5 सितंबर को देश डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में शिक्षक दिवस मनाता है. जबकि दुनिया के दूसरे देशों में शिक्षकों के सम्मान में यह दिवस 5 अक्तूबर को मनाया जाता है. इस अवसर पर सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रकाश मनु ने अपनी आत्मकथा का एक अंश साहित्य आजतक को भेजा है, जो उनके जीवन के अध्यापकों, प्रेरक शख्सियतों से जुड़ी स्मृतियों को लेकर है. मनु के इस आत्मकथात्मक-अंश का शीर्षक हैः जिन्होंने मुझे मिट्टी के ढेले से इनसान बनाया
***
अपने बचपन के दिनों की अबोधता और अध्यापकों को याद करता हूं, तो शब्द साथ नहीं देते. क्या लिखूं, क्या न लिखूं. मेरे सीधे-सरल कसबाई अध्यापकों ने किस जतन से मुझे गढ़ा और एक मामूली मिट्टी के ढेले से मुझे इनसान बनाया, सोचता हूं तो आंखें भीगती हैं.
ऐसे क्षणों में मुझे अकसर कबीर याद आते हैं, जिन्होंने गुरु के बारे में दो ऐसी बातें कहीं, जिन्हें मैं कभी नहीं भूल पाता. शायद जीवन की आखिरी सांसों तक नहीं भूल पाऊंगा. मुझे याद है, तीसरे-चौथे दरजे की हिंदी की किताब में उनके दोहे पढ़े थे. उनमें से एक में कबीर ने गुरु को कुम्हार सरीखा बताया था कि जैसे कुम्हार घड़ा गढ़ते समय बाहर से उस पर थापें देता है, पर अंदर से उसे सहारता भी है. वैसे ही गुरु कभी कठोरता तो कभी अपने मृदुल स्नेह से शिष्य को भीतर-बाहर से गढ़ता है.
मुझे यह बहुत बड़ी बात लगती है. अध्यापकों का प्रेम भी मैंने बहुत पाया, उनका गुस्से वाला रूप भी देखा. पर वे दोनों ही तो मुझे गढ़ने की बेचैनियों से निकले थे. जो कुछ उनके पास था, उसका जर्रा-जर्रा वे मुझे देकर रीत जाना चाहते थे. इस तप से बड़ा भी कोई तप इस दुनिया में हो सकता है क्या? मैं सचमुच नहीं जानता.
शायद इसीलिए कबीर ने गुरु को लेकर एक दूसरी बात भी कही. वे सवाल पूछते हैं कि गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हों, तो भला पहले किसके पैर छुऊं? फिर खुद ही इस सवाल का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि मैं पहले गुरु के पांव छूना चाहूंगा. इसलिए कि गोविंद तक जाने की राह तो मुझे गुरु ने ही बताई है. गुरु न होते तो भला मैं गोविंद को पा कैसे सकता था?
अपने बचपन में मैंने कबीर का यह दोहा पढ़ा तो सच कहता हूं, पूरा शरीर झनझना गया था. यह कैसा अद्भुत साहस, कैसी दिलेरी! इतना बड़ा सच कबीर कैसे कह गए? और आज भी कबीर की इन पंक्तियों को याद करता हूं तो पूरा शरीर रोमांच से भर जाता है. अहा, कबीर ही यह बात कह सकते थे! बिना कबीरी साहस के कोई कह ही नहीं सकता.
अलबत्ता, अपने अध्यापकों को याद करता हूं, तो फिर-फिर एक ही बात याद आती है कि उन्होंने मुझे सिर से पैर तक गढ़ा था, भीतर और बाहर से गढ़ा था, और जो कुछ आज मैं हूं, उन्हीं असाधारण शख्सियतों के कारण हूं, जिनका बस एक ही सपना था कि उनके शिष्य समर्थ हों और आगे निकलें-उनसे भी बहुत आगे, और बदले में उन्होंने कभी कुछ चाहा नहीं.
इनमें बहुत तल्लीनता से कला का मर्म समझाने वाले हमारे कला अध्यापक कृष्णचंद्र मुंदा थे, तो गणित के लालाराम शाक्य जी भी, जो गणित जैसे विषय को इतना रस ले-लेकर और इतना आनंद विभोर होकर पढ़ाते थे, कि पूरी की पूरी कक्षा रोमांचित सी उनकी जादुई आवाज के साथ थिरकती थी. उऩके हंसने के साथ हंसती और उनके मुसकराने के साथ मुसकराती थी. फिर उनका बड़ी खूबसूरती से ब्लैकबोर्ड पर गोला खींचने का अंदाज तो ऐसा था कि हम सब मुग्ध हो जाते. किसी जादूगर के से अंदाज में तेजी से उनका हाथ घूमता और हम कुछ समझ पाएं, इससे पहले ही ब्लैकबोर्ड पर ऐसा सही और पूरमपूर गोला खिंचा हुआ नजर आता कि हम अंदर ही अंदर 'वाह-वाह' कह उठते. कोई बड़े से बड़ा कलावंत भी उसमें कोई नुक्स नहीं निकाल सकता था.
और इससे भी बड़ी बात यह कि अपनी इस अद्भुत कला-सृष्टि के बाद शाक्य जी ब्लैकबोर्ड के एक ओर खड़े होकर, खुद भी मुग्ध भाव से उस शानदार गोले को निहारा करते थे. फिर अगले ही क्षण इस तरह हमारी ओर देखते थे, जैसे कवि सम्मेलनों में कोई कवि अपनी कविता की दाद चाहता है. ये ऐसे क्षण होते थे जो हमें गणित के आनंद के साथ-साथ कला के आनंद में भी डुबो देते थे.
