सोने सी चमक, आसमान सी ऊंचाई... अक्षरधाम मंदिर में एक पैर पर खड़ी विशालकाय सुनहरी प्रतिमा किसकी

नई दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर परिसर में भगवान स्वामिनारायण की बाल्यकाल की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जा रही है, जो उनकी कठिन तपस्या और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है.

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अक्षरधाम मंदिर में श्रीनीलकंठ वर्णी की प्रतिमा स्थापित हो रही है. ऐसी ही प्रतिमा न्यूजर्सी के रॉबिंसविले में स्थापित है. अक्षरधाम मंदिर में श्रीनीलकंठ वर्णी की प्रतिमा स्थापित हो रही है. ऐसी ही प्रतिमा न्यूजर्सी के रॉबिंसविले में स्थापित है.

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 09 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:00 AM IST

अक्षरधाम फ्लाइओवर से आते-जाते नजर एक ऊंची प्रतिमा पर टिक जाती है. सुनहरी चमक वाली, दोनों हाथों को ऊपर उठाए और एक पांव पर खड़ी ये प्रतिमा अक्षरधाम मंदिर के कैंपस में स्थापित हो रही है. हालांकि आधिकारिक तौर पर प्रतिमा का अनावरण अभी नहीं हुआ और इसके आधार का निर्माण अभी जारी है, फिर भी प्रतिमा की भव्य ऊंचाई अक्षरधाम के आस-पास से गुजर रहे रास्तों और फ्लाईओवर से आकर्षण का केंद्र बन रही है. इस आकर्षण में ये सवाल भी छिपा है कि मंदिर परिसर में स्थापित हो रही यह प्रतिमा किसकी है.

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अक्षरधाम मंदिर से जुड़ी ऑफिशियल वेबसाइट पर इसकी जानकारी दी गई है. वहीं इसके इंस्टापेज पर भी पोस्टर फोटो अपलोड है, जिसमें 'स्वामिनारायण अक्षरधाम, नई दिल्ली में इस प्रतिमा की स्थापना की जानकारी दर्ज है. यहां बताया गया है कि यह प्रतिमा अक्षरधाम मंदिर में स्थापित भगवन श्रीस्वामिनारायण की बाल्यकाल यानी बचपन की है. प्रतिमा की ऊंचाई 108 फीट की है. इस दौरान उनका नाम श्रीनीलकंठ वर्णी था और प्रतिमा में उनकी कठिन तपस्या की स्थिति को दिखाया गया है. यह दिव्य मूर्ति तप, त्याग और आध्यात्मिक अनुशासन का जीवंत प्रतीक है. मूर्ति का विधि-विधान से अनावरण और पूजन 2026 के मार्च के अंत में बताया जा रहा है, हालांकि अभी इसकी तय तारीख सामने नहीं आई है. 

क्या है प्रतिमा की खासियत?
श्रीनीलकंठ वर्णी की यह प्रतिमा भगवान स्वामिनारायण के बाल्यकाल के किशोर योगी स्वरूप को सामने रखती है. मूर्ति में वे एक पैर पर खड़े हैं. दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाए गहरे ध्यान की अवस्था में हैं. यह वही योग-मुद्रा है, जिसमें वह नेपाल के 'मुक्तिनाथ' में लंबी तपस्या के दौरान स्थिर रहे थे. यह प्रतिमा उनकी उस पवित्र तीर्थयात्रा और कठोर साधना का स्मरण है, जो उन्होंने मानवता के आध्यात्मिक कल्याण के लिए की.

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कौन हैं श्नीनीलकंठ वर्णी?
भगवान स्वामिनारायण का जन्म '1781 ईस्वी' में उत्तर प्रदेश में गोंडा जिले के पास स्थित 'छपिया' गांव में हुआ. उनका बचपन छपिया और अयोध्या में बीता. यहां उनके माता-पिता ने उनका नाम घनश्याम रखा था. '29 जून 1792' को मात्र '11 वर्ष' की आयु में उन्होंने गृह त्याग कर सांसारिक जीवन से विरक्ति ली और ‘नीलकंठ वर्णी’ नाम धारण किया. इसके बाद वह लंबा पदयात्रा पर निकल पड़े. यह पैदल यात्रा उन्होंने लगातार सात वर्ष तक जारी रखी और इस दौरान उन्होंने सभी तीर्थों के दर्शन करते हुए लगभग '12,000 किलोमीटर' की दूरी तय की जो वर्तमान भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश तक फैली हुई थी.

