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मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्रः एक बिसरा दिए गए शायर की रचनाओं का जगमग संसार

सुरूर! हमने जीवित रहते तुम्हारा सम्मान नहीं किया.... तुम्हें हाथों से खोकर अब हम तुम्हारा सम्मान कर रहे हैं. यदि तुमने संसार के किसी अन्य देश में जन्म लिया होता तो आज तुम्हारी समाधि पर हीरे-मोती न्योछावर किए जाते, तुम्हारे स्मारक बनते, लोग तुम्हारे नाम पर जान छिड़कते... मुंशी प्रेमचंद

आवरण चित्र-पुस्तकः मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्र आवरण चित्र-पुस्तकः मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्र

जहानाबादी के पूरे जीवन और उनके रचना समग्र को लेकर पहली बार कोई किताब, वह भी देवनागरी लिपि में, 'मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्र' नाम से आई है तो इससे हिन्दी और उर्दू दोनों भाषा और साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और जानकारों को निश्चित रूप से लाभ पहुंचने वाला है. यह अत्यन्त दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण कार्य पेशे से उर्दू के प्राध्यापक एवं शोधकर्ता डॉ अलिफ़ नाज़िम के अथक प्रयासों से ही सम्भव हो पाया है. डॉ. नाज़िम के वर्षों के शोध, उनकी तपस्या एवं विवेकपूर्ण अध्ययनशीलता का परिणाम है यह 824 पृष्ठों का समग्र! इससे उर्दू साहित्य के इतिहास में बहुत कुछ घट-बढ़ जाने वाला है और इससे किसी शायर को उसकी मृत्यु के कोई 110 साल बाद ही सही, न्याय और उसका सही स्थान मिला है.
कुल 8 खंडों में विभाजित आलोच्य समग्र में पहले चार खंड सुरूर साहब की पुस्तकों 'जामे-सुरूर', 'ख़ुमख़ाना-ए-सुरूर', 'ख़ुमकदा-ए-सुरूर' तथा 'अक्सीरे-सुखन' पर केंद्रित हैं. पांचवें खंड में सुरूर की वे कविताएं दी गई हैं जो शाकिर मेरठी के नाम से प्रकाशित होती रहीं. छठा खंड सुरूर की गुमशुदा एवं अप्राप्य रचनाओं का है. सातवें खंड में उनकी ग़ज़लें और फुटकर शेर दिए गए हैं और आख़िरी खंड श्रद्धांजलियों का है. इन 8 खंडों से पहले सम्पादक की भूमिका, प्रोफेसर राजेन्द्र जिज्ञासु का प्राक्कथन, डॉ अलिफ़ नाज़िम का संपादकीय वक्तव्य व सुरूर जहानाबादी की एकमात्र गद्य रचना 'ज़िन्दा-ए-जावेद फूल' भी संकलित है और सबका अपना विशिष्ट महत्त्व है.
सुरूर जहानाबादी के इस रचना-समग्र से गुज़र कर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे सिर्फ और सिर्फ नज़्म के  शायर थे. उनकी केवल पांच-छ: ग़ज़लें तथा कुछ रुबाइयां और क़ता ही अभी तक संकलित हो सके हैं. उनकी जो विषय-केंद्रित रचनाएं हैं और जिनसे उन्हें पहचान और प्रसिद्धि मिली, वे नज़्म के रूप में ही लिखी जा सकती थीं, ग़ज़ल, रुबाई या क़ता के रूप में नहीं. नज़्म पर उनकी पकड़ इतनी अच्छी थी कि वह सौ-सवा सौ शेरों की नज़्म बड़ी सहजता से लिख जाते थे. उनके पहले संग्रह 'जामे-सुरूर' में 'नूरजहां का मजार' शीर्षक  नज़्म में 158 शेर मिलते हैं.