फिर हाईस्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले राजनाथ सारस्वत जी का तो कहना ही क्या. एकदम झकाझक सफेद कुरता-पाजामा पहनने वाले सारस्वत जी 'अंकल पोजर हैंग्स ए पिक्चर' जैसे अंग्रेजी के हास्यपूर्ण पाठ पढ़ाते हुए, किसी मंजे हुए कलाकार की तरह अपनी आवाज के उतार-चढ़ाव और अद्भुत भंगिमाओं से क्लास रूम में ऐसा दृश्य उपस्थित कर देते थे, जैसे हम क्लास में नहीं, बल्कि मंडीहाउस के श्रीराम सेंटर में बैठे कोई जबरदस्त नाटक देख रहे हों, जिसमें हमें अपनी देह की भी सुध-बुध न हो.
इसके बाद इंटरमीडिएट में मि. खुराना अंग्रेजी पढ़ाने के लिए आए तो उनका अंदाज और मोहिनी कुछ अलग ही थी. वे हमेशा मुसकराते रहते थे. जैसे एक मीठी, मृदुल मुसकान उनके चेहरे पर हमेशा चिपकी रहती हो. कभी किसी विद्यार्थी को उन्होंने डाँटा हो, या कभी ऊंची आवाज में भी बोले हों, याद नहीं पड़ता. वे पूरी तरह अंग्रेजी साहित्य के रस में डूबे हुए थे. जब क्लास में चार्ल्स डिकेंस या शैली, वर्ड्सवर्थ सरीखे बड़े साहित्यकारों का कोई पाठ पढ़ाते तो भी इस कदर मंद-मंद मुसकान उनके होंठों से झर रही होती, जैसे हमें पढ़ाने के साथ-साथ वे खुद भी उनकी सुंदर भाषा और अनूठी कल्पनाओं का आनंद ले रहे हों. लिहाजा उनसे अंग्रेजी पढ़ना हमें एक मजेदार खेल की तरह लगता था.
इससे भी बड़ी बात यह थी कि खुराना जी ने अंग्रेजी साहित्य के कई बड़े कवि-लेखकों की शख्सियत और उनके लेखन के बारे में भी हमारे मन में गहरी उत्सुकता पैदा कर दी थी. बाद में अंग्रेजी साहित्य पढ़ने का चस्का लगा तो याद आया, इसकी नींव तो बड़े बेमालूम ढंग से हमारे पसंदीदा अध्यापक खुराना जी ने ही रख दी थी.
मैं आज भी कभी-कभी सोचता हूं, आदर्श अध्यापक कैसा होता है, तो सबसे पहले खुराना जी का चेहरा ही सामने आता है. वे सचमुच एक दोस्त अध्यापक की तरह पढ़ाते थे, और क्लास में किसी को उनसे डरने की कोई जरूरत न थी. मुझे लगता है, अगर कोई अध्यापक बगैर किसी आतंक के और बगैर तूमार बांधे, एक सहज स्वाभाविक मुसकान के साथ कोई पाठ पढ़ाता है, तो विद्यार्थियों को वह एकदम सीधा-सरल और रसमय लगने लगता है, और वे बहुत आसानी से उसे सीख लेते हैं.
ऐसे ही हमारे कॉलेज में इंटरमीडिएट में गणित पढ़ाने वाले गिरीशचंद्र गहराना और विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापक लक्ष्मणस्वरूप शर्मा जी की बड़ी अद्भुत जोड़ी थी. दोनों ही अपनी धुन के पक्के, और अपने-अपने विषय में निष्णात. साथ ही जितना कुछ वे जानते थे, वह सारी की सारी जानकारी हमारे भीतर उड़ेल देने के लिए व्याकुल. इनमें गणित के अध्यापक गिरीश जी के कक्षा में आते ही हर कोई ऐसे सतर्क होकर बैठ जाता, कि कक्षा में सांस लेने की आवाज तक सुनाई देती थी. और हमारे अनोखे अध्यापक गिरीश जी क्लास रूप में घुसते बाद में थे, उनका लेक्चर पहले ही शुरू हो चुका होता था, शायद द्वार में ऐंट्री से दो-चार सेकंड पहले.
क्लास में एक मिनट भी बर्बाद न करने वाले गिरीश जी का पढ़ाना ऐसा था कि उनकी प्रभावी आवाज के जरिए, क्लास में मानो हर किसी के दिल में बिजली सी कौंध जाती थी. गणित, जिसमें त्रिकोणमिति भी शामिल थी, वे इस तरह कक्षा में ही हमारे भीतर उतार देते थे कि हमें यकीन था, कोई एक नंबर भी हमारा नहीं काट सकता. बाकी अध्यापक क्लास में आते ही हाजिरी लेते थे, पर गिरीश जी अपने तड़ित प्रवाह सरीखे व्याख्यान के बिल्कुल अंत में, जब केवल दो-एक मिनट ही बचे होते थे, झटपट हाजिरी लेते थे. जैसे यह कोई ऐसा रस्मी काम है, जिसे बस किसी तरह निभा दिया जाना ही काफी है. यों भी हम छात्रों में भला गिरीश जी का पीरियड कौन छोड़ सकता था? इसलिए कि उनका पढ़ाना केवल पढ़ाना नहीं था, बल्कि वह हमें भीतर-बाहर से उद्बुद्ध कर देता था.
