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विश्व

72 साल की Sri Lanka Army, 30 साल तक LTTE से लड़ती रही...अब ये हैं हालात

Sri Lanka Army
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72 साल की श्रीलंकाई सेना ने तीन दशकों तक सिर्फ और सिर्फ लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (LTTE) के साथ संघर्ष में शामिल रही. इसे श्रीलंका का सिविल वॉर (Sri Lankan Civil War) कहा जाता है. ग्लोबल फायर पावर के अनुसार 142 देशों की सूची में श्रीलंकाई सेना की रैंकिंग 79 है. इसके पास 2.66 लाख मिलिट्री जवान हैं. जिसमें से ढाई लाख सक्रिय सेवा में हैं. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंकाई सेना (Sri Lanka Army - SLA) ने 20 से 40 हजार जवानों को रिजर्व में रखा है.18 हजार जवान नेशनल गार्ड में हैं. इसके अलावा 11 हजार जवान पैरामिलिट्री फोर्स में हैं. श्रीलंका की सेना के पास 182 टैंक्स मौजूद हैं. 600 से ज्यादा बख्तरबंद वाहन है. सेल्फ प्रोपेल्ड आर्टिलरी नहीं है. लेकिन खींचकर ले जाने वाली 164 तोपें सेना के पास हैं. SLA के पास 22 रॉकेट प्रोजेक्टर्स यानी लॉन्चर्स हैं. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंकाई सेना के कमांडर-इन-चीफ राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षा (President Gotabaya Rajapaksa) हैं. श्रीलंकाई सेना के 13 डिविजन हैं. एक एयर-मोबाइल ब्रिगेड, एक कमांडो ब्रिगेड, एक स्पेशल फोर्सेज ब्रिगेड, एक स्वतंत्र बख्तरबंद ब्रिगेड, तीन मैकेनाइज्ड इन्फैन्ट्री ब्रिगेड्स और 40 से ज्यादा इन्फैन्ट्री ब्रिगेड्स हैं. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंका में सैन्य कार्रवाई का इतिहास तो 543 ईसा पूर्व के समय से मिलता है. लेकिन आधुनिक सैन्य का विकास 1881 से शुरु होता है. जब श्रीलंका में गैर-ब्रिटिशन नागरिकों को सीलोन लाइट इन्फैन्ट्री वॉलंटियर्स (CLIV) में शामिल कराया जाता है. यह शुरु करने से ठीक पहले 1874 में सीलोन राइफल रेजिमेंट को खत्म कर दिया गया था. इससे श्रीलंका में काफी विरोध महसूस किया जा रहा था. बाद में CLIV के सात अन्य यूनिट्स बन गए. (फोटोः गेटी)

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1910 में CLIV एक पूरी सेना में बदल चुकी थी. इसे सीलोन डिफेंस फोर्स (Ceylon Defence Force - CDF) नाम दिया गया. इस सेना को 1922 में ब्रिटिश सरकार की ओर से किंग्स एंड रेजिमेंटल कलर्स से सम्मानित किया गया. पहले विश्व युद्ध के समय CDF के कई अधिकारी और सैनिक ग्रेट ब्रिटेन की तरफ से जंग में शामिल हुए थे. 40 के दशक तक आते-आते कोलंबो में CDF का मुख्यालय बना दिया गया. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंका को बाहर से किसी देश से हमला होने का कोई खतरा था नहीं, इसलिए सेना का विकास भी बेहद धीमा हो रहा था. 1950 तक आते-आते श्रीलंकाई सेना का काम सिर्फ देश की आंतरिक सुरक्षा का संतुलन बनाना ही बचा था. 1952 में सीलोन सेना के कमांडर मेजर जनरल एंटोन मुट्टुकुमारू ने ऑपरेशन मॉन्टी चलाया था. ताकि उत्तर-पश्चिम तट से आने वाले अवैध दक्षिण-भारतीय घुसपैठियों को रोका जा सके. इन्हें स्मगलर्स लेकर जाते थे. (फोटोः गेटी)

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1962 में सैन्य विद्रोह की नौबत भी आई लेकिन उसे शुरु होने से कुछ घंटे पहले ही शांत कर दिया गया. इसके बाद से श्रीलंकाई सरकार का अपनी सेना से भरोसा उठ गया. सेना के आकार को छोटा कर दिया गया. खासतौर से वॉलंटियर्स फोर्स को. कई यूनिट्स को प्रतिबंधित दिया गया है. 1971 में सेना को विद्रोहियों का सामना करना पड़ा. इसे जेवीपी आंदोलन (JVP Insurrection) कहते हैं. (फोटोः गेटी)

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1970 के दशक से ही श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में तमिल आंतकी समूह LTTE के साथ श्रीलंकाई सेना की छिटपुट जंग शुरु हो गई. भारत यहां पर शांतिदूत बनकर श्रीलंकाई सेना की मदद करता है. हालांकि शुरुआत में जो मदद लग रही थी, वो बाद में भारी पड़ती नजर आ रही थी. क्योंकि इसी समय का फायदा उठाकर फिर से जेवीपी विद्रोह शुरु हुआ. अब श्रीलंका की सेना दक्षिण और उत्तर दोनों ही तरफ मुकाबला कर रही थी. यह जंग 1987 से 1989 तक चलती रही. (फोटोः गेटी)

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इस दौरान श्रीलंका की सेना में 30 हजार से ज्यादा जवानों की भर्ती की गई. नए रेजिमेंट्स बनाए गए. कुछ को पारंपरिक युद्ध की ट्रेनिंग दी गई तो कुछ को घुसपैठ और आतंकवाद रोकने की. LTTE के साथ चल रही जंग के बीच कई बार शांति समझौते भी हुए. आखिरी समझौता 2002 में हुआ था. लेकिन दिसंबर 2005 में यह टूट गया. सेना ने लिट्टे के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया. (फोटोः गेटी)

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19 मई 2009 को श्रीलंका की सेना ने LTTE के खिलाफ तब विजय की घोषणा की जब उन्होंने लिट्टे प्रमुख वी. प्रभाकरण (Velupillai Prabhakaran) का शव मिला. इस समय लिट्टे के कब्जे वाला जाफना श्रीलंकाई सेना के कब्जे में आ चुका था. इसके बाद श्रीलंका के सेना ने चैन की सांस ली. लेकिन बहुत ज्यादा विकास अब भी नहीं हुआ है. 1980 के दशक में लिट्टे से संघर्ष के दौरान श्रीलंकाई सेना को जितना आगे बढ़ना था बढ़े. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंकाई सेना के पास इस समय हर तरह के छोटे हथियार, एंटी-एयरक्राफ्ट गन्स, हैवी मशीन गन्स, RPG, नाइट विजन डिवाइसेस, ग्रैनेड लॉन्चर्स, स्नाइपर राइफल्स, एंटी-टैंक हथियार आदि मौजूद हैं. श्रीलंकाई सेना ने 2000 में पहली बार मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर्स का उपयोग किया था. (फोटोः गेटी)

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श्रीलंका इस समय सबसे ज्यादा भरोसा चीन पर करती है. वह वर्तमान में ज्यादातर हथियारों का आयात या खरीद-फरोख्त चीन की कंपनियों और सेना के साथ करती है. हालांकि अब श्रीलंकाई सेना स्वदेशी हथियारों की ओर बढ़ रही है. उसने हाल ही मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर बनाया है. जिसकी रेंज 20 किलोमीटर है. (फोटोः गेटी)