नंगे पांव, केवल एक साधारण लंगोट धारण किए, बिना धन और किसी सांसारिक संपत्ति के नीलकंठ वर्णी अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ते रहे. उन्होंने हिमालय की बर्फीली और दुर्गम चोटियों को पार किया, पूर्वी भारत के घने जंगलों से गुजरे, दक्षिण भारत के फैले हुए समुद्री तटों की यात्रा किया और पश्चिम भारत के विशाल भूभाग को भी नापा. 

अपनी इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों, उत्तर में 'बद्रीनाथ और केदारनाथ', दक्षिण में 'तिरुपति और रामेश्वरम', तथा पश्चिम में 'पंढरपुर और सोमनाथ' का दर्शन किया. सभी जगहों पर श्रीनीलकंठ वर्णी ने विभिन्न मतों और पृष्ठभूमियों के लोगों से अध्यात्म पर गहराई  से बातचीत की. उन्होंने जीवन और अध्यात्म के मूल तत्वों पर प्रकाश डाला और असंख्य लोगों को 'मोक्ष' के मार्ग की दिशा दिखाई.

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कई मौकों पर वह कई-कई दिनों तक बिना अन्न और जल के रहे. 'मानसरोवर' और 'जगन्नाथ पुरी' जैसे पवित्र स्थलों पर उन्होंने कठोर तपस्याया की. इसी क्रम में जब वह नेपाल के 'मुक्तिनाथ' तीर्थ पहुंचे तब वहां उन्होंने अपनी सबसे कठिन साधना की जहां वे महीनों तक एक पैर पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर उठाए, गहरे ध्यान में लीन रहे. यह भव्य प्रतिमा उसी असाधारण तप, धैर्य और भक्ति की यादगार है.

श्रीनीलकंठ वर्णी की यह यात्रा, संकल्प और सभी लोगों के हित चाहने की भावना से प्रेरित थी. उनकी यह यात्रा '21 अगस्त 1799' को गुजरात में पूरी हुई.  '21 वर्ष' की आयु में वे एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे. उन्होंने 'सनातन हिंदू धर्म' के सिद्धांतों और परंपराओं को फिर से जीवित किया और समाज के उत्थान कई सामाजिक और आध्यात्मिक पहल कीं. इस तरह वह बचपन में घनश्याम, कठिन तपस्या में नीलकंठ वर्णी और फिर अपने दिव्य गुणों और तपस्या के फल के कारण अनगिनत श्रद्धालुओं के हृदय में 'परब्रह्म भगवान श्रीस्वामिनारायण' के रूप में स्थापित हुए और पहचाने गए. 

न्यूजर्सी के रॉबिंसविले में अक्षरधाम मंदिर नें श्रीनीलकंठ वर्णी की प्रतिमा

देश ही नहीं विदेशों में भी स्थापित हैं नीलकंठ वर्णी की भव्य प्रतिमाएं
श्रीनीलकंठ वर्णी की भव्य प्रतिमाएं देश ही नहीं विदेशों में भी स्थापित हैं. दुनिया भर में बोचासनवासी अक्षरपुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS) द्वारा स्थापित स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिरों में स्वामी नारायण के तप मुद्रा में किशोर अवस्था की प्रतिमाएं समय-समय पर स्थापित की गई हैं. गांधीनगर, गुजरात के अक्षरधाम परिसर में 49 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित हैं. वहीं न्यूजर्सी के रॉबिंसविले में स्थित अक्षरधाम में भी यह तपोमूर्ति स्थापित है. ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में भी उनकी एक ऊंची प्रतिमा लगाई गई है जो आकर्षण का केंद्र है.जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में भी नीलकंठ वर्णी की 42 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो अफ्रीकी महाद्वीप की ऊंची कांस्य प्रतिमाओं में से एक है.

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आप अक्षरधाम के रास्ते से आते-जाते हुए जिस भव्य ऊंची प्रतिमा को देख रहे हैं वह अक्षरधाम मंदिर में स्थापित श्रीस्वामीनारायण की तप मूर्ति है, जिन्हें श्रीनीलकंठ वर्णी के नाम से जाना जाता है. 

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