भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में कानूनी अड़चनें... भारत में भी पर्दे के पीछे से खेल, अब US को भी बदलना होगा!

भारत ने दुनियाभर के देशों के लिए अपने बाजार खोल दिए हैं. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने Ease Of Doing Business पर तेजी से काम किया है. लेकिन जिस तरह से भारत ने अमेरिका के लिए दरवाजे खोले हैं, उसके बदले अभी भी भारतीय कारोबारियों को अमेरिकी बाजारों में आसानी से एंट्री नहीं मिल पाती है.

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अमेरिका के दौर पर पीएम मोदी (Photo: File) अमेरिका के दौर पर पीएम मोदी (Photo: File)

अमित कुमार दुबे

  • नई दिल्ली,
  • 21 जून 2023,
  • अपडेटेड 6:44 PM IST

जिस तेजी से भारत के चीन के साथ कारोबारी रिश्ते बिगड़े हैं. उसी रफ्तार से अमेरिका के साथ ये बेहतर हुए हैं. इसी का नतीजा है कि आज भारत और अमेरिका सबसे बड़े कारोबारी पार्टनर हैं. वित्त वर्ष 2022-23 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा कारोबारी भागीदार रहा. दोनों देशों के बीच इस दौरान 128.55 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है. इस मामले में चीन दूसरे नंबर पर खिसक गया है. 

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कहा जा रहा है कि अमेरिका और भारत ने मिलकर खासकर कारोबारी रिश्ते को सुधारने की कोशिश की है. जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार में इजाफा देखने को मिला है. इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर अमेरिका के दौरे पर हैं. प्रधानमंत्री के इस यात्रा के दौरान कई अहम समझौते होने की उम्मीद है, खासकर व्यापार और रक्षा क्षेत्र में.

दरअसल, भारत ने दुनियाभर के देशों के लिए अपने बाजार खोल दिए हैं. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने Ease Of Doing Business पर तेजी से काम किया है. सरकार का सिंगल विंडो क्लीयरेंस, जमीन अधिग्रहण में आसानी, डिजिटल सिस्टम को बेहतर बनाने पर फोकस रहा है, ताकि विदेशी कंपनियां भारत में निवेश के लिए आकर्षित हों.

भारत ने खोल दिए सभी के लिए अपने बाजार

लेकिन क्या दूसरे देशों में भी भारत के लिए इसी तरह से व्यापार के लिए दरवाजे खोले गए हैं, जहां भारतीय उद्योग जगत की पहुंच आसान हो और भारतीय उद्योगपति अपने कारोबार को विस्तार दे सकें. उदाहरण के तौर पर हम आज अमेरिका की ही बात करते हैं. क्योंकि कहा जा रहा है कि कारोबार को लेकर अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय रिश्ते बेहतर हुए हैं. 

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लेकिन जिस तरह से भारत ने अमेरिका के लिए दरवाजे खोले हैं, उसके बदले अभी भी भारतीय कारोबारियों को अमेरिकी बाजारों में आसानी से एंट्री नहीं मिल पाती है, फिर सवाल उठता है कि क्या अब अमेरिका को भी  Ease Of Doing Business पर काम करना चाहिए. 

अमेरिका में भारतीय कंपनियों को क्या चुनौतियां?

दरअसल, भारत और अमेरिका के कारोबारी रिश्ते को लेकर हमने हिंदुस्तान सीरिंज एंड मेडिकल डिवाइसेज लिमिटेड (HMD) के प्रबंध निदेशक और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AIMED) के फोरम कॉर्डिनेटर राजीव नाथ (Rajiv Nath) से बात की. क्योंकि आईटी के बाद सबसे ज्यादा मेडिकल सामानों का कारोबार अमेरिका के साथ होता है.

राजीव नाथ का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये दौरा बेहद अहम है. क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत की भूमिका बढ़ी है. खासकर कोरोना महामारी के दौरान भारत न सिर्फ वैक्सीन बनाने में काफी आगे रहा, बल्कि दुनिया के कई देशों में वैक्सीन की सप्लाई करने में भी अहम भूमिका निभाई. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि अभी भी अमेरिका में भारतीय मेडिकल उद्योग को कारोबार करने में कई तरह की दिक्कतें पेश आ रही हैं.  