आर्य समाज के सिद्धान्तों के पोषक सुरूर जहानाबादी ने न केवल पारम्परिक विषयों पर रचनाएं लिखीं अपितु देश प्रेम, ऐतिहासिक चरित्र, पशु-पक्षी, प्रकृति, मौसम ऋतुओं पर ही नहीं अपितु कीटों तक पर भी अपनी रचनाएं केंद्रित कीं. उनके पहले संग्रह जामे-सुरूर में 'बीरबहूटी' नामक कीट पर 24 शेरों की सुंदर-सी नज़्म मिलती है, तो कोयल पर 19 शेरों की नज़्म. वे यमुना नदी पर 96 शेरों की नज़्म तो गंगा पर 31 शेरों की नज़्म लिख डालते हैं. इतना‌ ही नहीं, प्रयाग के संगम पर 36 शेरों की नज़्म भी 'जामे-सुरूर'  में शामिल है. इसी संग्रह में नल और दमयंती पर 37 व 45 शेरों की उनकी दो नज़्में मिलती हैं. स्वामी रामतीर्थ पर 105 शेरों की नज़्म भी सुरूर साहब ने लिखी है. पद्मिनी और उनकी चिता पर 30-30 शेरों की नज़्में मिलती हैं. राम के वनवास और दशरथ की बेकरारी पर भी 32-32 शेरों की नज्में समग्र रूप में मौजूद हैं. लक्ष्मी देवी पर वह 52 शेर की नज्में लिखकर प्रसन्न होते हैं तो 'खाके-वतन', 'मादरे-हिन्द', 'हसरते-वतन',  'उरुसे-हुब्बे-वतन' और 'यादे-वतन' जैसी पांच नज़्में देशप्रेम पर केंद्रित कर डालते हैं. उन्हें जहां से जो भी अच्छा मिलता था अपनी नज़्मों का विषय बना लेते थे. जैसे लॉर्ड लिटिन की प्रसिद्ध नज़्म 'द ब्लाइंड फ्लावर गर्ल्स सॉंग' का अनुवाद उन्होंने 37 शेरों की नज़्म 'नाबीना फूल वाली का गीत' के रूप में; टेनीसन की अंग्रेजी कविता 'द डेथ ऑफ द ओल्ड ईयर' का‌ 'साले-गुजिश्ता' शीर्षक से 39 शेर किया, तो बंकिम चंद्र चटर्जी रचित 'वन्दे मातरम' का अनुवाद उन्होंने 'मादरे-हिन्द' नाम से 18 शेरों की नज़्म में किया. 'वेद की मुकद्दस रोशनी' शीर्षक से भी उनके यहां 20 शेरों की नज़्म मौजूद है तो 'सती' पर 25 शेरों की नज़्म उनके इस सबसे बड़े संग्रह में पायी जाती है. इस संग्रह की उनकी बड़ी नज़्मों में 87 शेरों वाली 'दीवारे-कुहन' भी शामिल है.
सुरूर साहब कितने बड़े शायर थे इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनके समय में उनकी रचनाएं तमाम नामचीन उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, जिनमें कानपुर से प्रकाशित 'ज़माना' सबसे महत्त्वपूर्ण है. उनकी अधिकांश रचनाएं 'ज़माना' में ही प्रकाशित हुईं. इसके अतिरिक्त मासिक 'अदीब', इलाहाबाद; 'तनवीरुल शर्क़', कलकत्ता; मासिक 'मख़ज़न',लाहौर; मासिक 'परवाना' व 'आर्य समाचार' मेरठ ने भी उन्हें ख़ूब प्रकाशित किया. 'ज़माना' के सम्पादक मुंशी दया नारायण निगम तो सुरूर साहब के अच्छे- ख़ासे प्रशंसक और मुरीद थे और स्थिति यहां तक बनी कि अंततः सुरूर साहब को वे अपने साथ सहायक सम्पादक के रूप में कार्य करने लिए भी सहमत कर ले गए. यह वही 'ज़माना' था जहां प्यारेलाल शाकिर मेरठी पहले से ही सहायक संपादक के रूप में काम कर रहे थे और यहीं से उन दोनों का साथ कुछ ऐसा जुड़ा कि दोनों एक दूसरे की ज़रूरत बनते चले गए. एक के पास पैसा था और उसे ज़रूरत थी बड़े शायर जैसी शोहरत की तो दूसरे के पास नाम था लेकिन पैसे की ज़रूरत थी. इस लेन-देन में ही 'अक्सीरे-सुखन' का वह विडम्बनापूर्ण प्रकरण भी आकर जुड़ता है, जिसमें सुरूर साहब की कृति होते हुए भी वह प्यारेलाल शाकिर मेरठी के नाम से न केवल प्रकाशित और चर्चित हुई बल्कि बाद में भी उसका एक और संस्करण प्रकाशित करके बेच दिया गया. यह पुस्तक पहली बार वर्ष 2015 में डॉ अलिफ़ नाज़िम के माध्यम से ही सुरूर जहानाबादी के नाम से प्रकाशित हो पायी. इस पुस्तक के महत्त्व का अंदाजा़ आप इस बात से लगा सकते हैं कि उसकी कोई 17 पृष्ठों की लम्बी और ऐतिहासिक भूमिका कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी ने लिखी थी और जब मामले की सच्चाई का पता चला तो उन्हें लिखित रूप में तौबा करनी पड़ी!
