मुंबई तक के एलीट क्लबों को अब मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ रहा है. दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद ने इस बात पर एक बहस छेड़ दी है कि क्या सरकारी ज़मीन का इस्तेमाल निजी विशेषाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए जारी रहना चाहिए.

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दिल्ली जिमखाना विवाद के बाद देश भर के रसूखदार क्लबों पर क्यों मंडराया ख़तरा! (Instagram/Bombay Gymkhana) दिल्ली जिमखाना विवाद के बाद देश भर के रसूखदार क्लबों पर क्यों मंडराया ख़तरा! (Instagram/Bombay Gymkhana)

आनंद सिंह

  • नई दिल्ली ,
  • 01 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:15 AM IST

भारत के एलीट क्लब अचानक थोड़े असहज हो गए हैं. सरकार और क्लब संस्कृति की निंदा करने वाले दोनों ही अब यह सवाल उठा रहे हैं कि जब देश में जमीन की इतनी कमी है, तो सरकारी जमीन पर बने ये क्लब इतने ऐशो-आराम और विशेषाधिकारों का मज़ा कैसे उठा सकते हैं. इस बहस की शुरुआत तब हुई जब देश के सबसे बड़े और वीआईपी क्लबों में से एक, 'दिल्ली जिमखाना क्लब' को मई में केंद्र सरकार की तरफ से जगह खाली करने का नोटिस मिला.

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भूमि और विकास कार्यालय ने देश के प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) से कुछ ही कदमों की दूरी पर, एक बेहद सुरक्षित इलाके में स्थित इस क्लब को डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य सार्वजनिक कार्यों का हवाला देते हुए 5 जून तक अपनी 27 एकड़ की जगह खाली करने को कहा है.

दिल्ली जिमखाना क्लब के सदस्यों ने तुरंत इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन इस विवाद ने देश भर के एलीट क्लबों की नींद उड़ा दी है. मुंबई और बेंगलुरु से लेकर चेन्नई और यहां तक कि वाराणसी जैसे छोटे शहरों तक, कई प्रतिष्ठित जिमखाना और मेंबरशिप क्लब भारत के सबसे महंगे इलाकों में सरकार से लीज़ पर ली गई बेशकीमती ज़मीनों पर चल रहे हैं.

वैसे तो निजी क्लबों में कोई बुराई नहीं है, वे मनोरंजन, नेटवर्किंग और सामाजिक जीवन के लिए जगह देते हैं. लेकिन जब ऐसी संस्थाएं सरकारी ज़मीन पर बेहद सस्ती दरों पर चलती हैं, तो पारदर्शिता, जवाबदेही और इस बात पर सवाल उठना लाज़मी है कि क्या इन व्यवस्थाओं से किसी भी तरह का जनहित पूरा हो रहा है.

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1000 रुपये सालाना लीज

उदाहरण के लिए, दिल्ली जिमखाना क्लब लुटियंस दिल्ली की 27 एकड़ की बेहद कीमती ज़मीन पर बना है, जो सरकार से मात्र ₹1,000 सालाना के मामूली किराए पर लीज़ पर ली गई है, जी हां, 27 एकड़ के लिए सिर्फ ₹1,000 साल के! इतना ही नहीं, यह क्लब अपने कथित मिसमैनेजमेंट और मेम्बरशिप की अपारदर्शी प्रक्रिया के कारण भी चर्चा में रहा है.

दिल्ली जिमखाना के इस विवाद ने इन सवालों को केंद्र में ला दिया है, और भारत भर के एलीट क्लब और जिमखाना इस आशंका से डरे हुए हैं कि जिस आसान पहुंच और विशेषाधिकारों का वे लंबे समय से आनंद ले रहे थे, वे उनसे छीने जा सकते हैं. आखिरकार, एक बार विशेषाधिकारों की आदत हो जाए, तो उन्हें छोड़ना बहुत मुश्किल होता है.

यहां तक कि दिल्ली गोल्फ क्लब भी, जो राजधानी के बीचों-बीच सरकार से लीज़ पर ली गई लगभग 170 एकड़ ज़मीन पर फैला हुआ है, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आ गया है. हालांकि इसकी लीज़ 2050 तक है, फिर भी लोगों ने सवाल उठाए हैं कि इतनी बड़ी और कीमती सरकारी ज़मीन का इस्तेमाल मुख्य रूप से एक छोटे और संभ्रांत समूह के फायदे के लिए क्यों किया जा रहा है, जबकि इससे सरकार को बहुत कम राजस्व मिलता है.