भौतिक विज्ञान के अत्यंत शांत स्वभाव के लक्षमणस्वरूप शर्मा जी गिरीश जी के बिल्कुल दूसरे छोर पर थे. हमेशा सफेद पाजामा और नेहरू जी सरीखी काली शेरवानी पहनने वाले शर्मा जी भौतिक विज्ञान के आचार्य सरीखे थे, जो विज्ञान के सिद्धांतों की गहरी समझ ही नहीं, बल्कि उसका रेशा-रेशा हमारे भीतर उतार देना चाहते थे. पर यह काम वे बड़े ही आराम से समझते, समझाते हुए करते थे. उन्हें कभी किसी चीज की जल्दी नहीं होती थी. जो कुछ लिखना होता, धीरे-धीरे अपनी बात कहते हुए, ब्लैकबोर्ड पर लिखते जाते. फिर एक ओर खड़े हो जाते, ताकि क्लास के सारे छात्र उसे आराम से उतार लें. बाद में वे जीवन के बहुत सारे उदाहरणों के जरिए पूरी बात बहुत अच्छे ढंग से समझा देते. फिर शर्मा जी हमें केवल अच्छे नंबर लाने के लिए ही प्रेरित नहीं करते थे, बल्कि हमें एक अच्छा, नैतिक और विचारशील इनसान बनते देखना चाहते थे. हर चीज का रट्टा मारने के बजाय, वे उसे अच्छे से समझने और जीवन में उतारने की बात कहते थे.
इनसानी जिंदगी में सबसे बड़ी बात नैतिकता, ईमानदारी और अपने कर्तव्य के पालन की धुन है, यह भी सबसे पहले शर्मा जी ने ही बड़े सुथरे ढंग से हमें समझाया था. बारहवीं में प्रैक्टिकल की परीक्षा लेने के लिए अकसर दूसरे शहरों से अध्यापक आते थे. वे अपनी खातिरदारी के नाम पर क्या-क्या अपेक्षा करते थे और उनका लालच किन-किन रूपों में पकट होता था, कभी-कभी शर्मा जी बहुत खिन्न होकर इसकी चर्चा करते थे. अतिथि अध्यापकों को ठीक से खिलाने-पिलाने को तो वे अपना दायित्व मानते थे, पर जब वे अपने मुँह फोड़कर कोई भेंट आदि देने की बात करते थे, तो शर्मा जी स्पष्ट इनकार कर देते थे. वे कहते थे, "मेरे विद्यार्थी योग्य हैं. आप जितना उचित समझते हों, नंबर दीजिए, पर कृपया कोई अनुचित मांग न कीजिए." सुनकर आगंतुक अध्यापक कई बार हकबका से जाते थे. पर धीरे-धीरे शर्मा जी की सिद्धांतप्रियता की ऐसी धाक जमी कि कोई उनसे ऐसी मांग करने से पहले दस बार सोचता था.
हमें इस बात का वाकई गर्व था कि हमें भौतिक विज्ञान पढ़ाने वाले शर्मा जी इतने बड़े और ऊंचे कद के इनसान हैं. जाहिर हैं, उन्होंने हमारे भीतर भी यह भाव पैदा किया कि तुम कुछ भी बनो, पर साथ ही अच्छे इनसान जरूर बनना. वरना तुमारा कुछ भी होना निरर्थक है.
इसी तरह हमें हिंदी पढ़ाने वाले जगदीशचंद्र पालीवाल और साहित्यप्रकाश दीक्षित जी इस कदर कविमना और साहित्य में रमे हुए थे कि उन्हें देखकर और उनकी बातें सुनकर हम अभिभूत से हो उठते थे. मुझे तो वे अपने आदर्श ही लगने लगे थे और वैसा होने की गहरी ललक मैं अंदर महसूस करता था. पालीवाल जी और साहित्यप्रकाश जी दोनों बड़े अच्छे गीत लिखते थे, कवि सम्मेलनों में पढ़ते भी थे. उन्हें अच्छा साहित्यिक माहौल मिला होता, तो सच ही वे बड़ा नाम कमा सकते थे. पर जो प्रतिभा उनके अंदर थी, वह हमें पढ़ाते हुए, हर पल उनके शब्दों से झर-झर झरती थी.
नवीं-दसवीं की कक्षाओं में साहित्य के लिए इतना गहरा आकर्षण उन्होंने हमारे भीतर पैदा कर दिया, साथ ही औरों से भिन्न, ऐसे सुंदर, सुललित और सधे हुए वाक्य लिखने की ललक मन में जगा दी, कि तब से मैं शायद इस दुनिया में रहते हुए भी इस दुनिया का नहीं रहा, और हमेशा-हमेशा के लिए साहित्य की दुनिया का नागरिक हो गया. आज भी अपनी किशोरावस्था के उन रस से सीझे पलों को याद करता हूं, तो जैसे पूरी एक फिल्म सी चल पड़ती है. और मैं मन ही मन शिकोहाबाद के उस कसबाई माहौल में रहकर भी हिंदी की अहर्निश सेवा करने वाले इन सीधे, सरल अध्यापकों को प्रणाम कर लेता हूं. इनमें पालीवाल जी अब नहीं हैं, पर साहित्यप्रकाश जी तो हैं.
एक मजे की बात यह थी कि साहित्यप्रकाश दीक्षित मेरे बड़े भाई जगन भाईसाहब के सहपाठी थे. जगन भाईसाहब इंजीनियर थे. दीक्षित जी एकाध बार कुछ व्यथित होकर कहते थे, "देखो विग, तुम्हारे भाई तो इंजीनियर हो गए, और हम मास्टरी में ही घिसट रहे हैं." मेरा मूल नाम चंद्रप्रकाश विग है. लिहाजा हर कोई उन दिनों विग कहकर ही पुकारता था.