'अक्सीरे-सुख़न' कालिदास की सुप्रसिद्ध रचना 'ऋतु संहार' का उर्दू में काव्यानुवाद है जिसके बारे में प्रेमचंद की राय थी -
'यद्यपि यह अनुवाद है मगर अनुवाद में आमद का मज़ा पैदा कर दिया है. सरलता इस संग्रह की सबसे अच्छी ख़ूबी है. संस्कृत के पेचीदा और कोमल उमंगों को कविता रूप देने में सरलता को ध्यान में रखना और उसमें सफल हो जाना कवि की पक्की अभ्यस्तता और काव्य सामर्थ्य की दलील है.' (पृष्ठ- 513)
भूमिका का समापन प्रेमचन्द ने कुछ इन शब्दों में किया था-
' ...आशा करते हैं कि उर्दू पब्लिक इस संग्रह की वही सराहना करेगी, जिसका वह अपने प्रशंसकों के आधार पर करती है. संभव है इस उदाहरण से अन्य कवियों को इस रंग में क़लम आज़माने की उर्जा मिले. यदि ऐसा हुआ तो 'अक्सीरे-सुखन' का उर्दू  दुनिया में आना एक मुबारक और अविस्मरणीय घटना होगी.'
(पृष्ठ-514)
'अक्सीरे-सुखन' में भारत में पाई जाने वाली छ: ऋतुओं पर नज़्में लिखी गई हैं जो कालिदास के 'ऋतुसंहार' के श्लोकों का काव्यानुवाद हैं. सुरूर साहब ने इस कृति में ग्रीष्म पर 48 शेर, बरखा पर 70 शेर, शरद पर सबसे ज़्यादा 100 शेर, हेमन्त पर 50 शेर, शिशिर पर 30 शेर और बसन्त पर 69 शेर वाली नज़्में लिखी हैं.
सुरूर जहानाबादी और 'अक्सीरे-सुखन' का दुर्भाग्य देखिए कि वह प्यारे लाल शाकिर मेरठी के नाम से अपने पहले प्रकाशन 1913 के बाद अपने असली रचनाकार यानी सुरूर जहानाबादी के नाम से 102 वर्षों बाद वर्ष 2015 में इस समग्र के संपादक के संपादन में ही पुस्तकाकार आ पाई, जिसे राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया. देवनागरी लिपि में यह पुस्तक पहली बार 2020 में इस समग्र के माध्यम से ही प्रकाश में आयी है. यहां यह उल्लेख अप्रासंगिक न होगा कि सुरूर साहब ने अपने जीवन-काल में अपने पहले कविता संग्रह 'जामे-सुरूर' का एक और खंड तैयार करके प्रकाशन हेतु शाकिर मेरठी को दे दिया था. किन्तु सुरूर साहब के आकस्मिक निधन के बाद पहला भाग तो किसी तरह प्रकाशित हो गया, लेकिन शाकिर मेरठी की 'साहित्यिक चोरी' के सामने आ जाने के बाद उसके दूसरे भाग की कविताएं फिर कभी सामने नहीं आ पाईं और वे नष्ट हो गईं! इस तरह यह एक बड़ी साहित्यिक क्षति हो गई. इस बात की उम्मीद अब कम ही बची है कि वे कविताएं कहीं किसी अख़बार या किसी उनके प्रशंसक के पास बची रह गई हों. क्योंकि डॉ अलिफ़ नाज़िम ने इस बारे में कोई कोर- कसर बाकी नहीं रखी है और उसी का परिणाम है, उनकी वे रचनाएं जो 'सुरूर की गुमशुदा और अप्राप्य रचनाएं' खंड में (पृष्ठ 672-800) संकलित की गयी हैं.
