जब दुनिया डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर से जूझ रही थी, तो एक और चीज सुर्खियों रही थी और इसने तमाम देशों को डराने का काम किया था. वो थी क्रिटिकल मिनरल्स जिन पर चीन का दबदबा है. न सिर्फ इसकी माइनिंग, बल्कि रिफाइनिंग से लेकर प्रोसेसिंग तक में ड्रैगन टॉप पर है. जब अमेरिका ने चीन पर टैरिफ अटैक किए, तो इस जरूरी चीज के निर्यात पर निर्यात प्रतिबंध लगाकर चीन ने टैरिफ की धमकी देते ट्रंप को दबाव में ला दिया था और दोनों को एक डील के लिए टेबल पर आना पड़ा था.
US-China की तनातनी में दुनिया ने इसकी अहमियत समझी और खासतौर पर भारत की बात करें, तो देश ने इन क्रिटिकल मिनरल्स के लिए चीन पर निर्भरता कम करने के लिए प्लान-बी तैयार कर लिया और इसपर लगातार आगे बढ़ रहा है. इंडोनेशिया के साथ हालिया समझौते में भी इस चीज पर फोकस रहा है.
चीन का क्यों है दबदबा?
सबसे पहले बात करते हैं कि क्रिटिकल मिनरल्स पर आखिर चीन का दबदबा क्यों और कैसे है? तो Critical Minerals के ग्लोबल उत्पादन का करीब 70 फीसदी हिस्सा चीन के पास है, जबकि इनकी रिफाइनिंग के मामले में ये 90 फीसदी का दबदबा रखता है. ऐसा नहीं है कि चीन अकेले ही इन खनिजों को निकालता है और दुनिया को देता है. ड्रैगन के इसे लेकर धौंस जमाने की पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि दूसरे क्रिटिकल मिनरल्स के बड़े उत्पादक देश भी इनकी रिफाइनिंग के लिए चीन पर ही निर्भर हैं.
जैसे, Lithium ऑस्ट्रेलिया और साउथ अमेरिका में ज्यादा होता है, लेकिन इसकी ज्यादातर रिफाइनिंग चीन में होती है. अफ्रीका कांगों में कोबाल्ट उत्पादित होता है और इसकी रिफाइनिंग भी चीन में होती है. सबसे ज्यादा Nickel की माइनिंग इंडोनेशिया में होती है, लेकिन रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग के लिए ये चीन पहुंचता है. मतलब माइनिंग से भी बड़ी मिनरल्स के रिफाइनिंग की ताकत पर चीन दुनिया को आंख दिखाने में कामयाब रहता है.
भारत का Plan-B तोड़ेगा घमंड
क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर चीनी धमकियों के चलते अब अमेरिका, यूरोप, जापान समेत भारत चीन पर निर्भरता कम करने के लिए कदम आगे बढ़ा रहे हैं. भारत का प्लान-बी (India Plan-B) काम भी कर रहा है और इसका उदाहरण है दो साल में दुर्लभ खनिज मिशन को लेकर करीब 35 देशों का नेटवर्क तैयार किया है.
रिपोर्ट्स की मानें, तो चीन पर निर्भरता कम करने के लिए देश की मोदी सरकार ने बीते 2 सालों में 24 देशों के साथ करार हो चुका है, जबकि 11 के साथ बातचीत का सिलसिला जारी है. जिन देशों के साथ इसे लेकर साझेदारी हुई है, उनमें अमेरिका, कनाडा, यूके, जर्मनी, फ्रांस, कांगो, इटली समेत अन्य शामिल हैं और इसमें सबसे नया नाम इंडोनेशिया का है, जिसके साथ हाल ही में करार हुआ है. इसके अलावा चिली, पेरू, ज़ाम्बिया, कज़ाकिस्तान और उजबेकिस्तान जैसे देश से बात जारी है.
इंडोनेशिया के साथ डील डन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इंडोनेशिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो से मुलाकात कर समझौता ज्ञापनों पर साइन किए हैं. इनमें महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर करार अहम है. इंडोनेशिया के पास निकल के विश्व के सबसे बड़े भंडारों में से बड़ा हिस्सा मौजूद है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी में प्रमुख घटक है. India-Indonesia Deal के तहत, भारत इंडोनेशिया में इस्पात, निकेल और रेयर अर्थ स्थायी चुंबकों के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स में निवेश करेगा.
अब ऑस्ट्रेलिया से करार की तैयारी
इंडोनेशिया की तीन दिन की यात्रा के बाद अब पीएम नरेंद्र मोदी 10 जुलाई तक ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर निकल गए हैं. ऑस्ट्रेलिया लीथियम के सबसे बड़े उत्पादकों में है और India-Australia रिलेशन के केंद्र में भी ये महत्वपूर्ण खनिज शामिल है.
इकोनॉमी के लिए जरूरी खनिज
गौरतलब है कि क्रिटिकल मिनरल्स अब ग्लोबल इकोनॉमी के लिए स्ट्रेटिजिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक बन चुके हैं. इसकी वजह है कि ये खनिज उन टेक्नोलॉजी की नींव के लिए जरूरी हैं, जिन पर देशों की इकोनॉमिक ग्रोथ, इंडस्ट्रियल ग्रोथ और नेशनल सेफ्टी निर्भर है. इन तमाम क्रिटिकल मिनरल्स का यूज इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की बैटरियों, सेमीकंडक्टर, सोलर पैनल, टर्बाइन, इलेक्ट्रिक ग्रिड, एयरोस्पेस इक्विपमेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम समेत अन्य में होता है.
आजतक बिजनेस डेस्क