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70 साल बाद चीते तो आ गए, क्या सोनचिरैया, काला हिरण सहित इन जानवरों को बचा पाएंगे हम?

कूनो नेशनल पार्क, जहां आठ चीते आए हैं, वहीं पर तीन जानवर लुप्त होने की कगार पर है. जैसे ग्रासलैंड यानी घास के मैदान के लिए चीते जरूरी थे. वैसे ही इन जीवों के लिए ग्रासलैंड जरूरी हैं. रहने की जगह और जानवर एकदूसरे के लिए बने हैं. दोनों में से एक भी कम होगा तो दूसरा खत्म हो जाएगा.

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ये हैं वो तीन प्रजाति के जीव अब कूनो नेशनल पार्क में भी कम देखने को मिलते हैं. ये हैं वो तीन प्रजाति के जीव अब कूनो नेशनल पार्क में भी कम देखने को मिलते हैं.

कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park). मध्यप्रदेश का वह घास का मैदानी इलाका जहां पर नामीबिया (Namibia) से आठ चीते (Cheetah) लाए गए. खतरनाक बात ये है कि देश से घास के मैदान (Grassland) खत्म हो रहे हैं. कूनो नेशनल पार्क में ही तीन ऐसे जीव हैं, जो लुप्त होने की कगार पर हैं. ये खत्म हो गए तो इन्हें किसी भी देश से नहीं ला पाएंगे. ग्रासलैंड की इकोलॉजी यानी पारिस्थितिकी को सुधारने के लिए जैसे चीते जरूरी हैं. वैसे ही इन जीवों को बचाने के लिए ग्रासलैंड जरूरी है. आपको बताते हैं कि ये कौन-कौन से जीव हैं. ग्रासलैंड कैसे खत्म हो रहा है. 

काले हिरण सिर्फ भारत में मिलते हैं. इनकी संख्या तेजी से घट रही है. क्योंकि घास के मैदान खत्म हो रहे हैं. (फोटोः गेटी)
काले हिरण सिर्फ भारत में मिलते हैं. इनकी संख्या तेजी से घट रही है. क्योंकि घास के मैदान खत्म हो रहे हैं. (फोटोः गेटी)

चीते तो आ गए. अभी और आएंगे. इनका कुनबा भी बढ़ेगा. लेकिन जिनका घट रहा है उन जानवरों का क्या होगा. कूनो नेशनल पार्क में काले हिरण (Black Buck), सोनचिरैया और घोड़ा बर्ड नाम से प्रसिद्ध ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) और खड़मोर या लिख के नाम से जाना जाने वाला पक्षी लेसर फ्लोरिकान (Lesser Florican) लुप्त होने की कगार पर हैं. सोनचिरैया को गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) जीवों की श्रेणी में आ चुकी है. पूरे देश में इनकी संख्या 100 के आसपास ही होगी. यह जानकारी बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के डायरेक्टर डॉ. बिवाश पांडव ने aajtak.in को दी. 

डॉ. बिवाश पांडव ने बताया कि खड़मोर यानी लेसर फ्लोरिकन नाम का पक्षी लगभग खत्म हो चुका है. ये गुजरात और मध्यप्रदेश में पाया जाता है. लेकिन संख्या इतनी कम हो चुकी है कि कभी-कभी ही किस्मत से देखने को मिलता है. सोनचिरैया हो या खड़मोर दोनों ही भारत में ही पाए जाते हैं. इसके अलावा ये किसी और देश में नहीं मिलते. दोनों ही पक्षी IUCN के क्रिटिकली एन्डेनजर्ड स्पीसीज वाली श्रेणी में रखे गए हैं. सिर्फ ये दोनों पक्षी ही नहीं, ब्लैक बक यानी काला हिरण भी इसी श्रेणी में है. हमारे लिए जैसे इन जानवरों को बचाना जरूरी है, वैसे ही इनके रहने के स्थानों को भी.

ये है ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी सोनचिरैया, जो लगभग विलुप्त हो चुकी है. देश में सिर्फ 100 के आसपास ही बचे होंगे. (फोटोः गेटी)
ये है ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी सोनचिरैया, जो देश में सिर्फ 100 के आसपास ही बचे होंगे. (फोटोः गेटी)

खतरनाक कदम... जंगल बढ़ रहे हैं, घास के मैदान कम हो रहे

डॉ. बिवाश पांडव ने बताया कि देश में जंगलों को बढ़ाने की मुहिम सरकार लगातार चला रही है. जंगल भी बढ़ रहे हैं. लेकिन ग्रासलैंड को बचाने के लिए प्रैक्टिकली कुछ नहीं हो रहा है. घास के मैदानों में पौधारोपण करेंगे तो वो आगे चलकर जंगल बन जाएंगे. फिर घास के मैदानों में रहने वाले जीवों हैबिटैट खत्म हो जाएगा. इससे उनकी प्रजाति भी खत्म हो जाएगी. देश में ग्रासलैंड की कमी की वजह से ये दिक्कत हो रही है. 

