ब्रिटिश दौर में बना, आज भी मेंबरशिप के लिए लंबी वेटिंग.... दिल्ली के जिमखाना क्लब की पूरी कहानी

दिल्ली के ऐतिहासिक जिमखाना क्लब को केंद्र सरकार ने 5 जून तक अपनी जमीन और परिसर खाली करने का आदेश दिया है। यह जमीन लगभग 27.3 एकड़ में फैली है और इसे रक्षा और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी बताया गया है.

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दिल्ली जिमखाना क्लब मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई होगी दिल्ली जिमखाना क्लब मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई होगी

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:49 PM IST

देश की राजधानी दिल्ली का प्रसिद्ध जिमखाना क्लब चर्चा में है. वजह है इस क्लब की जमीन और कैंपस खाली करने का सरकारी आदेश. केंद्र सरकार ने क्लब से 5 जून तक अपनी ज़मीन और कैंपस खाली करने को कहा है. सरकार के मुताबिक ये जमीन करीब 27.3 एकड़ है. क्लब ने अपने सदस्यों को भेजे ऑफिशियल मैसेज में कहा कि केंद्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली में स्थित उसके कैंपस को 'डिफेंस स्ट्रक्चर को मजबूत और सुरक्षित करनेट और पब्लिक सेफ्टी सुनिश्चित करने के लिए खाली करने को कहा है.

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22 मई को केंद्र सरकार ने भेजा नोटिस
क्लब के मुताबिक, उसे 22 मई को आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस से नोटिस मिला है. यह जमीन दिल्ली के 2,सफदरज़ंग रोड पर मौजूद है, जो लोक कल्याण मार्ग पर मौजूद पीएम आवास के पास है. एलएंडडीओ (L&DO) के मुताबिक, यह जमीन मूल रूप से तत्कालीन 'इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड' को सामाजिक और खेल क्लब चलाने के लिए लीज पर दी गई थी.

अब भारत की राष्ट्रपति ने लीज डीड के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए लीज समाप्त करने और परिसर को तत्काल वापस लेने का आदेश दिया है.

हाईकोर्ट में 26 मई को मामले की सुनवाई

दिल्ली के जिमखाना क्लब ने केंद्र सरकार के परिसर खाली करने के आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है. क्लब ने केंद्र सरकार के वेकेशन ऑर्डर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है. सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली हाईकोर्ट में मामले का जिक्र करते हुए जल्द सुनवाई की मांग की. जिस पर अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए 26 मई, मंगलवार की तारीख तय कर दी.

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5 जून तक परिसर खाली करने का आदेश

दिल्ली जिमखाना क्लब की पहचना महज एक क्लब की नहीं है, बल्कि ये भारत के औपनिवेशिक इतिहास, सत्ता, सामाजिक प्रतिष्ठा और बदलते दौर का जीवंत दस्तावेज भी रहा है. इस क्लब ने ब्रिटिश शासन, भारत-पाकिस्तान का बंटवारा और आजादी के बाद की कई सरकारों का दौर देखा है. अब केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक क्लब को 5 जून तक परिसर खाली करने का नोटिस देकर एक नई बहस छेड़ दी है.

क्लब का इतिहास और ब्रिटिश दौर की कहानी
इस क्लब की कहानी का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि दिल्ली का राजधानी बनने का इतिहास. 1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी को कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली ट्रांसफर करने का ऐलान किया था. नई राजधानी के साथ नई प्रशासनिक और सामाजिक संरचना की जरूरत महसूस हुई. इसी के तहत 1913 में ‘इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ की नींव रखी गई. इसे नई राजधानी में तैनात ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और उच्च प्रशासनिक वर्ग के लिए विकसित किया गया था.

सात बड़े राजघरानों ने मिलकर की थी क्लब की स्थापना 
क्लब की स्थापना में तत्कालीन भारत के सात बड़े राजघरानों की अहम भूमिका रही. इनमें ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कश्मीर, उदयपुर और किशनगढ़ के महाराजा तथा भोपाल के नवाब शामिल थे. इन्हें क्लब का लाइफ मेंबर बनाया गया था. शुरुआती वर्षों में किंग्सवे स्थित पोलो ग्राउंड लगभग क्लब का ही हिस्सा माना जाता था, जो बाद में 1930 के दशक में अलग इकाई बना.

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आर्किटेक्ट रॉबर्ट रसेल... जिन्होंने क्लब को बनाया 
दिल्ली के मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार रॉबर्ट रसेल ने 1930 के दशक की शुरुआत में सफदरजंग रोड स्थित मौजूदा भवन का डिजाइन तैयार किया. रॉबर्ट रसेल वही वास्तुकार थे जिन्होंने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन क्षेत्र की भी डिजाइनिंग की थी. कहा जाता है कि वह चाहते थे कि क्लब का डिजाइन आसपास बन रहे फ्लैट-रूफ बंगले वाले लुटियंस दिल्ली क्षेत्र के ही अनुसार हो. इसी वजह से वह कई वर्षों तक क्लब की जनरल कमेटी से भी जुड़े रहे.

