घर की छत, बालकनी या छोटे प्लॉट में बनाए जाने वाले किचन गार्डन में सब्जियों और पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए खाद (fertilizer) सबसे अहम भूमिका निभाती है लेकिन अक्सर लोग यह गलती कर बैठते हैं कि ज्यादा खाद डालने से पौधे और तेजी से बढ़ेंगे, जबकि हकीकत इसके उलट हो सकती है.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किचन गार्डन में सबसे सुरक्षित विकल्प ऑर्गेनिक खाद होती है, जैसे कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी हुई खाद. यह मिट्टी को धीरे-धीरे पोषण देती है और पौधों को लंबे समय तक फायदा पहुंचाती है. आमतौर पर हर 15 से 30 दिन के अंतराल पर हल्की मात्रा में खाद देना पर्याप्त माना जाता है, लेकिन यह पौधों के प्रकार और मौसम पर भी निर्भर करता है.
पौधों की जरूरत समझना सबसे जरूरी है, जैसे पत्तेदार सब्जियां-पालक, धनिया, मेथी को ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत होती है, लेकिन हल्की और नियमित मात्रा में. वहीं टमाटर, मिर्च, बैंगन जैसे फल देने वाले पौधों को संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की जरूरत होती है. अगर किसी एक तत्व की अधिकता हो जाए तो पौधा असंतुलित तरीके से बढ़ने लगता है.
ज्यादा फर्टिलाइज़र डालने का सबसे बड़ा नुकसान मिट्टी पर पड़ता है. मिट्टी में लवण (salts) जमा होने लगते हैं, जिससे उसकी प्राकृतिक संरचना बिगड़ जाती है. इससे पौधों की जड़ों को पानी और पोषक तत्व सही तरीके से नहीं मिल पाते. परिणामस्वरूप पत्तियां जलने लगती हैं, किनारों से सूखने लगती हैं या पीली पड़ जाती हैं. कई बार पौधा हरा-भरा दिखता है, लेकिन उसमें फूल और फल कम आते हैं.
इसके अलावा ओवर फर्टिलाइज़ेशन से पौधों की जड़ें “बर्न” हो सकती हैं, यानी वे कमजोर होकर सड़ने लगती हैं. यह स्थिति खासतौर पर तब होती है जब केमिकल फर्टिलाइज़र ज्यादा मात्रा में और बार-बार दिया जाता है. इससे पौधे की ग्रोथ रुक जाती है और वह जल्दी खराब भी हो सकता है.
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच (soil testing) कराना सबसे सही तरीका है. इससे यह पता चलता है कि मिट्टी में कौन सा पोषक तत्व कम है और किसकी ज्यादा जरूरत है. बिना जांच के अंदाज़े से खाद डालना अक्सर नुकसानदायक साबित होता है.
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि मौसम के अनुसार भी खाद की जरूरत बदलती रहती है. गर्मियों में पौधों को हल्की और संतुलित फीडिंग चाहिए होती है, जबकि बारिश के मौसम में ज्यादा नमी होने के कारण अतिरिक्त खाद की जरूरत कम हो जाती है.
आजतक एग्रीकल्चर डेस्क