पुरी में जगन्नाथ रथयात्रा को अब हफ्ते भर का ही समय बचा है. इस समय भगवान एकांतवास में हैं और इसे 'अनासर' विधान कहते हैं. इस बार रथयात्रा का आयोजन 16 जुलाई को होने वाला है. पुरी की यह रथयात्रा जितनी विश्वप्रसिद्ध है, उससे भी अधिक रोचक है यहां रथ निर्माण की प्रक्रिया. इस दौरान रथ का निर्माण कार्य अंतिम चरणों में हैं और इसके सजावट का कार्य तेजी से जा रही है. अगले कुछ तीन-चार दिन में ही रथों को तैयार करके पुरी जगन्नाथ मंदिर के सिंह द्वार पर खड़ा कर दिया जाएगा. रथयात्रा से एक दिन पहले 'नैनासर' उत्सव मनाया जाएगा और इसके बाद श्रीमंदिर से देव प्रतिमाओं को बाहर लाकर रथ में बिठाया जाएगा. (Photo- PTI)
रथयात्रा पुरी का वार्षिक त्योहार है और वर्ष में एक बार होने वाले इस उत्सव की तैयारी पूरे साल चलती रहती है. इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण वसंत पंचमी का दिन होता है, जिस दिन से रथ बनना शुरू होता है. तब से लेकर रथयात्रा निकलने तक लगभग छह महीने हो जाते हैं. बाकी के छह महीने भी हर दिन रथयात्रा से ही जुड़ा कुछ न कुछ होता ही रहता है. (Photo- PTI)
यात्रा के लिए रथों के निर्माण की प्रक्रिया सबसे खास है. भगवान के रथ निर्माण के विधान बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाते हैं. इसमें लकड़ी की खोज, उनकी कटाई से लेकर उन्हें रथ निर्माण शाला में रखे जाने तक सभी कार्य एक अनुष्ठान की तरह होता है. रथ निर्माण के कारीगरों और कलाकारों की भी एक तय व्यवस्था है, जिसमें हर कारीगर को उसका काम बांटा गया है. काम बंटे होने के साथ ही उस कारीगर का नाम भी तय होता है, जिसे उसकी उपाधि दी जाती है. इनमें सबसे पहले महाराणा आते हैं. महाराणा लोगों का कार्य लकड़ी को खोजकर, उन्हें लाकर रथशाला में रखना होता है. इसके बाद आते हैं, गुणकार. गुणकार लोगों का काम रथ के आकार के मुताबिक लकड़ियों का आकार तय करना होता है. फिर उन्हें उसी आकार और लंबाई-चौड़ाई में काटा जाता है. (Photo- PTI)
गुणकार के बाद अगले हैं पहि महाराणा. यह कारीगर रथ के पहियों से जुड़ा काम देखते हैं. इससे अगले दर्जे पर होते हैं, कमर कंट नायक, जिनकी जिम्मेदारी होती है कि वह रथ के लिए कीलें, एंगल, अकुड़े तैयार करें और उन्हें जरूरी जगहों पर सेट करके लगा दें. चौथे स्थान पर चंदाकार लोग या कारीगर आते हैं. यह रथ में बनने वाली अलग-अलग आकृतियां, अल्पनाएं, कंगूरे वगैरह उकेरते हैं. बेल-बूटे बनाने का काम भी इन कारीगरों का होता है. (Photo- PTI)
चंदाकार लोगों को रथों के अलग-अलग बन रहे हिस्सों को आपस में जोड़ने और सजाने का काम सौंपा गया है. अगले स्थान पर आने वाले रूपकार और मूर्तिकार लोग रथ में लगने वाली लकड़ियों को काटते हैं और उन्हें तराशने का काम करते हैं. चित्रकारों के हिस्से रथ पर रंग-रोगन और चित्रकारी का काम होता है. फिर अगले दर्जे पर सुचिकार या दरजी सेवक रथ की सजावट के लिए कपड़े सिलते हैं. सबसे आखिरी में आते हैं रथ भोई जो कि प्रमुख कारीगरों के सहायक और मजदूर होते हैं. बिना इनके रथ निर्माण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह हर कारीगरों के लिए सहायता करते हैं. खास बात है कि पुरी में रथ का निर्माण करने वाले सदियों से एक ही पीढ़ी के लोग हैं और इन्हें इस काम की जानकारी वंशानुगत है. (Photo- PTI)
पुरी में रथनिर्माण का का उत्सव बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है. इस दिन रथखला जिसे रथ निर्माण शाला कहते हैं, उसकी पूजा होती है और एक दल पेड़ों को चुनने के लिए निकल जाता है. यह दल महाराणा कहलाता है. पेड़ों का चुना जाना और उन्हें काटकर लाने की भी प्रक्रिया में बहुत संजीदगी बरती जाती है. पुरी के पास स्थित जिले दसपल्ला के जंगलों से ही पेड़ चुने जाते हैं. इसके लिए नारियल और नीम के पेड़ ही काटकर लाए जाते हैं. नारियल के तने लंबे होते हैं. इनकी लकड़ी हल्की होती है, लेकिन इससे पहले यहां एक वनदेवी की पूजा होती है. उस जंगल के गांव की देवी की अनुमति के बाद ही लकड़ियां लाई जाती हैं. पहला पेड़ काटने के बाद पूजा होती है. फिर गांव के मंदिर में पूजा के बाद ही लकड़ियां पुरी लाई जाती हैं. (Photo- PTI)
रथ निर्माण में सबसे अहम तिथि अक्षय तृतीया होती है. महाराणा लोग अक्षय तृतीया से पहले पवित्र लकड़ियों को मंदिर के रथखला भवन में पहुंचा देते हैं. अक्षय तृतीया वाले दिन मंदिर में विशेष पूजा होती है और इसी दिन रथखला में रथ निर्माण का कार्य शुरू किया जाता है. सभी कारीगर जुटते हैं, औजार और लकड़ी की पूजा करते हुए उन्हें हल्दी-चंदन के लेप से पूजन कर निर्माण की तैयारी शुरू करते हैं. इसके बाद ही रथ बनाने के लिए लकड़ियों का काटना-चीरना आदि शुरू होता है. (Photo- PTI)
तीनों रथों को निर्धारित तरीके से सजाया जाता है. हर एक रथ के चारों तरफ नौ पार्श्व देवताओं की मूर्ति बनाई जाती है. सभी रथों पर बहुत सुंदर चित्रकारी का इस्तेमाल करके अलग-अलग देवी-देवताओं के बेहद सुंदर चित्र बनाए जाते हैं. तीनों रथों पर एक सारथी और चार घोड़े बने होते हैं. तीनों रथों को सुंदर तरीके से सजाने के बाद इन्हें जगन्नाथ मंदिर के पूर्वी द्वार जिसे सिंहद्वार भी कहा जाता है, उसके सामने खड़ा कर दिया जाता है. रथ निर्माण प्रक्रिया में पवित्रता का भी ध्यान रखना होता है. रथ यात्रा के दौरान आए चढ़ावे को मंदिर के अधिकारी इन्हीं कारीगरों के बीच बांट देते हैं, जो लोग पीढ़ियों से इन रथों का निर्माण करते आ रहे हैं. रथ यात्रा के बाद रथों की लकड़ियां अलग-अलग कर दी जाती हैं, उनका धार्मिक महत्व होने के कारण श्रद्धालु उन्हें मंदिर से ले सकते हैं. रथों के पहिए संभाल कर रखे जाते हैं. (Photo- PTI)