लेडी विलिंग्टन ने बनवाया था स्विमिंग पूल
क्लब का स्विमिंग पूल भी अपने आप में दिलचस्प इतिहास समेटे हुए है. शुरू में यहां स्विमिंग पूल नहीं था. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड विलिंग्टन की पत्नी लेडी विलिंग्टन को तैराकी का बेहद शौक था और उन्हें दिल्ली के दूसरे पूल्स पर निर्भर रहना पसंद नहीं था. उन्होंने क्लब को 21 हजार रुपये दान में दिए, जिससे स्विमिंग पूल और स्क्वैश कोर्ट बनाए गए. बाद में उनके सम्मान में वहां ‘लेडी विलिंगडन स्विमिंग बाथ’ और ‘द विलिंगडन स्क्वैश कोर्ट्स’ के नाम की पट्टिकाएं लगाई गईं.

सामाजिक प्रतिष्ठा की परिभाषा थी क्लब की मेंबरशिप

ब्रिटिश दौर में यह क्लब सिर्फ मनोरंजन की जगह नहीं था, बल्कि सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा का केंद्र माना जाता था. भारतीय सिविल सेवा (ICS) के अफसरों के लिए यहां प्रवेश पाना सम्मान की बात थी. उस दौर में यहां अंग्रेजी तौर-तरीकों को अपनाना लगभग जरूरी माना जाता था. फॉक्सट्रॉट डांस से लेकर संडे ब्रंच में ब्लडी मैरी पीने और अंग्रेजी नाश्ता करने तक, सब कुछ सामाजिक स्वीकृति का हिस्सा था. यहां के टेनिस कोर्ट कई अफसरों के करियर नेटवर्किंग के केंद्र बन जाते थे.

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...लेकिन भेदभाव और रंगभेद का काला इतिहास भी जुड़ा
1946 में भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबैटेन ने भी भारतीय और अंग्रेज अधिकारियों के बीच भेदभाव की परंपरा जारी रखी थी. भारतीय अधिकारी क्लब के लॉन में बैठते थे, जबकि अंग्रेज भवन के अंदर. यानी पहुंच तो मिल गई थी, लेकिन बराबरी नहीं. भारत विभाजन के समय यह क्लब भावनात्मक घटनाओं का भी गवाह बना. उन दिनों भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं में बंटने वाले कई सैन्य अधिकारी यहां आखिरी बार साथ बैठे, शराब पी और पुरानी यादें साझा कीं, इससे पहले कि सीमाएं हमेशा के लिए अलग हो जातीं.

आजादी के बाद क्लब के नाम से ‘इम्पीरियल’ शब्द हटा दिया गया. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू  इसके वाइस-पैट्रन बने. अंग्रेजी भोजन के साथ भारतीय व्यंजन शामिल हुए. बाद में यहां चीनी और थाई भोजन के अलग रेस्तरां भी बने. 

लोगों के पसंदीदा रहे हैं क्लब के केक-पेस्ट्री

जिमखाना क्लब के केक और गैर-शाकाहारी व्यंजन हमेशा चर्चित रहे हैं. रोगन जोश, बटर चिकन, कोल्ड कट्स से लेकर पेस्ट्री, केक, फ्रूट-केक, दाल मखनी, बेक्ड-बीन्स एवं बिरयानी, क्लब के बेहद लोकप्रिय व्यंजनों में शामिल रहे हैं. यहां के शेफ के बनाए डिशेज़ की कमी किसी फाइव स्टार होटल में भी महसूस नहीं होती. क्लब की पेस्ट्री और केक की बहुत बड़ी फैन फॉलोइंग रही है.

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क्लब की मेंबरशिप में दशकों की वेटिंग
क्लब में मेंबरशिप पाने में कई दशक लग जाते थे. एक समय में माना जाता था कि यह क्लब में सदस्यता मिलने की सबसे कठिन जगहों में से एक है. 1990 के दशक के बाद यहां व्यापारियों की भी अच्छी संख्या हो गई. क्लब की सदस्यता इतनी प्रतिष्ठित मानी जाने लगी कि 1970 के दशक में आवेदन करने वाले कुछ लोग आज भी वेटिंग लिस्ट में बताए जाते हैं.

L&DO ने क्लब को दिया है नोटिस 
अब केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने क्लब को नोटिस जारी कर परिसर वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. सरकार ने कहा है कि रक्षा और सुरक्षा से जुड़े सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस जमीन की जरूरत है. क्लब प्रबंधन ने इस फैसले को अदालत में चुनौती देने की बात कही है. क्लब के वरिष्ठ सदस्य मेजर अतुल देव का दावा है कि यह जमीन मूल रूप से क्लब ने खरीदी थी, लेकिन सरकार ने मालिकाना हस्तांतरण की जगह ‘परपेचुअल लीज’ दी थी. उनका कहना है कि क्लब नियमित रूप से लीज राशि देता रहा है और वह अदालत से स्टे की मांग करेंगे.

