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रामायण से लेकर महाभारत तक, हर युग में संस्कारों का ह्रास

युगों की गणना प्रमुखतः दो विधियों से की जाती है. लेकिन सामान्यतः हम लोग एक ही विधि से परिचित हैं. इसलिए यह एक स्थापित मान्यता है कि कलयुग 432000 साल का होता है. अभी तो मात्र 5000 साल ही गुजरे हैं और इस हिसाब से यह जब खत्म होगा तब तक लगता है पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जाएगा.

स्टोरी हाइलाइट्स
  • संस्कारों का ह्रास 50-100 वर्षों में नहीं हुआ
  • कलयुग 432000 साल का होता है. अभी सिर्फ 5000 साल बीते हैं

पिछले 50 वर्षों से मैं सुन रहा हूं कि हमारे संस्कारों का ह्रास लगातार होता जा रहा है. बचपन में बड़े-बूढ़ों से सुना था. इसका मतलब यह हुआ कि संस्कारों का ह्रास 50-100 वर्षों में नहीं हुआ. यह एक लंबी प्रक्रिया है. कब से चली आ रही है शायद खोजने पर पता चले, वैसे पता नहीं चलता. 21वीं शताब्दी के तीसरे दशक में अगर युवाओं से यह प्रश्न पूछा जाता है तो वो अक्सर हंसकर प्रश्न को टाल देते हैं. मानों संस्कारों से उनका कोई वास्ता ही न हो.

वहीं समाज का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जिन्हें संस्कारों के ह्रास को लेकर काफी चिन्ता है और वे अपना पुरजोर लगाकर इस समस्या का निदान भी करना चाहते हैं. संस्कारों के पतन के बहुत सारे कारण हैं लेकिन जो महत्वपूर्ण कारण हमेशा बताया जाता है वो है पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव. इस आरोप को नकारा भी नहीं जा सकता. क्योंकि 19वीं सदी के प्रारम्भ से ही जब पूरी दुनिया एक गांव में सिमट गयी यानि हवाई यात्रा ने दूरियां खत्म कर दी थी. आज पूरी दुनिया में कोई सभ्यता ऐसी नहीं है जिस पर अन्य संस्कृतियों का प्रभाव न पड़ा हो. भारत में संस्कृति, सभ्यता और संस्कार आज भी जिंदा हैं, लेकिन ह्रास वहीं का वहीं है. आइए इसे डॉ. अजय भाम्बी के दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते हैं.

युगों की गणना प्रमुखतः दो विधियों से की जाती है. लेकिन सामान्यतः हम लोग एक ही विधि से परिचित हैं. इसलिए यह एक स्थापित मान्यता है कि कलयुग 432000 साल का होता है. अभी तो मात्र 5000 साल ही गुजरे हैं और इस हिसाब से यह जब खत्म होगा तब तक लगता है पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जाएगा. इसी शताब्दी के अंत तक चन्द्रमा, फिर मंगल और अन्य ग्रहों पर मनुष्य की नई सभ्यता और संस्कृति का पदार्पण हो चुका होगा. जिस तरह से हमने पृथ्वी को प्रदूषित कर रखा है, विभिन्न वायरसों का प्रकोप चल रहा है. इसके अतिरिक्त प्रत्येक देश अपने विरोधी देश को न केवल जीतना चाहता है, बल्कि नेस्तनाबूत भी करना चाहता है. आर्थिक स्वतंत्रता के दिन लद गए. कॉर्पोरेट और देश की सरकारें अपनी जेब भरना और बैंक बैलेंस को खत्म करने पर आमादा हैं. ऐसी स्थिति में संस्कृति को ढूंढना बड़ा मुश्किल कार्य है. देव गुरू बृहस्पति अपनी किताब- ‘बृहस्पताय शास्त्र’ में कहते हैं कि अगर आप व्यक्ति का धन छीन लें तो अपने आप उसका धर्म भी छिन जाता है.

नई विधि से युगों की गणना सर्वप्रथम परमहंस योगानंद के गुरू श्री युक्तेश्वर गिरि ने अपनी किताब ‘साइंस एंड रिलिजन’ जो उन्होंने 1930 के आसपास लिखी थी. उस किताब में उन्होंने युगों की गणना को इस प्रकार व्यक्त किया है. आकाश में एक विष्णु नाभि का प्वॉइंट है जो आज भी धनु राशि के नक्षत्रों पर देखा जा सकता है. यूं तो सूर्य स्थिर दिखता है, लेकिन अपनी धुरि पर निम्नतम गति से ऊपर-नीचे होता रहता है. और जैसे-जैसे सूर्य की स्थिति में बदलाव आता है उसी अनुपात में ग्रह भी आकाश में अपना स्थान बदल लेते है, क्योंकि आकाश में स्थित सौरमंडल का आधार, गुरूत्वाकर्षण बल और चुंबकीय आधार ही है. उनके अनुसार सतयुग 4800 वर्षों का, त्रेता 3600 वर्षों का, द्वापर 2400 वर्षों का और कलयुग मात्र 1200 वर्षों का होता है. इसमें भी लगभग 13000 वर्ष जो सूर्य से आने वाली किरणें है निम्न स्तरीय होती हैं और 13000 वर्ष उच्च दिशा की और गमन करती हैं. वे शुभ होती है. ये पूरी गणना 26000 वर्ष से कुछ वर्ष कम है.

