दुनिया को मानवाधिकारों पर ज्ञान देने वाले अमेरिका की पोल खुल गई है. 2025 में उसने फांसी का अपने 16 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. 2025 के दौरान अमेरिका में 47 लोगों को मौत की सजा दी गई, जो 2009 के बाद से सबसे अधिक है.
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन सरकार आने के बाद मौत की सजा के पक्ष में राजनीतिक माहौल बना है. इस तरह के मामलों में अब अदालतों की दखलअंजादी भी कम हुई है. 'Death Penalty Information Center 2025' रिपोर्ट में यह आंकड़ा देते हुए कहा गया कि यह रुझान 'निर्वाचित प्रतिनिधियों के फैसलों और जनता की राय के बीच बढ़ते अंतर' को दिखाता है.
अमेरिका के जनमत सर्वेक्षणों में लंबे समय से फांसी की सजा के समर्थन में गिरावट दर्ज की जा रही है. अमेरिका के कुछ राज्यों ने विवादित या नए तरीकों से फांसी देने की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया. इस तरह के मामलों में नाइट्रोजन गैस और फायरिंग स्क्वॉड के जरिए मौत की सजा दी जाती है. फांसी की सजा के मामलों में फ्लोरिडा में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई है जहां 2025 में 19 लोगों को फांसी दी गई.
रिपोर्ट में कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि फांसियों की बढ़ती संख्या नीति में बदलाव और फेडरल अदालतों की निगरानी में कमी को दिखाती है. एक अकादमिक ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था 'बिना किसी सुरक्षा जाल के काम करने वाला सिस्टम' है.
सऊदी अरब में भी फांसी के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई है. मानवाधिकार संगठनों और विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब में कड़े ड्रग कानूनों की वजह से फांसी के मामले बढ़े हैं.
सऊदी अरब में 2025 के दौरान कुल 356 लोगों को फांसी दी गई, जो किसी एक साल में दर्ज किया गया अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.
विश्लेषकों के अनुसार, यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से देश की कथित ‘ड्रग्स के खिलाफ जंग’ से जुड़ी है. जिन लोगों को फांसी दी गई, उनमें से कई को सालों पहले गिरफ्तार किया गया था और अदालती प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस साल उन्हें सजा सुनाई गई. रिपोर्ट में दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में हुई 356 फांसियों में से 243 मामले ड्रग्स से जुड़े थे.
फांसी पर आलोचना के बीच सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ड्रग्स से जुड़े अपराधों में फांसी की सजा पर अस्थायी रोक लगा दी थी. लेकिन करीब तीन साल के अंतराल के बाद सऊदी अरब ने 2022 के अंत में ड्रग अपराधों में फांसी की सजा को फिर से लागू किया था. ऐसे मामलों में जिन लोगों को मौत की सजा दी गई, उनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की थी.
सऊदी अरब 'विजन 2030' के तहत अपनी रूढ़िवादी इस्लामिक छवि को सुधार रहा है. लेकिन उसके मानवाधिकार रिकॉर्ड में ये फांसी की सजाएं एक दाग की तरह हैं जिसपर उसकी आलोचना होती रही है.