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इस क्लब के परिसर में कई ऐतिहासिक स्मारक भी हैं, जिनमें से कुछ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत आते हैं, लेकिन ये सभी आम जनता की पहुंच से बाहर हैं. भारत के ऐसे ही अन्य क्लबों पर एक नजर डालते हैं और देखते हैं कि दिल्ली जिमखाना विवाद के बाद उनका क्या रुख रहा है. 

मुंबई के मरीन ड्राइव पर स्थित पुराने और प्रतिष्ठित क्लब जांच के दायरे में

दिल्ली जिमखाना को बेदखली का नोटिस मिलने के कुछ ही दिनों बाद, मुंबई के मरीन ड्राइव और मरीन लाइंस इलाके के कई एलीट क्लबों को कलेक्टर कार्यालय से नोटिस मिले. एक प्रस्तावित राज्य जिमखाना नीति पर चर्चा करने के लिए क्लब के प्रतिनिधियों को 29 मई को फोर्ट स्थित ओल्ड कस्टम्स हाउस में एक बैठक के लिए बुलाया गया था. इस कवायद को कोंकण संभाग के डिविजनल कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा की जाने वाली एक सामान्य समीक्षा बताया गया, जिसका उद्देश्य मौजूदा समस्याओं की जांच करना और बदलावों के सुझाव देना था.

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इसके बावजूद, कई क्लबों ने एहतियात के तौर पर अपने लीज़ के रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज़ों की जांच और उन्हें व्यवस्थित करना शुरू कर दिया है. मुंबई के इन क्लबों की मुख्य चिंताएं हैं. सालाना लीज़ किराए में लगभग 4% की बढ़ोतरी, लीज़ के नवीनीकरण के लिए भारी स्टांप ड्यूटी शुल्क जो 30 साल की लीज के लिए लगभग ₹4 करोड़ हो सकता है. कोविड महामारी के समय से शादियों और अन्य कार्यक्रमों की मेजबानी पर लगे प्रतिबंध और समुद्र व रेलवे ट्रैक जैसी भौगोलिक बाधाओं के कारण बची हुई एफएसआई का उपयोग करने की सीमाएं. 'फ्लोर स्पेस इंडेक्स' (FSI) वह निर्माण क्षेत्र होता है, जिसकी अनुमति स्थानीय भवन नियमों के तहत किसी ज़मीन पर दी जाती है.

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लीज़ के किराए में 4% की वार्षिक कंपाउंड बढ़ोतरी हर साल देखने में छोटी लग सकती है, लेकिन समय के साथ यह क्लबों के रिकरिंग एक्सपेंसेस को काफी बढ़ा देती है, जिससे हर 18 साल में किराए की रकम लगभग दोगुनी हो जाती है. खासकर तब जब ऐतिहासिक इमारतों और मैदानों के रखरखाव का खर्च भी बहुत ज़्यादा हो. मुंबई के कई जिमखाना, विशेष रूप से मरीन ड्राइव और ओवल मैदान के पास स्थित क्लब, स्थानीय रूप से संरक्षित ऐतिहासिक इमारतें हैं और वे शहर के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको एन्सेम्बल के भीतर या उसके ठीक बगल में स्थित हैं.

इस बीच, 30 साल की लीज़ को रीन्यू करने के लिए ₹4 करोड़ का स्टांप ड्यूटी शुल्क एक बड़ा एकमुश्त वित्तीय बोझ है, खासकर इसलिए क्योंकि लीज पर ली गई लगभग 90% जमीन खुला मैदान है और सिर्फ 10% हिस्से पर ही निर्माण हुआ है. पारसी, हिंदू, इस्लाम, कैथोलिक और पुलिस जिमखाना सहित कई क्लबों के प्रतिनिधियों ने इन चिंताओं पर एक संयुक्त रणनीति तैयार करने के लिए शुक्रवार को इस्लाम जिमखाना में मुलाकात की.

