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क्या है गालियों का मनोविज्ञान? कैसे बनते हैं 'गालीबाज', परिवेश-परंपरा-फ्रस्ट्रेशन या केमिकल लोचा?

नोएडा की एक पॉश सोसायटी, जिसमें एक शख्स एक महिला को धाराप्रवाह गालियां दे रहा है. वीडियो वायरल होते ही बवाल मच जाता है. कुछ दिन बाद नोएडा की दूसरी सोसायटी जहां एक महिला वकील एक गार्ड को बल भर गालियां दे रही होती है. यह वीडियो भी आग की तरह फैल जाता है. लेकिन लोग गालियां क्यों देते हैं, ये भाव कैसे आता है, आइए समझते हैं.

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गालीबाज श्रीकांत त्यागी और भव्या रॉय गालीबाज श्रीकांत त्यागी और भव्या रॉय

गालियां फिलहाल केंद्र में हैं. आखिर हम गाली क्यों देते हैं? क्या कोई ऐसा शख्स है जो गाली न देता हो. कहां से आईं गालियां? गालियों के केंद्र में क्यों औरतें और बेटियां ही होती हैं. क्या गाली देना ह्यूमर है? या कोई बीमारी? क्या इसके पीछे केवल संस्कार है? हिंदी, अंग्रेजी, देश, विदेश या प्रदेश कौन सी ऐसी जगह है जहां गालियां न दी जाती हों? कुछ ऐसे संबंध होते हैं जिसमें गालियां मजाक में दी जाती हैं लेकिन एक निश्चित दायरे में. लेकिन इन्हें गुस्से या सोच विचार कर दिया जाए तो यह शूल की तरह क्यों लगती हैं?  

नोएडा की एक पॉश सोसायटी, जिसमें एक शख्स एक महिला को धाराप्रवाह गालियां दे रहा है. वीडियो वायरल होते ही बवाल मच जाता है. कुछ दिन बाद नोएडा की दूसरी सोसायटी जहां एक महिला वकील एक गार्ड को बल भर गालियां दे रही होती है. यह वीडियो भी आग की तरह फैल जाता है. इस बीच कानपुर का एक वीडियो आता है जिसमें एक लड़की पड़ोसी को गालियों से नवाजे जा रही है. बाकी छोटे-मोटे वीडियो हर रोज आते रहते हैं लेकिन कोई इश्यू नहीं बनता. इश्यू तब बनता है जब लगता है कि नहीं यार ये तो ज्यादा हो गया. गौर करने की बात ये है कि गाली पुरुष दे रहा हो या महिला लेकिन गाली के केंद्र में अमूमन महिला होती है. हालांकि नोएडा की महिला वकील ने पुरुषों को भी केंद्र में रखा है. 

संस्कार, परिवेश या परिवार जिम्मेदार?

कहा जाता है कि गालियां अमूमन परिवेश से जुड़ी होती हैं. गालियों की तासीर बताती है कि आप कहां से आए हैं. 'गालीबाज' कहते हैं कि गालियों का बंद लगाने से शब्द धारदार हो जाते हैं, बात में वजन आ जाता है. भोजपुरी जैसी अनौपचारिक संस्कृतियों में गाली देने और गाली सहने की अपरंपार क्षमता होती है. कई गांवों में तो युवाओं की ऐसी जमात देखी जाती है जिन्हें गाली देना ही नहीं सुनना भी बहुत अच्छा लगता है, मजा आता है. वो टारगेट खोजते हैं. किसी कम अक्ल को चिढ़ाते हैं जो उन्हें गालियों से नवाज सके. वो कहते हैं कि अगर आपने गालियां सह लीं इसका मतलब आप अहंकार शून्य हैं. दूसरा यह भी कहा जाता है कि गालियां सहने की क्षमता बड़े-बड़ों में नहीं होती. तलवारें खिंच जाती हैं, खून खराबा हो जाता है. ऐसा माना जाता है कि अगर परिवार के लोग गालीबाज हैं तो बच्चा पक्का गालीबाज होगा. समाज से तो वह ग्रहण करेगा ही परिवार की पाठशाला से भी वह सीखेगा.   

गालियों के कैसे-कैसे रूप ?

गालियां समय, स्थान, व्यक्ति पर निर्भर नहीं करतीं. ऐसे-ऐसे गालीबाज होते हैं जिनके मुंह से गाली पहले और शब्द बाद में निकलते हैं. कई लोगों के लिए यह जरूरी नहीं कि वह किसी व्यक्ति को ही गाली दें, मंदिर की सीढ़ियों पर टकराकर भी उनके मुंह से गाली निकल जाती है. वो आसमान, बरखा, बारिश तक को सूत सकते हैं. किसी स्थान को गाली दे सकते हैं, किसी समय को गाली दे सकते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि जो ज्यादा गाली देते हैं वो दिल के साफ होते हैं. जो नहीं दे पाते वो अंदर अंदर घुनते रहते हैं. आजकल तो स्वैग भी है, स्कूल वाला, कॉलेज वाला. ओटीटी पर गालियों की भरमार ने इसे अलग तरह की स्वीकृति दे दी है. तर्क भी बड़े हैं अगर जीवन में गालियां हैं तो फिल्मों में, वेब सीरीज में क्यों नहीं.   

