बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राजनीतिक पार्टियों ने कुल 281.32 करोड़ रुपये का भारी-भरकम चंदा जुटाया. इसमें से चुनाव प्रचार और नेताओं के दौरों पर 193.47 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए. एक की रिपोर्ट के इमुताबिक, पार्टियों ने सबसे ज्यादा करीब 100 करोड़ रुपये सिर्फ अपनी पब्लिसिटी पर खर्च किए. मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) इकलौती ऐसी पार्टी रही, जिसने चुनाव के दौरान कोई चंदा मिलने की घोषणा नहीं की.
न्यूज एजेंसी PTI ने चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था ADR के हवाले से यह जानकारी दी है. इसके मुताबिक, 10 प्रमुख राजनीतिक दलों के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा चुनाव प्रचार पर गया. पार्टियों ने टीवी, अखबार, पोस्टर और बैनर जैसी चीजों पर करीब 100.42 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कुल खर्च का 36.68 फीसदी है. इसके बाद नेताओं के हवाई और सड़क दौरों पर 79.53 करोड़ रुपये खर्च हुए. यह चुनावी खर्च का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा रहा.
उम्मीदवारों को दी गई एकमुश्त राशि
पार्टियों ने केवल रैलियों और विज्ञापनों पर ही पैसा नहीं लगाया, बल्कि अपने उम्मीदवारों की सीधी मदद भी की. चुनाव के दौरान प्रत्याशियों को एकमुश्त रकम के तौर पर 62.07 करोड़ रुपये बांटे गए. इसके अलावा, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर वर्चुअल प्रचार के लिए भी पार्टियों ने जमकर तिजोरी खोली. फेसबुक, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर माहौल बनाने के लिए 13.07 करोड़ रुपये का खर्च दिखाया गया.
चुनाव आयोग के कड़े नियमों के कारण इस बार पार्टियों को एक और जरूरी काम पर पैसा खर्च करना पड़ा. नियमों के मुताबिक, पार्टियों के लिए अपने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड को अखबारों और मीडिया में उजागर करना जरूरी था. इस काम के लिए विज्ञापन देने में राजनीतिक दलों ने 3.88 करोड़ रुपये खर्च किए. इसके अलावा अन्य छोटे-मोटे खर्चों में 14.80 करोड़ रुपये का हिसाब दिया गया.
10 बड़ी पार्टियों के आंकड़ों का विश्लेषण
एडीआर ने चुनाव लड़ने वाली 10 बड़ी पार्टियों के पैसों का हिसाब-किताब चेक किया है. इनमें पांच राष्ट्रीय पार्टियां बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा, सीपीआई एम और पांच क्षेत्रीय पार्टियां आरजेडी, जेडीयू, एलजेपी रामविलास, एआईएमआईएम, सीपीआई शामिल हैं. रिपोर्ट बताती है कि इन पार्टियों ने जितना चंदा इकट्ठा किया और जितना खर्च दिखाया, उसके बीच करीब 88 करोड़ रुपये का अंतर मिला है.
रिपोर्ट में एक अहम बात यह भी सामने आई कि बसपा ने चुनाव अवधि के दौरान अपने केंद्रीय मुख्यालय या राज्य इकाई स्तर पर फंड जुटाने की कोई जानकारी घोषित नहीं की. बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 161 राजनीतिक दल मैदान में थे, लेकिन एडीआर का विश्लेषण उन 10 प्रमुख पार्टियों तक सीमित रहा, जिनके खर्च का डेटा उपलब्ध था.
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