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परवीन शाकिरः पुण्यतिथि पर विशेष, हम जो मरते हैं तो ख्वाब कहां जाते हैं

परवीन शाकिर एक बेहतरीन शायरा थीं. बेहद खूबसूरत और कामयाब भी. उनका जन्म पाकिस्तान के कराची में हुआ था. उनके वालिद का नाम शाकिर हुसैन था. उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एमए किया और वहीं से पीएचडी भी की.

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परवीन शाकिर (फोटो साभार- रेख्ता फाउंडेशन)
परवीन शाकिर (फोटो साभार- रेख्ता फाउंडेशन)

परवीन शाकिर, जन्म 24 नवंबर, 1952, मृत्य 26 दिसंबर, 1994. प्लॉट नंबर 57, कब्र नंबर 48. हमारे दौर की सबसे खूबसूरत और ज़हीन पाकिस्तानी शायरा की कब्र पर यह इबारत लिखी है. वहां, जहां उन्हें सुपुर्दे ख़ाक किया गया है. जहां परवीन शाकिर सोई हैं. कई बार यह सवाल दिमाग में आता है कि असमय दुनिया छोड़ने के बाद भी कोई इतने चैन से कैसे सो सकता है? यह तभी संभव है जब उसने जिंदगी आंकड़ों में नहीं, उल्फत में जी हो.

खाक़ मुट्ठी में लिए कब्र की मैं सोचता हूं
हम जो मरते हैं तो ख्वाब कहां जाते हैं

परवीन शाकिर एक बेहतरीन शायरा थीं. बेहद खूबसूरत और कामयाब भी. उनका जन्म पाकिस्तान के कराची में हुआ था. उनके वालिद का नाम शाकिर हुसैन था. उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एमए किया और वहीं से पीएचडी भी की. उनका पहला संग्रह 'खुशबू' साल 1976 में छपा, और रातों रात वह मशहूर हो गईं. हालांकि वह लिखने की शुरुआत अपने स्कूली दिनों में ही कर चुकी थीं.

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वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की

कहते हैं कि उनकी शोहरत का आलम यह था कि साल 1982 में जब पाकिस्तान की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवाओं में से एक सेंट्रेल सुपीरियर सर्विसेज़ का इम्तिहान दिया, तो एक सवाल उन्हीं पर था. वह इस इम्तिहान में दूसरे नंबर पर आईं और कस्टम डिपार्टमेंट में उन्हें एक बड़ा ओहदा मिला. पर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय शोहरत बख्शी उनकी कलम ने ही. उनकी बयानगी का अपना एक अलग ही अंदाज था.

पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चांद
मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद

परवीन शाकिर ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था, जब मैं छोटी थी तो लफ्ज़ मुझे बहुत फैसिनेट करते थे, मैं उनकी आवाज़, खुश्बू और ज़ायका महसूस कर सकती थी, लेकिन ये सिर्फ लफ्ज़ पढ़ पाने की हद तक था. ये ख़्याल तो मुझे बहुत बाद में आया कि मैं लिख भी सकती हूं, जब मैं कराची के सर सैय्यद गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती थी, मेरे कॉलेज में एक तकरीर होनी थी और मेरी उस्ताद इरफाना अज़ीज़ ने कहा कि मैं इस मौके पर कुछ लिखूं, उन्हें पता नहीं क्यों यकीन था कि मैं नज़्में लिख सकती हूं. मैंने सरशार होकर एक बहुत सादा सी नज़्म लिखी.. जो बहुत पसंद की गई और इस तरह मेरे शेरी सफर का आगाज़ हुआ.

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अब भला छोड़ के घर क्या करते
शाम के वक़्त सफ़र क्या करते
तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं
अपने आने की ख़बर क्या करते

परवीन शाकिर एक बेहद संवेदनशील शायरा थीं. भावुक और खुशमिजाज. हालांकि उनकी पारिवारिक ज़िंदगी कभी खुशनुमा नहीं रही और यह दर्द उनकी शायरी में भी दिखाई देता है. पर वह इससे इनकार करती थीं. उनका मानना था कि उनकी शायरी में उनका ज़ाती दर्द नहीं औरत जमात का फलसफा दिखता है.