मुझे लगता है कि सुरूर जहानाबादी और प्यारेलाल शाकिर मेरठी के सम्बन्धों में शाकिर को 'साहित्यिक चोर' सिद्ध किया गया है, जबकि उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि यह शुद्ध रूप से साहित्यिक ख़रीद-फ़रोख्त का मामला था. स्वयं 'ज़माना' के सम्पादक मुंशी दया नारायण निगम को यह सब सुरूर साहब के जीवित रहते भी मालूम था, लेकिन किसी खुलासे से स्वयं सुरूर साहब ने मना कर रखा था. यह तो सभी को मालूम है कि उर्दू के तमाम उस्ताद अपने शागिर्दों को अपनी शायरी की बिक्री करते रहे हैं और यह सिलसिला आज भी जारी है. यह यूं ही नहीं है कि बरेली के चर्चित शायर ख़याल खन्ना बातचीत में मुझसे कह उठते हैं कि 'एक उस्ताद मरता है तो दस शायर भी मर जाते हैं'. मेरे कहने का यह आशय कदापि नहीं है कि प्यारेलाल शाकिर को मैं बेगुनाह सिद्ध करने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन यह तो हुआ ही होगा कि हालात से परेशान होकर सुरूर साहब ने अपनी तमाम रचनाएं उन्हें और दूसरे नक़ली शायरों को भी औने-पौने दामों पर बेचकर मुश्किल के दिन काटे होंगे और शराब पीने ‌की अपनी लत मिटाई होगी. कमबख़्त शराब है ही ऐसी शय, जिसने गुज़रे ज़माने में भी न जाने कितनी ही रियासतों और कितने ही राजे-रजवाड़ों को अपने नशे में डुबोकर तबाह कर दिया था. आखिर 'अक्सीरे-सुखन' की तीन नज़्में तो 'ज़माना' में सुरूर साहब के ज़िन्दा रहते ही शाकिर मेरठी के नाम से छपी थीं! इतना ही नहीं, तब कदाचित ये दोनों दोस्त एक साथ 'ज़माना' में ही कार्य कर रहे थे. यही क्यों, इस समग्र में संकलित 25 कविताओं और 76 रुबाइयों वाले उस खंड की 18 नज़्में भी सुरूर साहब के ज़िन्दा रहते ही शाकिर मेरठी के नाम से ज़माना समेत दूसरे कई महत्त्वपूर्ण अख़बारों में प्रकाशित होती रही थीं. यह स्थिति दोनों के बीच अबूझ समझौते की तरफ इशारा ही नहीं करती,ल्कि उसे प्रमाणित भी करती है.
इस प्रकरण में कहीं न कहीं, मुंशी दया नारायण निगम ने सुरूर साहब का अतिरिक्त पक्ष लेते  हुए शाकिर मेरठी को 'चोर' ठहरा दिया! मुझे लगता है कि 'अक्सीरे- सुखन' के मामले में प्यारे लाल शाकिर  मेरठी को कम से कम इतना क्रेडिट तो दिया ही जा सकता है कि उन्होंने ही सुरूर साहब के लिए 'ऋतुसंहार' के श्लोकों का गद्यान्तरण विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करके उपलब्ध कराया था, जिसकी नींव पर सुरूर साहब काव्यानुवाद की इतनी सुन्दर और मज़बूत इमारत खड़ी कर सके. प्यारेलाल शाकिर मेरठी को अपने किये की सज़ा खुलासे के बाद की 44 साल की ज़िन्दगी में पहले ही अपार बदनामी के रूप में मिल चुकी है. ऐसे में उनके मरने के बाद ही सही उनके क्रेडिट को अंकित करके उर्दू साहित्य अपनी निष्पक्षता जताने पर विचार कर सकता है. क्योंकि प्यारेलाल शाकिर मेरठी पर अगर इस कथित साहित्यिक चोरी के आरोपों की बात दरकिनार कर दी जाए तो अपनी ईसाई धार्मिक आस्थाओं के बावजूद‌ वे भारतीय उपमहाद्वीप के पहले उर्दू पत्रकार के रूप में पहचाने गए. इतना ही नहीं वह मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी के सगे नाना भी थे. उन्होंने अपने समय के कई महत्त्वपूर्ण उर्दू पत्रों का संपादन किया और प्रेमचन्द जैसा बड़ा रचनाकार यदि उनके नाम से प्रस्तावित 'अक्सीरे-सुखन' की लम्बी भूमिका लिखने के लिए तैयार हुआ होगा तो वह यूं ही नहीं, बल्कि इसमें शाकिर के उस समय के बड़े क़द का भी योगदान ज़रूर रहा होगा. स्वयं इस समग्र के सैकड़ों पृष्ठों में भी शाकिर मेरठी की चर्चा की गई है. हालांकि यह भी बेहद गौरतलब है कि सारी असलियत सामने आ जाने के बावजूद शाकिर मेरठी ने 1941 में 'अक्सीरे-सुखन' का दूसरा संस्करण अपने ही नाम से प्रकाशित करवाकर दुस्साहसपूर्ण कार्य ही किया था. लेकिन हो सकता है, इसके भी पीछे सुरूर साहब जैसी ही कोई बेबसी रही हो?