राजीव नाथ ने बताया कि भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर से जुड़ी कंपनियां अमेरिका में काम करना चाहती हैं. लेकिन इसके लिए सीधे तौर पर एंट्री के लिए दरवाजे बंद हैं. क्योंकि भारतीय कंपनियां US पब्लिक हेल्थकेयर गवर्नमेंट टेंडर में डायरेक्ट हिस्सा नहीं ले सकती हैं. इसे रोकने के लिए अमेरिका ने कानून बना रखा है. अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी में इंडिया सिगनेटरी नहीं हैं. इसका मतलब है कि भारत को उन देशों की लिस्ट में अमेरिका ने डाल रखा है, जो सीधे टेंडर में हिस्सा न ले सके. लेकिन अब उनकी मांग है कि वक्त आ गया है कि इस कानून में अमेरिका को बदलाव करना चाहिए, ताकि भारतीय कंपनियां भी वहां टेंडर में हिस्सा लें और अपने कारोबार को आगे बढ़ाएं. 

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भारत में भी अमेरिकी कंपनियों की साजिश!

इसके अलावा उन्होंने बताया कि हेल्थकेयर सेक्टर में अमेरिकी कंपनियां भारत में भी अड़चनें डालती हैं, जिससे छोटी भारतीय कंपनियां इस सेक्टर में आगे नहीं बढ़ पातीं. खासकर राज्यों में सरकारी टेंडर में पिछले दरवाजे से US FDA अप्रूव्ड प्रोडक्ट्स की दीवार खड़ी कर दी जाती है. इसके लिए अमेरिका की दिग्गज कंपनियां बड़े पैमाने पर मार्केटिंग करती हैं. जबकि भारत की छोटी कंपनियां अपने हर प्रोडक्ट को US FDA से अप्रूव कराने में सक्षम नहीं हैं. एक तरह से भारतीय मेडिकल एक्यूपमेंट मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ीं कंपनियों के लिए ये दोहरी मार है. अमेरिका में कानून बनाकर रोकना और भारत US FDA की दीवार खड़ी कर देना. हालांकि भारत में सेंट्रल के जुड़े टेंडर में ऐसा कोई नियम लागू नहीं होता है.

दरअसल, मेडिकल डिवाइसेस (Medical Devices) सेक्टर में भारत का सबसे बड़ा आयातक और निर्यातक पार्टनर अमेरिका ही है. लेकिन कुछ कानूनी अड़चनों की वजह से कारोबार प्रभावित होता है. अगर भारत सरकार इस सेक्टर पर ध्यान दे, तो भारत में मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में 80 हजार करोड़ रुपये तक का निवेश आ सकता है. फिलहाल में भारत Medtech का मार्केट करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये का है. राजीव नाथ के मुताबिक, भारत-अमेरिका के बीच बेहतर रिश्ते हैं, ऐसे में इन मुद्दों पर बात जरूर होनी चाहिए. ताकि भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में दरवाजे खोले जा सकें. 

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दुनियाभर में मेडिकल डिवाइसेस का बड़ा कारोबार

बता दें, हिंदुस्तान सीरिंज एंड मेडिकल डिवाइसेज लिमिटेड (HMD) सबसे ज्यादा सर्जिकल ब्लेड अमेरिका को एक्सपोर्ट करता है. अमेरिका के सर्जिकल ब्लेड मार्केट में HMD तीसरा सबसे बड़ा प्लेयर है. इसके अलावा कंपनी के प्रोडक्ट्स UN, WHO, समेत यूरोप और मिडिल ईस्ट में एक्सपोर्ट किए जाते हैं. जिसमें सर्जिकल ब्लेड के अलावा सीरिंज की सप्लाई होती है. 

 
गौरतलब है कि बीते वित्त वर्ष 2022-23 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 128.55 अरब डॉलर रहा था. जबकि वित्त वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा 119.5 अरब डॉलर और 2020-21 में 80.51 अरब डॉलर रहा था. इस 7.65 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2022-23 में 7.65% बढ़ा है. 2022-23 में भारत से अमेरिका में निर्यात 2.81% बढ़ोतरी के साथ 78.31 अरब डॉलर हो गया, जो 2021-22 में 76.18 अरब डॉलर था. भारत में अमेरिका से आयात इस दौरान 16% बढ़ा है और अब ये 50.24 अरब डॉलर हो चुका है. 

हालांकि भारत सरकार, भारतीय कंपनियों को उस मजबूती तक ले जाना चाहती है, जहां से वो अन्य विदेशी कंपनियों का मुकाबला कर सके. इस दिशा कई कदम उठाए गए हैं. भारतीय उद्योग जगत को उम्मीद है कि पीएम मोदी के इस अमेरिकी दौरे से कई बड़ी डील पर मुहर लग सकती है. बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राषट्रपति जो बाइडेन की मुलाकात 22 जून को होगी. जिसपर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं.

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