दीक्षित जी का दुख मैं समझता था. उन दिनों अध्यापकी में इतने कम पैसे मिलते थे कि ठीक से गुजर-बसर होना ही मुश्किल था. फिर अध्यापन के अलावा भी इतना अधिक औपचारिक काम उनके सिर पर होता था कि वे बुरी तरह उसमें खपे रहते थे. पर आश्चर्य, दीक्षित जी की बात सुनने के बाद भी, अपनी किशोरावस्था में मुझे तो उन्हीं का जीवन अधिक आकर्षित करता था, अपने इंजीनियर भाईसाहब का नहीं. इसीलिए एक बड़े संस्थान में इंजीनियरिंग में दाखिला हो जाने पर भी मैंने कोई बहाना बनाकर जाने से इनकार कर दिया. आगरा कॉलेज से भौतिक विज्ञान में एमएससी तो किया, पर तभी मन में एक विद्रोह सा उमड़ पड़ा कि मेरा मन तो साहित्य में ही रमता है, तो फिर जीवन भर चक्की के दो पाटों के बीच क्यों पिसता रहूं?
यही निर्णायक क्षण था, जब मैंने नए सिरे से जीवन जीने का निश्चय किया. पहले हिंदी में एमए, फिर पीएचडी... और फिर अपने आप को मैंने पूरी तरह साहित्य के लिए समर्पित कर दिया. मन में तय किया कि एक रोटी न मिले तो आधी खाऊंगा, आधी न मिले तो चौथाई ही खा लूंगा, पर जिऊंगा तो साहित्य के लिए, मरूंगा तो साहित्य के लिए.
अभी कोई दो बरस पहले मेरे गृहनगर शिकोहाबाद की बजाज घराने की सुप्रतिष्ठ संस्था 'शब्दम' ने मेरा सम्मान किया, तो मैं अपने अध्यापक साहित्यप्रकाश जी से मिलने चला गया. वे मुझे देखकर इतने प्रसन्न हुए कि क्या कहूं. खुशी उनके भीतर समा नहीं रही था. मैंने बड़े आदर से उनके पैर छुए तो बोले, "रुको, चंदर." उन्होंने अंदर से शाल लाकर मुझे ओढ़ाई. भाभी जी ने बड़े स्नेह से हाथ में पांच सौ एक रुपए पकड़ाए. बोलीं, "यह हमारा आशीर्वाद है, ठुकराना मत!"
देखकर मेरी आंखों से गंगा-जमुना बह निकलीं. मैंने विकल होकर अपने आप से पूछा, क्या मैं इस योग्य हूं? उधर दीक्षित जी कह रहे थे, "कभी-कभी तुम्हारे भाई जगन नाथ से मिलना होता है, तो मैं उनसे कहता हूं कि हम लोगों का जीवन तो ऐसे ही चला गया. चंदर को देखो, उसने कितना नाम कमाया है...पूरा देश जानता है उसे."
मैं तो साहित्य का एक मामूली सेवक ही हूं, पर जो प्रेम उन्होंने मुझ पर न्योछावर किया, उसे याद करता हूं तो छाती में प्रकंप सा हो उठता है और दोनों आंखें बरसने लगती हैं. भला एक अध्यापक के सिवा और कौन होगा, जिसकी आंखें अपने शिष्यों को आगे बढ़ता देख शीतल होती हैं और छाती गर्व से फूल उठती है.
मैं ऐसे अध्यापकों का शिष्य हूं, जिन्होंने अपने भीतर का सर्वस्व देकर मुझे गढ़ा, एक मामूली मिट्टी के ढेले से इनसान बनाया, यह मैं एक क्षण के लिए भी कभी भूल नहीं पाता. भला इस जिंदगी में मैं कभी उनसे उऋण हो पाऊंगा? सच पूछिए तो यह मैं कभी सोच भी नहीं सकता. जो कुछ अपने अध्यापकों से पाया, उसे अगर निकाल दिया जाए, तो मेरे भीतर बचेगा ही क्या? सच पूछिए तो मैं तो बस, नाम का ही प्रकाश मनु हूं. मेरे अंदर का सारा प्रकाश तो मेरे अध्यापकों का ही दिया हुआ है.
***
यहां तक कि कुछ अध्यापकों ने तो हमें कभी पढ़ाया नहीं, पर उनकी इतनी गहरी छाप मन पर पड़ी कि मैंने दिल के ऊंचे आसनों पर बैठाया और बड़े मन से उनका आदर किया. आज भी करता हूं. इममें एक हिंदी के आचार्य किस्म के शांतिस्वरूप दीक्षित थे और दूसरे अंग्रेजी के शांतमना ओंकारनाथ अग्रवाल.
शांतिस्वरूप दीक्षित हमारे दौर के काफी पढ़े-लिखे अध्यापकों में थे. हिंदी भाषा और साहित्य के बड़े भारी विद्वान. मेरे साहित्य के बहुत से संस्कार उनकी पुस्तक 'भाषा भास्कर' पढ़कर बने. यह हिंदी की बड़ी अनोखी सहायक पुस्तक थी, जिसे शिकोहाबाद के ही एक प्रकाशक कृष्णा बुक डिपो ने छापा था और भारत में दूर-दूर तक इस किताब की मांग थी. एक सहृदय साहित्यकार ही ऐसी पुस्तक लिख सकता था, जो यों तो एक सहायक पुस्तक ही थी, पर ऐसी रसमय, विद्वत्तापूर्ण और साहित्यिक कि किसी को भी लेखक बना दे.