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मुंबई में इस तरह के संस्थानों का एक बड़ा नेटवर्क है, जिनमें से कई की जड़ें सामुदायिक पहचान से जुड़ी हैं. 1875 में स्थापित बॉम्बे जिमखाना, आज भी क्रिकेट और रग्बी का एक प्रमुख मैदान है. इसके पास ही पारसी जिमखाना, हिंदू जिमखाना और इस्लाम जिमखाना हैं, जिनमें से सभी ने शहर में क्रिकेट के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अन्य प्रमुख संस्थानों में कैथोलिक जिमखाना, प्रिंसेस विक्टोरिया मैरी जिमखाना, जैन जिमखाना और ग्रांट मेडिकल कॉलेज एसोसिएशन शामिल हैं. सालों के साथ, ये क्लब खेल के मैदानों से बदलकर रसूखदार सामाजिक स्थानों के रूप में विकसित हो गए हैं.

हालांकि इनमें से किसी के सामने भी फिलहाल कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, लेकिन दिल्ली जिमखाना विवाद के ठीक बाद पॉलिसी रिव्यू के इस समय ने दक्षिण मुंबई के क्लब हलकों में दबी हुई चिंता पैदा कर दी है. फिर भी, एक क्लब विशेष रूप से जांच के दायरे में आया है. मुंबई का ब्रीच कैंडी क्लब, जो कथित तौर पर सरकार की बेहद कीमती ज़मीन पर बना है, आज भी'केवल यूरोपीय लोगों  के ट्रस्ट ढांचे द्वारा संचालित होता है. यह क्लब 1960 के दशक की एक नस्लीय घटना के लिए भी जाना जाता है, जब शशि थरूर को वहां से बाहर निकाल दिया गया था, क्योंकि उस वक्त भारतीयों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी.

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अन्य महानगरों और छोटे शहरों में भी गूंज

फिलहाल इस चर्चा में दिल्ली और मुंबई छाए हुए हैं, लेकिन भारत भर के महानगरों के ताने-बाने में एलीट क्लब काफी गहराई से जुड़े हुए हैं, हैदराबाद में, नवाब महबूब अली खान द्वारा 1884 में स्थापित ऐतिहासिक निज़ाम क्लब और हैदराबाद जिमखाना आज भी एलीट सामाजिक केंद्रों के रूप में काम कर रहे हैं. बेंगलुरु का बैंगलोर क्लब, जो 1868 में स्थापित हुआ था, शहर के बीचों-बीच 15 एकड़ के हरे-भरे क्षेत्र में फैला हुआ है और इसके सदस्यों में बड़े कारोबारी और पेशेवर  शामिल हैं.

चेन्नई में, ऐतिहासिक मद्रास क्लब, जिसकी स्थापना 1832 में हुई थी और बाद में इसका अड्यार क्लब में विलय हो गया था, आज भी एक्सक्लूसिविटी, मनोरंजन और नेटवर्किंग की उन परंपराओं को बनाए हुए है जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं. 

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हालांकि इन क्लबों के हलकों में अभी तक वैसी किसी कार्रवाई या बेचैनी की खबरें नहीं आई हैं, लेकिन बैंगलोर के बॉरिंग इंस्टीट्यूट के एक सदस्य प्रकाश गौड़ा ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि दिल्ली जिमखाना प्रकरण ने बेशकीमती सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा जमाए बैठे एलीट क्लबों के भविष्य को लेकर सदस्यों के बीच चर्चा छेड़ दी है. बेंगलुरु क्लब के ही साल स्थापित बॉरिंग इंस्टीट्यूट भी बेंगलुरु के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित क्लबों में से एक है.

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इस बीच, दिल्ली जिमखाना प्रकरण छोटे शहरों के विशिष्ट क्लबों से जुड़ी चर्चाओं को भी प्रभावित कर सकता है. वाराणसी का ऐतिहासिक 'बनारस क्लब', जो कि 128 साल पुराना औपनिवेशिक काल का एक और संस्थान है, समय-समय पर ज़मीन और उसके सार्वजनिक उपयोग के दावों को लेकर विवादों का सामना करता रहा है. साल 2011 में, स्थानीय प्रशासन ने क्लब को उसके परिसर के भीतर दो विवादित भूखंडों का कब्ज़ा खाली करने का आदेश दिया था. हाल के वर्षों में, वाराणसी में वकीलों के समूहों ने भी यह तर्क देते हुए क्लब के आसपास की ज़मीन को जिला अदालत परिसर के विस्तार के लिए उपलब्ध कराने की मांग की है कि वर्तमान न्यायिक बुनियादी ढांचे को जगह की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है.