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने इसे दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहर बताया. वहीं शहरी मामलों की विशेषज्ञ वंदिनी मेहता ने इस पूरे घटनाक्रम को विडंबना बताया. उनके मुताबिक, एक लोकतांत्रिक भारत आज उसी औपनिवेशिक लीज व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे अंग्रेजों ने जमीन पर अंतिम नियंत्रण बनाए रखने के लिए बनाया था.

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केंद्र सरकार के लेटर में क्या-क्या लिखा है?

दिल्ली जिमखाना क्लब ने केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि क्लब और उसकी गतिविधियों में किसी तरह का “विस्थापन” न हो. साथ ही क्लब ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि अगर उसे मौजूदा परिसर खाली करना पड़े, तो क्या उसे दूसरी जगह ट्रांसफर किया जाएगा या क्या कोई वैकल्पिक जमीन आवंटित की जाएगी.

क्लब ने क्या दिया है जवाब
क्लब ने केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) को लिखे पत्र में कहा है कि अचानक की गई कार्रवाई से हजारों सदस्य, कर्मचारी और अन्य हितधारक प्रभावित हो सकते हैं. 23 मई को भेजे गए इस पत्र में क्लब ने अनुरोध किया कि जब तक कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्टता नहीं आ जाती, तब तक ऐसी कोई कार्रवाई न की जाए जिससे संस्था के संचालन पर असर पड़े. क्लब ने पूछा है कि क्या उसे दूसरी जगह शिफ्ट किया जाएगा और क्या उसके लिए वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराई जाएगी.

यह पत्र केंद्र सरकार के उस आदेश के एक दिन बाद भेजा गया, जिसमें भूमि एवं विकास कार्यालय ने दिल्ली जिमखाना क्लब परिसर को वापस लेने और पुनः अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी. 22 मई के आदेश में सरकार ने कहा था कि यह जमीन मूल रूप से ‘इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड’ को सामाजिक और खेल गतिविधियों के संचालन के लिए लीज पर दी गई थी.

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सरकार का क्या कहना है?

सरकार का कहना है कि यह परिसर राष्ट्रीय राजधानी के “अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र” में स्थित है और रक्षा ढांचे को मजबूत करने तथा सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े उद्देश्यों के लिए इसकी जरूरत है.

सरकार ने अपने आदेश में कहा कि यह जमीन “तत्काल संस्थागत जरूरतों, प्रशासनिक बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक हित परियोजनाओं” के लिए जरूरी है, जो आसपास की सरकारी जमीनों से जुड़ी हैं. परपेचुअल लीज डीड की धारा 4 का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि वह सार्वजनिक हित में इस संपत्ति पर दोबारा कब्जा लेने और लीज समाप्त करने का अधिकार इस्तेमाल कर रही है.

आदेश लागू होता है तो क्या असर होगा?

आदेश के मुताबिक 27.3 एकड़ का पूरा परिसर, जिसमें सभी भवन, लॉन, ढांचे और फिटिंग्स शामिल हैं, भूमि एवं विकास कार्यालय के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति के अधिकार में चला जाएगा.

क्लब को निर्देश दिया गया है कि वह 5 जून 2026 तक परिसर का शांतिपूर्ण कब्जा सरकार को सौंप दे, अन्यथा कानून के अनुसार कार्रवाई कर कब्जा लिया जाएगा. अपने जवाब में क्लब ने कहा कि भूमि एवं विकास कार्यालय के साथ लीज किराया बढ़ाने को लेकर पहले से बातचीत चल रही है और बढ़े हुए लीज रेंट को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है.

क्लब को कितना मुनाफा-कितना घाटा
क्लब ने यह भी बताया कि वर्तमान में उसका संचालन राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के 2022 के आदेश के तहत कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा नियुक्त जनरल कमेटी कर रही है. यह व्यवस्था तब तक के लिए है जब तक निर्वाचित समिति कार्यभार नहीं संभाल लेती. क्लब ने अपनी वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उसके संचालन में काफी सुधार हुआ है. क्लब के मुताबिक 2023-24 में अनुमानित लाभ 925.10 लाख रुपये रहा, जबकि 2021-22 में उसे 1,239.26 लाख रुपये का घाटा हुआ था.

क्या क्लब को कहीं शिफ्ट किया जाएगा?

पत्र में कहा गया कि यह संस्था करीब 14 हजार सदस्यों और उपयोगकर्ताओं को सेवाएं देती है और यहां 500 से अधिक लोग कार्यरत हैं. क्लब ने यह भी कहा कि दशकों में खेल सुविधाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक व्यवस्था पर भारी निवेश किया गया है. जनरल कमेटी ने मंत्रालय से अनुरोध किया है कि यदि क्लब को स्थानांतरित करने की योजना है तो उसे वैकल्पिक जमीन आवंटित की जाए.

साथ ही अधिकारियों के साथ जल्द बैठक बुलाने की मांग की गई है ताकि सदस्यों, कर्मचारियों और अन्य हितधारकों की चिंताओं पर चर्चा की जा सके. क्लब ने दोहराया कि जब तक सभी मुद्दों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक उसकी गतिविधियों और संचालन में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आना चाहिए.

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