सच तो यह है कि हिंदी के दिग्गज लेखकों को जानने की मेरी शुरुआत दीक्षित जी द्वारा लिखी पुस्तक 'भाषा भास्कर' से ही हुई. हिंदी के प्रसिद्ध कवियों की इतनी अच्छी पंक्तियां इस किताब में इतने सलीके से और उनके वास्तविक 'मर्म' को उद्घाटित करते हुए उद्धृत की गई थीं कि मैं अकसर सुबह उठकर तड़के ही उन्हें याद किया करता था. उस समय कितना आनंद आता था, हृदय में रस की कैसी धारा बहती थी, क्या कहूं! दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, जयशंकर प्रसाद, निराला, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' समेत कई कवियों की कविताएं जो तब 'भाषा भास्कर' में पढ़ी थीं, आज भी जस की तस मुझे याद हैं और उन्हीं से एक तरह से मेरा साहित्यिक संस्कार भी बना. इनमें एक कविता में दिनकर का बड़ा ही आविष्ट रूप है. मां की हड्डी से चिपके भूखे बच्चों की आकुलता देख, उनका विद्रोही रूप तनकर खड़ा हो जाता है-
श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं,
पापी महलों का अहंकार तब देता मुझको आमंत्रण...!
इसी तरह बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' मानो हाथ में डमरू लेकर क्रांति-राग सुनाते हैं. जूठे पत्तों को चाटते इनसानों को देखा, तो वे गुस्से से भरकर इस दुनिया को आग लगा देना चाहते हैं-
लपक चाटते जूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को
उस दिन सोचा, क्यों न लगा दूं आग आज इस दुनिया भर को,
यह भी सोचा क्यों न टेंटुआ घोंटा जाए स्वयं जगपति का
जिसने अपने ही स्वरूप को रूप दिया इस घृणित विकृति का.
सच कहूं तो गरीब और गरीबी की पीड़ा का अहसास मेरे जीवन में पहले इन्हीं कविताओं से आया. फिर आगे चलकर मैंने खुद अपने जीवन में और आसपास बहुत कुछ देखा, और यह अहसास तमाम नई-नई शक्लों में ढला. पर पहलेपहल कविता ही मेरे लिए विश्वगुरु बनी, और इसका श्रेय मैं 'भाषा-भास्कर' को देता हूं. इसी तरह 'भाषा-भास्कर' में मैथिलीशरण गुप्त जी की कुछ पंक्तियां उद्धृत की गई थीं, जिनसे पहली बार मैंने कैकेई की गहरी पीड़ा और पछतावे को जाना. कैकेई के मुँह से निकले शब्द इतने करुण और मार्मिक थे कि मैं द्रवित होकर उनके साथ बहता गया. सुनिए आप भी कि यह कठोरहृदया कैकेई ही मानो भीतर-भीतर विलाप करती हुई कह रही है-
कहते आते थे अभी यही नरदेही
माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही,
अब कहें सभी यह, हाय विरुद्ध विधाता,
है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता....
युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी,
रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी.
आगे चलकर तो मैंने 'साकेत' पढ़ा और उसकी पूरी कथावस्तु और विशेषताओं से परिचित हुआ. पर यह कैसे भूलूं कि मैथिलीशरण जी के अत्यंत प्रभावी कवि-व्यक्तित्व की पहली झलक मुझे 'भाषा भास्कर' से ही मिली थी? इसी तरह दिनकर और नवीनजी को भी बाद में बहुत पढ़ा. उनकी विविध छवियां मन में हैं. पर पहली बार 'भाषा भास्कर' ने जिन दिनकर और बालकृष्ण शर्मा नवीन से मिलवाया था, उन्हें तो मैं आज तक भूल नहीं पाया.
लेखकों की भाषा-शैली क्या होती है, काव्य की रसात्मकता क्या होती है और रस क्या होते हैं, अलंकार क्या होते हैं, ओज, प्रसाद आदि गुण साहित्य में कैसे प्रकट होते हैं, यह सब पहली बार जाना था और मन आनंद में डूबता चला गया था. इसी तरह गद्य साहित्य की शक्ति, गद्य की भाषा-शैलीगत भिन्नताएं और भंगिमाएं, गद्य का भाषागत सौंदर्य और लालित्य, व्यंग्य की शक्ति और मार-यह सब पहली बार जाना था, और लग रहा था, मैं एक नई ही दुनिया में पहुँच गया हूं. सच पूछिए तो हिंदी के महान कवियों और लेखकों से मेरा पहला परिचय 'भाषा भास्कर' ने ही कराया, और वह आनंद, वह रोमांच मेरे भीतर से अब भी गया नहीं है.
यों मैं निस्संकोच कहूंगा कि मुझे लेखक बनाने में शांतिस्वरूप दीक्षित जी का भी बड़ा हाथ है और उनकी किताब 'भाषा भास्कर' आज भी एक मॉडल की तरह मेरे सामने है कि साहित्य की दुनिया में हम काम करें तो कैसे करें और कैसे पाठकों के एक बड़े वर्ग को रसात्मक ढंग से साहित्य से जोड़ें. हमारे कल के पाठक ही नहीं, लेखक भी यहीं से जन्म लेंगे.