पुस्तक के गुमशुदा और अप्राप्य रचनाओं के खंड में कुल 35 रचनाएं शामिल हैं, जिनमें 33 नज़्में, एक ग़ज़ल तथा रुबाइयां शीर्षक से 12 रुबाइयां शामिल हैं. इसमें शामिल नज़्मों में 31वीं व 32वीं रचनाएं जो क्रमशः 'ऐशे-जवानी' और 'उरुसे-बहार' के नाम से शामिल हैं, वे अगस्त 1910 व जुलाई 1910 ई. क्रमशः में दिल्ली के मासिक 'सला-ए-आम' में अख़गर अजयगढ़ी के नाम से प्रकाशित हुई थीं. इस खंड की पहली नज़्म 'सन्अत व हिरफ़त व तिजारत' उस समय चल रहे स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित है. यह नज़्म तीन किस्तों में बनारस के साप्ताहिक अख़बार 'आवाज़ा-ए-ख़ल्क़' में प्रकाशित हुई थी. इसकी पहली किस्त 16 अप्रैल 2004 को, दूसरी किस्त 24 अप्रैल 1904 को और तीसरी किस्त 1 मई, 1904 के अंक में प्रकाशित हुई थी. 147 शेरों की यह नज़्म देश को झिंझोड़ कर जगा देने वाली ललकार की नज़्म है. आगे बढ़ने से पहले हम इसका एक अंश भी देखते चलें -
 
ऐ क़ौम के नौख़ेज जवानों इधर आना
शब्देज़े-अज़ीमत को ज़रा एड़ लगाना
हिम्मत का क़दम राहे-तरक़्की़ में बढ़ाना
लो बढ़ के ये बाजी़ कहीं जी हार न जाना
       तुम नामे-खुदा क़ौम में हिम्मत के धनी हो
       माना कि तवंगर नहीं दिल के तो धनी हो
...
हैं और भी क़ौमें तो ज़माने में तवंगर
इफ़्लास बरसता है शबो-रोज़ तुम्हीं पर
कुलियों से भी हालत है तुम्हारी कहीं बदतर
खाने को नहीं नाने-शबीना भी मयस्सर
      तुम हो कि ग़ुलामी में लगे रहते हो दिन रात
      या  करते  हो दरयूज़ागरी पर बसर औक़ात
      (पृष्ठ-672)
इससे स्पष्ट होता है कि सुरूर साहब अपने आसपास घटने वाली बड़ी घटनाओं से लगातार जुड़े रहते थे और उन पर कुछ न कुछ महत्त्वपूर्ण लिखकर अख़बारों में प्रकाशित भी कराते रहते थे. ऐसा लगता है कि अख़बार उनकी नज़्मों की हमेशा प्रतीक्षा में रहते थे और प्राप्त हो जाने पर उन्हें प्रकाशित करके गौरवान्वित होते थे.
