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धर्म

बसंत पंचमी पर भूलकर भी ना करें ये 5 काम!

बसंत पंचमी पर भूलकर भी ना करें ये 5 काम!
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माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. माना जाता है कि इसी दिन शब्दों की शक्ति मनुष्य की झोली में आई थी. इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है. इस दिन पितृ तर्पण किया जाता है और कामदेव की पूजा भी की जाती है. आइए जानते हैं इस दिन कौन से काम वर्जित हैं और साथ ही सरस्वती पूजा के पीछे की पौराणिक कहानियां...
बसंत पंचमी पर भूलकर भी ना करें ये 5 काम!
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इस दिन काले और लाल रंग के वस्त्र बिल्कुल ना धारण करें. वसंत पंचमी के दिन पीले, सफेद या धानी रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए.
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यह प्रकृति का त्योहार है और हरियाली का उत्सव. अत: इस दिन फसल काटने के काम को टाल देना चाहिए. साथ ही घर में भी किसी भी पेड़ की छंटाई भी नहीं करनी चाहिए. हो सके तो इस दिन वृक्षारोपण करें.
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सरस्वती पूजा के दिन भूलकर भी किसी के लिए अनाप-शनाप ना बोलें. कहा जाता है कि इस दिन सरस्वती जुबान पर होती हैं. इसलिए अपनी वाणी पर संयम रखें और गुस्सा ना करें. किसी को बुरे बोल ना बोलें. सबके साथ मधुरता का व्यवहार करें. खुद के लिए भी कुछ बुरा या कोसने वाली बातें ना कहें क्योंकि वह सच साबित हो सकता है. आज के दिन शुभ बोले और शुभ सोचें.
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इस दिन पितृ तर्पण भी किया जाता है इसलिए घर में भूलकर भी कलह नहीं करनी चाहिए. इससे पितरों को कष्ट होता है.
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बिना स्नान किए भोजन ना ग्रहण करें. पहले सरस्वती वंदना करें और मां सरस्वती को भोग लगाएं.
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वसंत पंचमी के दिन मांसाहार और शराब का सेवन नहीं करें. केवल सात्विक भोजन करें तथा प्रसन्न रहें. आज खीर जरूर बनायें और खाएं व घर को सुगन्धित बनाये रखें.
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आज के दिन पुखराज,और मोती धारण करना अतीव लाभकारी होता है. आज के दिन स्फटिक की माला को अभिमंत्रित करके धारण करना भी श्रेष्ठ परिणाम देगा.
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सरस्वती पूजा करते समय सबसे पहले सरस्वती माता की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखना चाहिए. इसके बाद कलश स्थापित करके गणेश जी तथा नवग्रह की विधिवत् पूजा करनी चाहिए. इसके बाद माता सरस्वती की पूजा करें. सरस्वती माता की पूजा करते समय उन्हें सबसे पहले आचमन और स्नान कराएं. इसके बाद माता को फूल, माला चढ़ाएं. सरस्वती माता को सिन्दूर, अन्य श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करनी चाहिए. वसंत पंचमी के दिन सरस्वती माता के चरणों पर गुलाल भी अर्पित किया जाता है. देवी सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं. सरस्वती पूजन के अवसर पर माता सरस्वती को पीले रंग का फल चढ़ाएं. प्रसाद के रूप में मौसमी फलों के अलावा बूंदियां अर्पित करनी चाहिए. इस दिन सरस्वती माता को मालपुए और खीर का भी भोग लगाया जाता है. माघ शुक्ल पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा के बाद षष्ठी तिथि को सुबह माता सरस्वती की पूजा करने के बाद उनका विसर्जन कर देना चाहिए. संध्या काल में मूर्ति को प्रणाम करके जल में प्रवाहित कर देना चाहिए.


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सरस्वती पूजा करने बाद सरस्वती माता के नाम से हवन करना चाहिए. हवन के लिए हवन कुण्ड अथवा भूमि पर सवा हाथ चारों तरफ नापकर एक निशान बना लेना चाहिए. अब इस भूमि को कुशा से साफ करके गंगा जल छिड़ककर पवित्र करें और यहां पर हवन करें. हवन करते समय गणेश जी, नवग्रह के नाम से हवन करें. इसके बाद सरस्वती माता के नाम से 'ओम श्री सरस्वत्यै नम: स्वहा" इस मंत्र से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए. हवन के बाद सरस्वती माता की आरती करें और हवन का भभूत लगाएं.
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सरस्वती पूजन के पीछे पौराणिक मान्यताएं: श्रीकृष्ण ने की सरस्वती की प्रथम पूजा
इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी पौराणिक कथा है. इनकी सबसे पहले पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने ही की है. देवी सरस्वती ने जब श्रीकृष्ण को देखा, तो उनके रूप पर मोहित हो गईं और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगीं. भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलने पर उन्होंने कहा कि वे तो राधा के प्रति समर्पित हैं. परंतु सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखने वाला माघ मास की शुक्ल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा. यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की.
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ब्रह्माजी ने की सरस्वती की रचना-
सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिड़क दिया. इससे सारी धरा हरियाली से भर गई, पर साथ ही देवी सरस्वती का उद्भव हुआ, जिसे ब्रह्माजी ने आदेश दिया कि वीणा और पुस्तक से इस सृष्टि को आलोकित करें. तभी से देवी सरस्वती के वीणा से झंकृत संगीत में प्रकृति विहंगम नृत्य करने लगती है.
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कुंभकर्ण की निद्रा का कारण बनीं सरस्वती-
कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की. जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए, तो देवों ने निवेदन किया कि आप इसको वर तो दे रहे हैं, लेकिन यह आसुरी प्रवृत्ति का है और अपने ज्ञान और शक्ति का कभी भी दुरुपयोग कर सकता है. तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया. सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं. सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- 'मैं कई वर्षों तक सोता रहूं, यही मेरी इच्छा है.' इस तरह त्रेता युग में कुंभकर्ण सोता ही रहा और जब जागा तो भगवान श्रीराम उसकी मुक्ति का कारण बने.
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