इसी तरह ओंकारनाथ अग्रवाल की लिखी पुस्तक 'डिलाइट्स ऑफ इंगलिश ग्रामर' बड़ी अच्छी किताब थी, जिसे हमने दसवीं कक्षा में बड़े ही आनंद के साथ पढ़ा. यह पुस्तक भी हमारे शहर के उन्हीं प्रकाशक कृष्णा बुक डिपो ने बड़े सुंदर ढंग से छापी थी. इससे ओंकार जी की एक प्रिय छवि मन में अंकित हुई. पर फिर उनसे मिलना हुआ, तो उनके चुंबकीय व्यक्तित्व से मैं खिंचता ही चला गया. वे आदर्श अध्यापक तो थे ही. पर उन्होंने इससे भी आगे बढ़कर बड़े भाई और गाइड की तरह कदम-कदम पर मेरा बौद्धिक और भावनात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया.
उस समय मैं एक विद्रोही जैसा था, जिसके भीतर हर क्षण एक ज्वालामुखी सा धधकता रहता था. साथ ही एक साथ बहुत कुछ कर डालने का नशा था. हालाँकि दुनिया और दुनियादार लोगों की कोई व्यावहारिक समझ तो थी नहीं. इसलिए मेरी किशोरावस्था और तरुणाई में ऐसे बहुत मौके आए, जब मेरे कदम भटक सकते थे. उस समय ऐसे लोग भी मिले, जो मुझे स्वार्थवश अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहते थे. उन्हें मेरे अच्छे-बुरे से मतलब नहीं था. ऐसे क्षणों में ओंकार जी का शांत और संयमित चेहरा मेरे लिए बड़ा संबल बना.
ओंकारनाथ अग्रवाल के निकट रहकर मेरे जीवन में आस्था और विश्वास की नींव मजबूत हुई. तैश में कोई निर्णय लेने के बजाय, आगा-पीछा सोचकर काम करने का ढंग मैंने उनसे सीखा. साथ ही विपरीत स्थितियों में भी अपने निर्णय पर टिकने की दृढ़ता मैंने उनसे सीखी. ओंकार जी के प्रशांत व्यक्तित्व में एक शीतलता थी, जिसने मुझे भी शांत किया. यों उनके निकट आकर मैं भीतर-बाहर से बदला. मेरी अच्छी चीजों को वे बराबर प्रोत्साहित करते थे. इससे आगे कुछ करने की उम्मीद बँधी. नए सपने देखने मैंने शुरू किए. वे स्वयं अध्ययनशील थे, इसलिए शिक्षा से इतर बहुत से सामाजिक-सांस्कृतिक कामों में शामिल होते हुए भी, उनका पढ़ना-लिखना नहीं छूटा. मुझे यह बात अच्छी लगी.
तब से जीवन में और बहुत सारे काम करते हुए भी कोई निसफ सदी से मेरा लिखना-पढ़ना अविकल रूप से जारी है. इसका बहुत कुछ श्रेय ओंकार जी को ही जाता है. उनमें एक अध्यापक का ऐसा आदर्श रूप मैंने देखा था, जिसमें मां की सी ममता, गुरु का-सा गुरुत्व और किसी दिग्दर्शक जैसा गंभीर, प्रशांत और धीरजवान व्यक्तित्व था.
मुझ सरीखे अंतर्मुखी छात्र के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब कॉलेज में पंद्रह अगस्त का कार्यक्रम था, मैं खूब तैयारी के साथ बोला था और तभी से एक जोरदार वक्ता के रूप में मेरी धाक जम गई थी. इसके बाद न सिर्फ निरंतर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बोलने की शुरुआत हुई, बल्कि मेरे व्यक्तित्व में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया. मेरा संकोच और भीरुता कम हुई और मैं धीरे-धीरे मानो बहिर्मुखी होने लगा. छात्रों के बीच जो मुझे लगातार प्रसिद्धि मिल रही थी, वह भी मानो एक तरह से मेरी शक्ति ही थी.
पंद्रह अगस्त के मेरे भाषण को सबसे अधिक सराहा ओंकारनाथ अग्रवाल ने. बोले, "बहुत प्रभावी था तुम्हारा भाषण. मैं तो बहुत हैरान होकर सुन रहा था. जानना चाहता था कि यह है कौन सा विद्यार्थी, जो देशप्रेम से जुड़ी इतनी सुंदर बातें कह रहा है." शायद उन्होंने ही सबसे पहले पहचाना कि मेरे अंदर छिपी कोई चीज है, जो औरों से अलग. वे हर जगह इसका जिक्र करते और मुझे आगे बढ़ाने की कोशिश करते.
ओंकार जी ने कभी पढ़ाया नहीं, पर वे मेरे लिए 'गुरुओं से बढ़कर गुरु' थे. वे उस आंदोलनकारी समय में जब मेरे भीतर बड़ी भयानक उथल-पुथल चल रही थी और मैं कुछ कर गुजरने के लिए बेचैन था, बमुश्किल मुझे सँभाला और यथासंभव पथ-प्रदर्शन किया. मेरे भीतर उस समय अथाह आवेश और ऊर्जा थी, जिसे राह न मिलती तो वह शायद खुद मुझे ही खंड-खंड कर देती. और इतना ही नहीं, मेरे मन में एक तरह के 'आदर्श' की छवि गढ़ने में उनकी सचमुच बड़ी भूमिका है. उनका बेटा अंबरीश भी बहुत कुछ पिता जैसा ही था. बहुत शांत, विनम्र. याद है कि ओंकार जी ने हाईस्कूल में उसे मेरे पास हिंदी पढ़ने के लिए भेजा था और मैंने उसे पढ़ाया भी था. आजकल वह दिल्ली में चार्टर्ड अकाउंटेंट है और मैं समझता हूं, अब वह पिता सरीखा ही मृदुभाषी भी होगा.