अप्राप्य रचनाओं के इस खंड में 'पण्डित लेख राम आर्य मुसाफिर की चिता' तथा 'महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती' शीर्षक नज़्में भी शामिल हैं, जो आर्य समाज के साथ उनके गहरे जुड़ाव को प्रमाणित करती हैं. देश प्रेम इस खंड में भी सिर चढ़कर बोलता है. देशभक्ति की दो कविताएं 'खाक़े-वतन' और 'मेरा वतन वही है' इस खंड में भी  सामने आती हैं, जो 'जामे-सुरूर' में शामिल ऐसी रचनाओं से भिन्न हैं. इस कड़ी में ही 'खाके़-चुनार' को भी शामिल किया जा सकता है. स्वदेशी आन्दोलन पर केन्द्रित नज़्म भी देशप्रेम से ही ओतप्रोत है. 'विपिन चन्द्र पाल का स्वागत' शीर्षक से इसी खंड में शामिल की गई है. 'ब्रेडला कांग्रेस हाल, लाहौर ' शीर्षक वाली एक अन्य नज़्म भी इस खंड में है. 'नैरंगे-जमाना मुसद्दस' भी इस खंड का ही हिस्सा है जो उनकी सबसे बड़ी नज़्म है और 311 शेरों में फैली हुई है.
देश की चिन्ता और देशभक्ति सुरूर जहानाबादी की रचनात्मकता का प्रमुख स्वर है. इसलिए ऐसी रचनाएं उनके हर संकलन में या इस समग्र के हर खंड में मौजूद हैं. 'कविताएं 'सुरूर' की और नाम 'शाकिर' का' खंड भी इसका अपवाद नहीं है. 'यादे-वतन' और 'रांड का चरखा' नज़्मों में कदाचित यही स्वर मौजूद नज़र आता है! हालांकि इसी खंड में 74 शेरों की वह नज़्म भी मौजूद है जिसमें सम्राट एडवर्ड सप्तम को श्रद्धांजलि दी गयी है.
समग्र में उपलब्ध सुरूर जहानाबादी की पांच ग़ज़लों को पढ़कर यह समझने में देर नहीं लगती कि उनका हाथ ग़ज़लों के मामले में थोड़ा तंग था. इन पांच ग़ज़लों में से केवल दो ग़ज़लों में सात-सात शेर, एक ग़ज़ल में छ: शेर, एक अन्य ग़ज़ल में पांच शेर तथा आख़िरी ग़ज़ल में सिर्फ 4 शेर ही हैं!  एक अन्य ग़ज़ल को भी पुस्तक में अप्राप्य श्रेणी में स्थान मिला है (पृष्ठ-781) जिसमें मात्र 5 शेर हैं और चौथा शेर इस ग़ज़ल का नहीं लगता है, क्योंकि उसका क़ाफ़िया ही अलग है. फुटकर शेरों की संख्या भी मात्र 5 ही है. क़ते सिर्फ़ 3 लिखे. रुबाइयों की संख्या ज़रूर 88 है, उनके नाम से प्रकाशित 12 और शाकिर मेरठी के नाम से प्रकाशित 76.
सुरूर जहानाबादी की शख्स़ियत का अंदाजा़ इस बात से भी लगता है कि उनके आकस्मिक निधन के बाद प्रेमचंद ने उनकी शायरी पर एक लंबा लेख लिखा, जो 'ज़माना' जुलाई 1911 में प्रकाशित हुआ था. इस लेख में प्रेमचंद ने कहा था-
'सुरूर! हमने जीवित रहते तुम्हारा सम्मान नहीं किया.... तुम्हें हाथों से खोकर अब हम तुम्हारा सम्मान कर रहे हैं. यदि तुमने संसार के किसी अन्य देश में जन्म लिया होता तो आज तुम्हारी समाधि पर हीरे-मोती न्योछावर किए जाते, तुम्हारे स्मारक बनते, लोग तुम्हारे नाम पर जान छिड़कते. लेकिन यदि हम इस योग्य नहीं हैं कि तुम्हारी समाधि पर हीरे-मोती न्योछावर कर सकें, यद्यपि हममें तुम्हारा स्मारक बनाने की योग्यता और पात्रता नहीं है, तथापि तुम्हारे नाम पर जान छिड़कने वालों की संख्या कम नहीं है. यद्यपि तुम्हारी सभा निरंजन हो गई लेकिन तुम्हारा वह ख़ुमख़ाना शेष है जो मस्ती और प्रेम का एक अनित्य निर्झर है.' (पृष्ठ-815)      
यह उल्लेख किया जाना भी महत्त्वपूर्ण होगा कि मशहूर उर्दू शायर और 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' जैसा अमर गीत लिखने वाले इक़बाल और सुरूर जहानाबादी आपस में गहरे मित्र थे. डॉ नाज़िम  बताते हैं कि यूरोप जाने के बाद जब इक़बाल का शायरी से मोहभंग हो गया था तो वहां से लौटने ‌के बाद उन्हें शायरी की ओर वापस लाने का काम सुरूर जहानाबादी ने ही किया था. इक़बाल सुरूर जहानाबादी को एक बेहतरीन शायर मानते थे.