ब्रीडिंग तो करवा लेंगे लेकिन जानवरों को छोड़ेंगे कहां?

डॉ. पांडव ने बताया कि रीन्यूबल एनर्जी, ढांचागत विकास और जंगल बढ़ाने के लिए घास के मैदानों को नष्ट किया जा रहा है. इससे घास के मैदान बचेंगे नहीं. कई स्थानों पर जानवरों के ब्रीडिंग सेंटर शुरू किए गए हैं. आप ब्रीडिंग तो कर लेंगे लेकिन वापस उन्हें छोड़ेंगे कहां, अगर उन जीवों के लिए घास के मैदान ही नहीं होंगे. आजकल लोग अपने मवेशियों को चारागाह में छोड़ ही नहीं पाते. क्योंकि घास के मैदान खत्म होते जा रहे हैं. 

ये है लेरस फ्लोरिकन यानी खड़मोर. यह सुंदर पक्षी भी घास के मैदानों की कमी की वजह से लुप्त होने वाली है. (फोटोः विकिपीडिया)
ये है लेसर फ्लोरिकन यानी खड़मोर. यह सुंदर पक्षी भी घास के मैदानों की कमी की वजह से लुप्त होने वाली है. (फोटोः विकिपीडिया)

10 साल में 31% घास के मैदान कम हुए थेः रिपोर्ट

डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2005 से 2015 के बीच भारत में घास के मैदानों में 31 फीसदी की कमी आई है. देश में 56.5 लाख हेक्टेयर घास के मैदान खत्म हो गए. इसकी जानकारी केंद्र सरकार ने यूनाइटेड नेशंस कनवेंशन टू कॉम्बैट डिजर्टिफिकेशन (UNCCD) में दिया था. साल 2005 में 1.80 करोड़ हेक्टेयर घास के मैदान थे. साल 2015 तक ये घटकर 1.23 करोड़ हेक्टेयर ही बचे हैं. सबसे ज्यादा नुकसान अरावली बेल्ट में हुआ है. महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश आदि. 

लैंड यूज और प्रबंधन की स्थिति सही करने की जरुरत

घास के मैदानों के खत्म होने की बड़ी वजह है जमीन का उपयोग (Land Use) और उसका प्रबंधन (Managment). घास के मैदान दो तरह से ही खत्म होते हैं. पहला- ज्यादा चारा खाने से, खराब प्रबंधन से और जंगलों की कटाई से. दूसरा- अगर घास के मैदानों में ऊर्जा के स्रोत लगाए जाएं जैसे- विंड मिल, सोलर पावर प्लांट्स, अवैध कब्जा, ढांचागत विकास, या पौधारोपण करके उन्हें जंगल बनाया जाए तो घास के मैदान खत्म हो जाते हैं. आमतौर पर घास के मैदान कॉमल लैंड्स (Common Lands) में आते थे. इसमें घास के मैदान के साथ जंगल, तालाब, नदियां और ग्रामीण लोगोों की पहुंच वाले कुछ इलाके जिनका वो उपयोग कर सकते हैं. 

कूनो नेशनल पार्क जैसे घास के मैदानों की देश को सख्त जरुरत है ताकि हम अपने जीवों को बचा सकें. (फोटोः कार्तिकेय सिंह)
कूनो नेशनल पार्क जैसे घास के मैदानों की देश को सख्त जरुरत है ताकि हम अपने जीवों को बचा सकें. (फोटोः कार्तिकेय सिंह)

जब घास के मैदान ही नहीं होंगे, तो ये जानवर कहां रहेंगे

लेकिन साल 2005 से 2015 के बीच पूरे देश में 19 फीसदी कॉमन लैंड भी खत्म हो गए. बढ़ती आबादी. फैलते शहर. कनेक्टिविटी के लिए बढ़ती सड़कें. ऊर्जा के सोलर पावर प्लांट और विंड मिल लगाने के लिए जमीन की जरुरत. कई जगहों पर घास के मैदानों को खेती-बाड़ी के लायक जमीन में बदल दिया गया. क्योंकि इसी समय में खेती लायक जमीन 18 प्रतिशत बढ़ी है. यानी हर तरफ से घास के मैदानों को खत्म किया जा रहा है. अगर घास के मैदान ही नहीं बचेंगे. तो चीते, काले हिरण, सोनचिरैया या खड़मोर जैसे जीव कहां जाएंगे? 

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