ओंकार जी के जीवन के आखिरी दिनों में मेरी उनसे मुलाकात नहीं हो सकी. उनको परकिंसन की बीमारी ने काफी परेशान किया हुआ था, जिससे उनके हाथ कांपते थे, जबान में भी कुछ लड़खड़ाहट आ गई थी. उन दिनों वे दिल्ली के साकेत में अपने छोटे बेटे के साथ रहते थे और मैं फरीदाबाद में आकर रहने लगा था. एक बार उन्होंने मिलने के लिए बुलाया था. पर तब दुर्भाग्य से मैं किसी काम में बुरी तरह फंसा हुआ था. नहीं जा सका. और फिर सुना कि वे गुजर गए. अंतिम समय में उनसे न मिल पाने का बहुत गहरा अपराध-बोध मेरे भीतर है.
*
अरे, लीजिए, पालीवाल इंटर कॉलेज के अत्यंत ऊर्जावान प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवाल जी का जिक्र तो छूट ही गया! उन्हें भला कैसे याद न करूं? वे अपने आप में एक खास शख्सियत थे, जिनका कोई जोड़ नहीं था. कोई सानी नहीं. अपने आप में वे एक लीजेंडरी फिगर थे और उन्होंने एक तरह से अपना पूरा जीवन ही इस कॉलेज के लिए होम कर दिया था. उनसे जुड़ी कई यादें आज भी मन की स्लेट पर एकदम ताजा हैं. इनमें एक तो यही कि उन दिनों कॉलेज की बिल्डिंग बन रही थी. पालीवाल जी दिन में कई चक्कर वहां लगाते और राजमिस्त्री, मजदूर सभी को खूब प्रोत्साहित करते थे.
कभी-कभी तो उत्साह में आकर वे खुद भी एक मजदूर की तरह ईंटें पकड़ाने के काम में लग जाते थे. हम लोग कॉलेज की उस अधबनी इमारत में मिस्त्रियों को अकसर दीवारें बनाते या छत डालते देखा करते थे. चारों ओर ईंटें और दूसरा सामान भी बिखरा पड़ा रहता था. पर इस हालत में भी हमारी पढ़ाई में कभी कोई व्यवधान नहीं आया. जरूरत पड़ने पर बरामदे की दीवारें खड़ी करके वहां छप्पर तानकर हमारी क्लासों की व्यवस्था कर दी जाती.
हफ्ते-दो हफ्ते में एकाध बार मदद के लिए बड़ी कक्षाओं के छात्रों को भी बुला लिया जाता और सभी उत्साह से इस निर्माण कार्य में शामिल हो जाते. ईंटे पकड़ाने में काम में तो छठी-सातवीं कक्षा के विद्यार्थी भी बड़े उत्साह से शामिल हो जाते थे. हमसे कहा जाता, "जाओ, सामने पड़ी ईँटों में से एक-एक, दो-दो ईँटे लेकर आओ." सुनते ही हमारी बाल सेना अति उत्साह में चटपट वह काम कर दिखाती, जिसे देखकर बड़े भी ताज्जुब में पड़ जाते. रामगोपाल पालीवाल जी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि उनके जरा इशारा करने पर ही हम बच्चे मजे में ईंटें ढोने के काम में लग जाते और हमें यह बड़ी खुशी और गौरव की बात लगती. पालीवाल जी सभी का मनोबल बढ़ाते और खुद भी इस सेवा में साथ लग जाते थे.
कॉलेज में बड़े घरों के बच्चे भी थे. खूब धनवान और संपन्न परिवारों के बच्चे. पर इस श्रमदान में कभी किसी ने नाक-भौं नहीं सिकोड़ी. उलटे हम सभी को मजा आता था, जैसे यह भी किसी खेल का हिस्सा हो. बाद में केले, अमरूद या चने बँटते, जो हम लोग परम आनंद से खाते थे. आज सोचता हूं, रामगोपाल पालीवाल जी का समर्पित व्यक्तित्व हमारे सामने न होता तो भला यह सुख और प्रेरणा हमें कहां से मिलती? हम इतने आनंद से इस काम में कैसे जुटते?
यहां यह दर्ज करना भी जरूरी है कि हमारे कॉलेज का एक बड़ा हिस्सा समाज के लोगों के चंदे से बना था. हर कमरे के निर्माण में किसी न किसी का बड़ा योगदान होता और यों एक-एक करके कमरे बनते जा रहे थे. उन कमरों के बाहर दानदाताओं की नामपट्टियां थीं. ज्यादातर तो लंबे-लंबे खुले बरामदे थे, जिनमें हमारी कक्षाएं चलती थीं. हां, उनमें बीच-बीच में दीवारें खड़ी कर ली गई थीं, जिससे वे कमरों का-सा आभास देने लगी थीं. पर इनमें एक तो मुसीबत यह थी कि एक कक्षा की आवाजें और शोर दूसरी कक्षा में पहुँचता और कभी-कभी तो आफत-सी हो जाती. फिर बारिश आने पर बचाव का कोई साधन न रहता. पानी में भीगकर बच्चे बीमार पड़ें, इससे बेहतर यही समझा जाता कि सुबह-सुबह ज्यादा बारिश हो रही हो, तो रेनीडे घोषित हो जाता और हम मस्ती से हंसते-गाते वापस घर आ जाते.