आलोच्य पुस्तक सुरूर जहानाबादी पर तो केंद्रित है ही, लेकिन यह इसके शोधकर्ता व संपादक डॉक्टर अलिफ़  नाज़िम की भी पुस्तक है, जिन्होंने अथक परिश्रम से इस शोधपूर्ण समग्र को साहित्य की दुनिया में लाने में सफलता प्राप्त की है. अब शायद ऐसा कुछ भी प्रकाशित-अप्रकाशित नहीं है जो कहीं उपलब्ध हो और वह इस समग्र में शामिल न हो. यह पहले ही उल्लेख किया जा चुका है कि यह डॉ अलिफ़ नाज़िम के प्रयास से ही सम्भव हो पाया है कि 'अक्सीरे-सुखन' कृति को 102 वर्षों के बाद उसके असली रचनाकार सुरूर जहानाबादी का नाम मिल पाया.
इस सुन्दर और कालजयी पुस्तक के प्रकाशन में वेद प्रचार मण्डल, बठिण्डा, पंजाब व अबोहर के प्रोफेसर राजेंद्र जिज्ञासु के महत्त्वपूर्ण योगदान की चर्चा न करना कृतघ्नता की ही श्रेणी में आएगा. पुस्तक में उपलब्ध प्रोफेसर राजेंद्र जिज्ञासु का 'प्राक्कथन' यह बताता है कि वह सुरूर जहानाबादी से किस गहराई से जुड़े हुए थे. उन्हें महाकवि की संज्ञा देते हुए उन्होंने समग्र में अपनी टिप्पणी अंकित की है कि-
'महाकवि सुरूर को उर्दू साहित्य का सागर लिखने वाले लेखकों ने विस्मृति के अथाह सागर के गर्त में डुबोकर रख दिया. भला हो डॉ अलिफ़ नाज़िम जी का जिन्होंने अपनी सतत साहित्य साधना से देश के माथे पर लगे इस कलंक के टीके को धो डाला है.' (पृष्ठ-20)
प्रो. जिज्ञासु ने एक अपेक्षाकृत कठोर टिप्पणी अंकित करते हुए उर्दू के इतिहास लेखकों को सीधा-सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है-
'इतिहास लेखक प्रायः अलीगढ़ के पढ़े हुए थे. हमें ऐसा लगा कि अलीगढ़ के विश्वविद्यालय में पिलाई गई घुट्टी के कारण उर्दू साहित्य के इतिहास लेखकों ने हिन्दू लेखकों, पत्रकारों व कवियों पर या तो कुछ लिखा ही नहीं और यदि किसी पर कुछ लिखा भी है तो बहुत कंजूसी से'. (पृष्ठ-21)
‌प्रोफेसर राजेन्द्र जिज्ञासु ऐसा कहने के इसलिए भी अधिकारी हैं क्योंकि वे 2017 में सुरूर के जीवन व रचनाओं पर आधारित अपनी हिन्दी पुस्तक 'हृदय की तड़पन' का प्रकाशन कर चुके हैं. वह सुरूर के साहित्य का संज्ञान लेते हुए यह टिप्पणी भी करते हैं-
'यह तो ठीक है कि महाकवि सुरूर जी से पहले भी अपवाद रूप में कुछ उर्दू कवियों ने देश प्रेम वह देश सेवा पर कुछ लिखा ही होगा परन्तु उनकी रचनाओं को अपवाद ही मानना पड़ेगा. यह तो सुरूर महाकवि ही था जिसने भावभरित हृदय से मातृभूमि की सेवा, गुण कीर्तन को एक मुख्य विषय बनाकर देश के पर्वतों, नदियों, ऋतुओं, खेतों, पेड़-पौधों, जलवायु, पर्वों देश के महापुरुषों, वीरांगनाओं, बलिदानियों पर दिल खोलकर अत्यन्त भावपूर्ण हृदयस्पर्शी कविताएं लिखकर देश को जगाता रहा.' (पृष्ठ-22)
सुरूर जहानाबादी की काव्य-भाषा बताती है कि वह उनके ज़माने की वह उर्दू है जिस पर फ़ारसी का बहुत प्रभाव रहा है. हम जैसे हिन्दी के लोगों और उर्दू के सामान्य जानकारों के लिए भी इसमें रम पाना चुनौती भरा है. उनकी भाषा का प्रभाव आप फ़िराक़ गोरखपुरी और परवर्ती दूसरे उर्दू शायरों में एक सीमा तक देख पाएंगे. लेकिन इस समग्र में उपलब्ध सुरूर साहब का एकमात्र गद्य कहीं खो चुका था. उसे अलिफ़ नाज़िम ने खोज कर पाठकों के लिए उपलब्ध कराया है.