ये मामले एक खास ढर्रे की ओर इशारा करते हैं, जो क्लब कभी औपनिवेशिक प्रशासकों और भारतीय अभिजात वर्ग की सेवा करते थे, वे अब एक लोकतांत्रिक भारत में काम कर रहे हैं, जहाँ सार्वजनिक भूमि की जवाबदेही कहीं अधिक मायने रखती है.

क्या विरासत और जनहित के बीच संतुलन बन सकता है?

लंदन के 'जेंटलमैन क्लबों' से लेकर न्यूयॉर्क के सामाजिक संस्थानों तक, दुनिया भर के क्लब लंबे समय से निजी स्थानों के रूप में अस्तित्व में रहे हैं. भारत में, इन्होंने खेलों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुंबई के जिमखानों में क्रिकेट के शुरुआती दौर को याद कीजिए. ये क्लब भीड़भाड़ वाले महानगरों में राहत के पल तो प्रदान करते ही हैं, इनमें से कई क्लब कुशलतापूर्वक चल रहे हैं, ऐतिहासिक इमारतों का रखरखाव करते हैं और ऐसे कार्यक्रमों की मेज़बानी करते हैं जिससे सदस्यों और परोक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को लाभ होता है.

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कई क्लब अपनी सदस्यता के दायरे से बाहर भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं. वे बड़े पैमाने पर कर्मचारियों, खान-पान के लिए स्थानीय विक्रेताओं, कोचों और खेल पेशेवरों को रोजगार देते हैं, और ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं जो विभिन्न सेवा प्रदाताओं के लिए व्यवसाय पैदा करते हैं.

लेकिन जांच-परख भी ज़रूरी है, जब क्लब रियायती या सांकेतिक किराए पर सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करते हैं, तो सदस्यता में पारदर्शिता, वित्तीय प्रबंधन और व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. दिल्ली जिमखाना मामले ने इनमें से कई मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. सरकार ने दावा किया है कि किराए में संशोधन के बाद क्लब पर करीब ₹48 करोड़ का बकाया है. इसके शासन और खर्च की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि खेल से जुड़ी गतिविधियों की तुलना में शराब और सिगरेट पर अधिक पैसा खर्च किया गया.

दूसरी ओर, मुंबई के क्लबों का संभवत यह तर्क है कि पुरानी ऐतिहासिक इमारतों और बड़े खुले मैदानों के रखरखाव का भारी खर्च मौजूदा लीज़ की शर्तों को टिकाऊ नहीं रहने देता. इतिहासकार स्वप्ना लिडल का तर्क है कि सांस्कृतिक संस्थानों को समय के साथ बदलना चाहिए, लेकिन उन्हें पूरी तरह से नष्ट नहीं किया जाना चाहिए. पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने भी इस बात पर ज़ोर दिया है कि ये स्थान भारत की खेल और संस्थागत विरासत का हिस्सा हैं और वे अचानक मिटा दिए जाने के बजाय एक विचारशील विकास के हकदार हैं.

बहरहाल, सब्सिडी वाली सरकारी ज़मीन पर जवाबदेही की मांग पूरी तरह से जायज लगती है. इन 'जिमखानों' में सिर्फ 'खाना' ही नहीं, बल्कि 'जिम'भी अच्छी-खासी मात्रा में होना चाहिए, दिल्ली जिमखाना क्लब के आदेश ने अन्य विशिष्ट क्लबों के पसीने छुड़ा दिए हैं. इसलिए, समीक्षाओं की यह मौजूदा लहर सार्थक सुधारों के द्वार खोल सकती है. फिलहाल के लिए, जिमखाना विवाद ने ज़मीन, विरासत और विशेषाधिकारों को लेकर देश भर में एक ज़रूरी बहस छेड़ दी है.

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