आश्चर्य, इसके बावजूद हमारा कॉलेज दूर-दूर तक पढ़ाई और अनुशासन में अव्वल माना जाता था. दूसरी एक खासियत उसकी यह थी कि अमीर और गरीब बच्चों में कोई फर्क, कोई भेदभाव नहीं था. अध्यापक भी उन्हीं बच्चों को दिल से चाहते और पूरी क्लास में उनकी तारीफ करते थे, जो पढ़ाई में होशियार और मेहनती थे. कई बार तो उनमें गाँव के ऐसे गरीब बच्चे भी होते थे, जिनके पास पहनने के लिए ढंग के कपड़े तक नहीं होते थे. पर अध्यापक अमीरों के बच्चों से ज्यादा उन गरीब बच्चों को पसंद करते थे और उनकी दिल खोलकर तारीफ करते थे. इससे जाने-अनजाने एक बात सब बच्चों के मन में जम जाती थी कि इस संसार में विद्या से बड़ा कोई गुण नहीं है, विद्या से बड़ा कोई खजाना नहीं है. यह ऐसी सीख थी, जिसे हम आज बरसों बाद भी नहीं भूले.
यों हमारे कॉलेज में सब कुछ सादा था. बिल्कुल सादा से वर्गाकार कमरे, जैसे धर्मशालाओं के होते हैं. लकड़ी की मामूली बेंचें थीं, जिन पर एक कोने में स्याही भरने के लिए कटोरियां लगी हुई थीं. शुरू में होल्डर का इस्तमाल होता था, तब उनकी जरूरत पड़ती थी. फिर फाउंटेन पैन आ गए, तो उनकी उपयोगिता धीरे-धीरे कम होने लगी. कॉलेज में पढ़ाई पर ज्यादा जोर था, पर हर शनिवार को आधी छुट्टी के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे, जिसमें बच्चे कविताएं, कहानियां और कभी-कभी तो लोकगीत वगैरह भी सुनाया करते थे.
पालीवाल इंटर कॉलेज का खूब बड़ा सा मैदान भी मुझे अकसर याद आता है, जिसके तीन ओर यूक्लिप्टस के बड़े-बड़े पेड़ लगे होते, जो एक विशाल दीवार का-सा आभास कराते. यों तो ईंटों की एक चहारदीवारी-सी भी थी, पर वह बहुत ऊंची न थी. उसकी तुलना में पेड़ कहीं अधिक विशाल पार्थक्य-रेखा का-सा आभास कराते. इस विशाल मैदान में ही इंटरवल के समय हम लोग मूँगफलियां खाते हुए टहलते, या फिर टोली बनाकर बैठते. यहीं कभी-कभी सर्दियों में अध्यापक कक्षाएं लेते थे. सचमुच सर्दियों की धूप में यहां बैठने का आनंद ही कुछ और था!
कॉलेज की पुरानी स्मृतियों को खँगालता हूं, तो याद आता है कि यहां एक बड़ा विशाल कवि-सम्मेलन भी हुआ था, जिसमें हिंदी के बड़े कवियों में सोहनलाल द्विवेदी, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, रामकुमार चतुर्वेदी, सोम ठाकुर आदि शामिल हुए थे. पूरी रात यह कवि-सम्मेलन चला था और इसे सुनने शहर के बहुत से संभ्रांत जन आए थे. इसी समय-शायद कुछ आगे-पीछे-बड़ी तैयारी के साथ नाटक-मंडली को बुलाकर एक नाटक खेला गया था, इसकी मुझे याद है.
कॉलेज में एक बार वार्षिक सम्मेलन भी बड़ी धूमधाम से मनाया गया था. उस समय हुए सुंदर और सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम की भी मुझे याद है, जिसमें बच्चों ने एक मजेदार हास्य नाटक किया था. महादेवी वर्मा जी की एक कविता को भी नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया गया था, जिसमें हर ऋतु आकर गीत की लय-ताल में अपनी-अपनी महिमा का बखान करती है. सब ऋतुओं ने अपने अलग-अलग वेश में आकर अपनी सुंदरता का वर्णन किया तो समा बंध गया. यहां संगीत भी था और नाटकीय दृश्यात्मकता भी. यह याद रखने की बात है कि उन दिनों ऐसे ही सांस्कृतिक आयोजन होते थे, जिसके साथ एक साहित्यिक गरिमा भी जुड़ी हुई थी.
यों जैसा कि मैंने पहले भी कहा, हमारे कॉलेज की कीर्ति मुख्य रूप से अच्छी पढ़ाई के कारण थी, पर बाकी चीजों में भी बीच-बीच में जो कार्यक्रम हुए, वे खासे सुरुचिपूर्ण थे.
प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवाल जी की चर्चा के साथ ये सारी बातें भी इसलिए याद आ गईं, क्योंकि हमारा कॉलेज रामगोपाल पालीवाल जी के लिए ईँट और सीमेंट से बनी इमारत नहीं, बल्कि उनकी सर्वोत्तम कृति था, जिसके चप्पे-चप्पे में उनकी छाप नजर आती थी. वे ऐसे बड़े और समर्पित 'कृतिकार' थे, जो अपनी रक्त और मज्जा से कृति की रचना करता है और अपना सर्वस्व उसे देकर निःशेष हो जाता है. आज मैं जो कुछ भी हूं, उसे बनाने में रामगोपाल पालीवाल जी और उनके द्वारा निर्मित कॉलेज का बड़ा और मूल्यवान योगदान है, मैं इसे भला कैसे भूल सकता हूं?
**
संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद, हरियाणा. पिन-121008, मो- 09810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com