श्री युक्तेश्वर गिरि जी ने यह बात तब कही थी जब नासा अपने अस्तित्व में नहीं आया था. आज नासा भी पूरी तरह से उनकी गणना से सहमत है. मात्र 1000-1200 वर्षों का अंतर है. साथ ही नासा के वैज्ञानिक युक्तेश्वर गिरि को बहुत आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. आजकल सदगुरू का प्रभाव पूरे विश्व में बड़े जोरों से बढ़ रहा है और चाहे वैज्ञानिक हो, मनोचिकित्सक हो, फिलोसोफर हो, स्पेस साइंटिस्ट हो या अन्य धर्म गुरू हों, वे सभी उनका सम्मान करते हैं. साथ ही यह कोई गुप्त जानकारी नहीं है बल्कि हर जगह उपलब्ध है.

वर्तमान में सौरमंडल से जो ऊर्जा और प्रभाव आ रहा है उसमें शुभता बहुत कम है और यह शुभता या धर्म हर युग में घटने लगते हैं. यदि हम त्रेता से जानने का प्रयास करें तो स्थिति काफी स्पष्ट हो जाती है. त्रेता तक आते-आते धर्म या संस्कारों में 25 प्रतिशत ह्रास हो चुका था. उदाहरण से समझते हैं. रावण राक्षस था और उसका व्यवहार भी राक्षस जैसा था तो जैसा उसका चरित्र वैसा उसका व्यवहार. भगवान राम के घर में उनकी चहेती मां केकैयी ही उन्हें वनवास भेजती हैं और अपने पुत्र को राजा बनाना चाहती है. यहां से अधर्म और षडयंत्र की शुरूआत होती है. मंथरा तो दासी थी इसलिए उसे अधिक दोष नहीं दिया जा सकता. बाद में सीता की परीक्षा ली जाती है. यह भी कोई धर्म संगत नहीं है. उसके बाद एक धोबी के कहने पर सीता का वनवास गमन. यह वास्तविक रामराज्य था. यहां धर्म और संस्कारों का 25 प्रतिशत क्षय हो चुका था.

फिर हम द्वापर युग में आते हैं. दो भाई हैं - एक धर्म को साधता है और उसे धर्मराज या युधिष्ठिर के नाम से जाना जाता है. दूसरा भाई अधर्म और अन्याय की पराकाष्ठा है और वो है दुर्योधन. जब भी अच्छाई-बुराई, धर्म-अधर्म और न्याय-अन्याय हो तब सिर्फ महाभारत ही हो सकती है जो हुई भी. यहां धर्म और अधर्म 50-50 प्रतिशत यानि आमने-सामने है. महाभारत में न केवल जान माल का नुकसान हुआ, बल्कि पूरा ज्ञान, विज्ञान, योग, औषधि, ज्योतिष, सभ्यता, संस्कृति सब खत्म हो गया और हम कलयुग में प्रवेश कर गए.

कलयुग को सब भुगत रहे हैं और इस पर अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है. कलयुग में 75 प्रतिशत अधर्म होता है और 25 प्रतिशत धर्म. यानि अधिकतर परिवार या सभागारों में चार व्यक्ति एक तरफ और एक व्यक्ति अलग होता है और तीन व्यक्ति जो चाहते हैं वो होता है. यहां धर्म पर व्यक्तव्य दिए जाते हैं और शास्त्र लिखे जाते हैं.

युक्तेश्वर गिरि और नासा के अनुसार हम द्वापर में प्रवेश कर चुके हैं. जब युग निम्न स्तर की ओर अग्रसर थे, तब जानकारी और विज्ञान कुछ लोगों तक ही सीमित था. वहां पर द्रोणाचार्य ही हर प्रकार के युद्ध में पारंगत कर सकता था और गलती से एकलव्य सीख ले तो उसे अपना अंगूठा देना पड़ता था.

जब युग उच्च स्तर की ओर होता है अर्थात सूर्य विष्णु नाभि की ओर अग्रसर होता है तब ज्ञान, विज्ञान, जानकारी, सुख-सुविधा, धन सामान्य होना प्रारम्भ हो जाता है. अगर स्मार्टफोन से आप समझते हैं कि बहुत ज्ञानी हैं तो समझ लीजिए आपके घर काम करने वाली बाई और नौकर भी उतने ही स्मार्ट होने की चेष्ठा में हैं.

इन परिणामों को आने में और एक व्यवस्था स्थापित होने में 70-80 वर्षों का समय लगेगा. अगर आप अगली शताब्दी में पुनः जन्म लेंगे तो फिर ये प्रश्न बेमानी हो जाएंगे और संस्कार स्वतः स्थापित होने लगेंगे.

 

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