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कला-संस्कृति

रथ तैयार, महाप्रभु का इंतजार... पुरी में कल निकलेगी रथयात्रा, नैनासर और छेरा पहरा के बाद रथ पर विराजेंगे जगन्नाथ

विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:09 PM IST
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ओडिशा के पुरी में रथयात्रा की तैयारी पूरी हो चुकी है. रथयात्रा को अब सिर्फ कुछ घंटे बाकी है. भगवान का 'अनासर' विधान पूरा हो चुका है. अब नैनासर उत्सव के बाद 'नवजौबना' दर्शन होंगे. इस धार्मिक अनुष्ठान में भगवान की आरती कर नजर उतारी जाएगी और फिर पुरी के महाराजा गजपति रथ पर सोने की मूंठ वाली झाड़ू से 'छेहरा पहरा' करेंगे. इसमें वह रथ को बुहारकर साफ करते हैं और फिर इसके बाद ही अपने-अपने रथों पर तीनों देवता विराजमान किए जाएंगे.

(Photo- ANI)
 

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तीनों रथों के अलग-अलग रंग

भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष है और इसका रंग लाल और पीला होता है. भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है और इसका रंग लाल और हरा (कई मान्यताओं में नीला भी) होता है. वहीं देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है और इसे लाल और काले रंग के कपड़ों से सजाया जाता है. तीनों रथों को निर्धारित तरीके से सजाया जाता है. हर एक रथ के चारों तरफ नौ पार्श्व देवताओं की मूर्ति बनाई जाती है. सभी रथों पर बहुत सुंदर चित्रकारी का इस्तेमाल करके अलग-अलग देवी-देवताओं के बेहद सुंदर चित्र बनाए जाते हैं. 
 (Photo- ANI)

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सिंहद्वार पर खड़े किए जाते हैं रथ

तीनों रथों पर एक सारथी और चार घोड़े बने होते हैं. तीनों रथों को सुंदर तरीके से सजाने के बाद इन्हें जगन्नाथ मंदिर के पूर्वी द्वार जिसे सिंहद्वार भी कहा जाता है, उसके सामने खड़ा कर दिया जाता है. रथ निर्माण प्रक्रिया में पवित्रता का भी ध्यान रखना होता है. रथ यात्रा के दौरान आए चढ़ावे को मंदिर के अधिकारी इन्हीं कारीगरों के बीच बांट देते हैं, जो लोग पीढ़ियों से इन रथों का निर्माण करते आ रहे हैं. रथ यात्रा के बाद रथों की लकड़ियां अलग-अलग कर दी जाती हैं, उनका धार्मिक महत्व होने के कारण श्रद्धालु उन्हें मंदिर से ले सकते हैं. रथों के पहिए संभाल कर रखे जाते हैं. (Photo- ANI)
 

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लकड़ी के 832 टुकड़ों से बनता है नंदीघोष रथ

भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र तीनों के लिए अलग-अलग रथ होते हैं. हर रथ की ऊंचाई, लंबाई चौड़ाई और रंग अलग होता है. इसके अलावा तीनों रथों के नाम भी अलग-अलग होते हैं. इन रथों के निर्माण में काष्ठ की संख्या, पहियों की संख्या भी अलग-अलग होती है. भगवान जगन्नाथ जी के रथ नंदीघोष को बनाने में कारीगर लकड़ी के 832 टुकड़ों का प्रयोग करते हैं. (Photo- ANI)

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जगन्नाथ जी के रथ पर होती है त्रैलोक्य मोहिनी पताका

16 चक्कों पर खड़े नंदीघोष रथ की ऊंचाई 45 फीट होती है तो वहीं इसकी लंबाई 34 फीट होती है. रथ के सारथी का नाम दारुक, रक्षक गरुण, रथ की रस्सी शंखचूर्ण नागुनी और रथ पर त्रैलोक्य मोहिनी पताका फहराती है. इस रथ को जो चार घोड़े खींचते हैं, उनके नाम शंख, बहालक, सुवेत और हरिदश्व हैं. जगन्नाथ जी के रथ पर नौ देवता भी सवार होते हैं. इनमें वराह, गोवर्धन, कृष्णा, गोपीकृष्णा, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रुद्र शामिल होते हैं. जगन्नाथ जी के रथ की पताका को गरुणध्वज और कपिध्वज भी कहा जाता है. (Photo- ANI)
 

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देवी सुभद्रा के रथ की रक्षिका हैं जयदुर्गा देवी

बहन सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन रथ है. इसे दर्पदलन भी कहते हैं. इसमें कुल काष्ठ खंडों की संख्या 593 होती है और 12 चक्कों पर खड़ा यह रथ महज 31 फीट लंबा 43 फीट ऊंचा होता है. खुद अर्जुन ही इस रथ के सारथी हैं और रथ की रक्षिका जयदुर्गा देवी हैं. रथ में लगे रस्से का नाम स्वर्णचूड़ नागुनी है और इस रथ की पताका नदंबिका कहलाती है. देवी सुभद्रा के रथ को जो चार घोड़े खींचते हैं उनके नाम रुचिका, मोचिका, जीत और अपराजिता हैं. (Photo- ANI)
 

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बलभद्र जी के रथ की पताका है 'उन्नानी'

बलभद्र जी का रथ तालध्वज कहलाता है जो कि सबसे अधिक काष्ठ खंडों 763 टुकड़ों से बनता है. इसमें कुल चक्के 14 होते हैं और इसकी ऊंचाई, 44 फीट होती है. रथ की लंबाई 33 फ़ीट है. इसके सारथि का नाम मातली, रक्षक का नाम वासुदेव, रस्से का नाम वासुकि नाग, पताका उन्नानी कहलाती है. रथ में चार घोड़े हैं जिनके नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम, स्वर्ण नाभ हैं. (Photo- ANI)
 

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पुरी में रथयात्रा की परंपरा एतिहासिक तौर लगभग 1200 साल पुरानी मानी जाती है. मान्यता है कि इस दिन भगवान गर्भगृह से निकलकर खुद भक्तों के बीच आते हैं. इसमें उनके दर्शन में आम-खास सभी शामिल हो जाते हैं. इसे भक्त-भगवान का मिलन उत्सव भी कहा जाता है. रथ की रस्सी खींचना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. इस रथयात्रा के जरिए भगवान गुंडिचा मंदिर तक पहुंचते हैं. गुंडिचा देवी को भगवान की मौसी माना जाता है.

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