विवाह में गाली गीत की परंपरा 

यूपी-बिहार के अधिकांश इलाकों में अगर बरातियों को पानी पीकर न गरियाया जाए तो आज भी वो नाराज हो जाते हैं कि उनके यहां तो गाली ही नहीं दी किसी ने. जीजा-फूफा जब घर आते हैं और खाने पर बैठते हैं तो आज भी गाली देने की परंपरा बदस्तूर जारी है, हालांकि यह गीत के रूप में होती है. अब समय के साथ संकोच बढ़ रहा है. क्योंकि रिश्तों में वो जोश और अनौपचारिकता कम हो गई है. शहर में रहने वाली भाभी या ननद गांव में रहने वाली ननद या भाभी से सब ठीक है, सब ठीक है तक सीमित रह गई है. दूसरा अब अपने टाउन के प्राइवेट स्कूलों में जाने वाले बच्चों को ये नहीं सुहाता. हालांकि वे खुद हिंदी के साथ अंग्रेजी गालियां सीख रहे होते हैं. दोस्तों के साथ प्रैक्टिस भी चलती रहती है. लेकिन पापा के मुंह से गाली निकल जाए तो मतलब पूछने लगते हैं.  

क्या गालियां फ्रस्ट्रेशन का नतीजा होती हैं ? 

गालियों को फ्रस्ट्रेशन का नतीजा भी माना जाता है. जरुरी नहीं कि आप जिसे गाली दे रहे हों वो सामने मौजूद ही हो, पीठ पीछे उन सभी लोगों को गालियां दी जाती हैं जिन्हें सामने से देना नामुमकिन होता है. इसमें बिना हानि पहुंचाए दिल का गुबार निकल जाता है. ... और अगर सामने से देने का अवसर मिल जाए तो कहने ही क्या, लेकिन इसका अंजाम वैसा ही हो सकता है जैसा श्रीकांत त्यागी और भाव्या का हुआ. आमतौर पर गाली गलौज करने वाले को जाहिल, गंवार माना जाता है, उस कम भरोसेमंद माना जाता है. लेकिन यह रिसर्च का विषय है. बीबीसी में छपी एक खबर के मुताबिक बच्चा 6 साल की उम्र से ही गालियां देना शुरू कर देता है. आगे इसमें ये भी बताया गया है कि व्यक्ति अपना अच्छा खासा वक्त गालियां देने में बर्बाद करता है.

गालियों के लिए दिमाग की अलग दुनिया 

मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीफेंस ने गालियों पर अच्छा खासा काम किया है. बीबीसी में छपी उनकी रिपोर्ट के मुताबिक, आम बोलचाल के लिए हम दिमाग के एक हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन गालियों के लिए दूसरे हिस्से का, दूसरा हिस्सा पुराना है जो विकास के क्रम में पीछे छूट गया. इसलिए गंवार, मंदबुद्धि बोलने में भले ही परेशानी महसूस करे लेकिन गालियां धाराप्रवाह दे लेता है. आगे वो बताते हैं कि यूरोप में पहले गालियां धर्म को लेकर दी जाती थीं लेकिन रेनेसा यानी पुर्नजागरण के बाद के दौर में यह औरतों पर केंद्रित हो गईं, क्योंकि औरत इज्जत की प्रतीक बन गई. एशियाई देशों में पहले ही औरतें और हैसियत पर फोकस था. 

बात-बात पर गाली देने वालों में दर्द सहने की क्षमता ज्यादा
 

रिचर्ड स्टीफेंस ने अपनी रिसर्च से एक और मौजूं निष्कर्ष निकाला, उन्होंने छात्रों के दो ग्रुप बनाए. एक में उन्हें रखा जो गालियां देते थे और दूसरे में उनको जो इससे दूर रहते थे. दोनों ग्रुप के छात्रों के हाथ उन्होंने ठंडे पानी में रखने को कहा. जिन छात्रों ने गाली गलौज की उन्होंने ज्यादा देर तक ठंडे पानी में हाथ डाले रखा, दूसरा ग्रुप इसे ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाया. यह भी तय है कि आप गाली देकर कितनी राहत महसूस करते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आपको गालियां कितनी बुरी लगती हैं. 

कब हुई गालियों की शुरुआत और औरतें ही केंद्र में क्यों ? 

गालियों की शुरुआत कब हुई यह कहना मुश्किल है. वैदिक काल में महिलाओं और पुरुषों का स्थान बराबर था. संस्कृत, पाली, प्राकृत में कृपण, मूर्ख, दुष्ट जैसे शब्द ही मिलते हैं. कहा जाता है है कि गालियों की शुरुआत ब्रज क्षेत्र में हुई, कन्हैया गोपिकाओं को चिढ़ाते थे और गोपिकाएं उन्हें गालियों से नवाजती थीं. लेकिन इसे गल्प की तरह ही लिया जा सकता है. दरअसल समाज में महिलाओं की हैसियत धीरे-धीरे घटती गई. धीरे-धीरे वह प्रतिष्ठा का सवाल बन गई, पुरुषों की संपत्ति बन गईं, घर परिवार की सबसे कमजोर नस, दोयम दर्जे की नागरिक और ऐसे में उन पर प्रहार करना सबसे आसान टारगेट हो गया. दो मर्द भी आपस में झगड़ा कर रहे हों तो गाली बहन-बेटी और मां की ही दी जाती है. क्योंकि चोट सबसे ज्यादा यहीं होती है. 

कुल मिलाकर गालियां समाज का, व्यक्तित्व का हिस्सा हैं, आपके पूरे वजूद को परिभाषित करने की क्षमता रखती हैं. आप की इमेज जितनी बड़ी होगी गालियों से आप उतने ही दूर होंगे ऐसी मान्यता है. लेकिन निर्धारण तो आपके परिवेश और उस परंपरा से होगा जहां आप पले बढ़े हैं.

 

 

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