निकले हैं तो रस्ते में कहीं शाम भी होगी
सूरज भी मगर आयेगा इस राह-गुज़र से

वह जीवन के विविध रंगों की शायरा थीं. केवल शब्दों में ही नहीं, निजी जिंदगी में भी उन्होंने कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. न तो इश्क के दौर में न ही रुसवाई के दौर में. वह जब कामयाबी और शोहरत की बुलंदियों पर थी, तो उनकी नज़दीकियां डॉक्टर सैय्यद नसीर अली से बढ़ीं. दोनों ने जल्द ही शादी भी कर ली. इसी दौर में उन्होंने लिखा-

शाम आयी तेरी यादों के सितारे निकले
रंग ही ग़म के नहीं नक़्श भी प्यारे निकले

वह भारत सहित दुनिया भर में अपनी रूमानी और रुहानी गज़ल के चलते जानीं गईं. पर ऐसे कम ही लोग होते हैं जिनके जीवन में केवल कामयाबी लिखी हो. परवीन शाकिर ऐसे खुशकिस्मतों में न थीं. उनके लेखन, किताबों व सामाजिक जीवन से जुड़ी दुनिया जब बुलंदियों पर थी तो पारिवारिक जीवन हिचकोले खा रहा था. उन्होंने उसे संभालने की कोशिश की पर सफल न हो सकीं. पर इन हालातों में भी उन्होंने हिम्मत हारना जैसे सीखा न था.

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उन्होंने लिखा:

डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए
मैं जानती थी पाल रही हूं संपोलिए
बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की
और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए

कहते हैं कि डॉक्टर साहब को परवीन शाकिर की न तो शोहरत रास आ रही थी न ही संगत. इनका कद जैसे-जैसे बड़ा होता जाता डॉक्टर साहब अपने को बौना महसूसते. इस बीच उनका एक बेटा भी हुआ. नाम रखा गया सैय्यद मुराद अली. पर मुराद के आने से भी बात न बनी. परवीन के एक गज़ल की शुरुआती पंक्तियां हैं:

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊंगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊंगी
सुपुर्द कर के उसे चांदनी के हाथों में
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊंगी

बात ज्यादा बिगड़ गई. दोनों अलग हो गए. कहते हैं परवीन शाकिर उन औरतों में नहीं थी, जो गम से बेज़ार हो जाएं. पर इस घटना से उनके संवेदनशीन मन के भीतर काफी कुछ टूटा था. वह ग़जले और नज़्में लिखती रहीं. इसी दौर में साल 1991 में हार्टफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप पर वह अमेरिका भी गई, जहां उन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए किया. वह पाकिस्तान लौटीं और साल 1994 में वह एक सड़क हादसे में मारी गईं.

इस तरह हमारे दौर की इस मशहूर शायरा ने उम्र भले ही कम पायी, पर उर्दू अदब की दुनिया में इतना ऊंचा मुकाम हासिल किया, जिसे छूना हर शायर का ख्वाब होता है. परवीन शाकिर ने एक भरपूर और कामयाब जिंदगी जी. हुस्न और इश्क, बेकदरी और पुरसुकून, दर्द और दुश्वारियां, इस बेजार दुनिया ने उन्हें सब कुछ दिया. पर वह हारी, टूटी व थकी नहीं, बस सो गई धीरे से. उनकी प्रमुख कृतियों में खुली आंखों में सपना, ख़ुशबू, सदबर्ग, इन्कार, रहमतों की बारिश, ख़ुद-कलामी, इंकार, माह-ए-तमाम आदि शामिल हैं. श्रद्धांजलि परवीन शाकिर.

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