'ज़िन्दा-ए-जावेद फूल' यानी अमर पुष्प शीर्षक वाला यह गद्य खासा दिलचस्प है. कुल 7 पृष्ठों के इस गद्य में मात्र 4 पैराग्राफ़ हैं, जिसमें पहले पैराग्राफ की लंबाई ही 5 पृष्ठों तक फैली हुई है. इसकी भाषा शुरू से ही उनकी काव्य-भाषा से बिल्कुल अलग है और यह कुछ स्थलों पर प्रेमचंद की कहानियों जैसी सहज और सरल है. गद्य और पद की भाषा की इतनी बड़ी फांक बताती है कि उस समय पद्य के लिए किस तरह से एक विशिष्ट एवं अलग किस्म की भाषा की खोज सुरूर साहब ने अपने लिए की. कदाचित ऐसा ही उनके समकालीन दूसरे शायर भी करते रहे होंगे. उस समय फ़ारसी का ज्ञान अंग्रेजी के ज्ञान की तरह ही कुलीनता-बोध से जुड़ा रहा होगा और इसीलिए आम प्रयोग और बोलचाल की भाषा का अतिक्रमण करते हुए  शुद्ध साहित्यिक भाषा का अविष्कार किया जाता होगा.
दरअसल यह गद्य और कुछ नहीं, एक ललित निबंध है, जिसमें बोधकथा जैसी गुणवत्ता भी सुरूर साहब ने पिरोई है. वह एक ऐसे अमर पुष्प की तलाश में हैं, जो कभी मुरझाता न हो और जिसकी ताज़गी हमेशा ज़िन्दा रहती हो. ज़ाहिर‌ है, ऐसा कोई फूल दुनिया में पैदा नहीं हुआ लेकिन सुरूर साहब यह फूल क़ौम से मोहब्बत करने वाले लोगों के चरित्र में खोज निकालते हैं. इसके लिए उन्हें स्वप्न में जाना पड़ता है और एक ऐसा दृश्य रचना पड़ता है जहां उस अमर पुष्प को पाने की लालसा में लोग जहरीले सांपों का शिकार होकर मारे जाते हैं! अपनी इस रचना में सुरूर साहब नौजवान लोगों को ऐसी लालसा के ख़तरों के प्रति आगाह करते भी नज़र आते हैं. इस गद्य में वे  उर्दू के साथ-साथ शुद्ध हिन्दी ही नहीं, बल्कि संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग करके भाषा में एक नया चमत्कार पैदा करते दिखाई देते हैं. यहां हम दो उदाहरणों से बात को ज्यादा स्पष्ट कर पाएंगे-
'उनकी स्मृतियों के फ़ानूस शिक्षा के विद्युतीय प्रकाश से तो अवश्य रोशन थे किन्तु अभी उन पर तजुरबे ने पालिश नहीं की. उनके पग उन्हें दिए गए जीवन के कठिनतम जीने की ख़तरनाक सीढ़ियों पर थे, जहां ज़माने की ठोकर इससे पहले कितने ही बेपरवाह अदूर-दृश्यता रखने वाले ऐशपरस्त नौजवानों को धकेल कर निकबत में गिरा चुकी थी.' (पृष्ठ-68)
'वो ख़िजर सूरत वयोवृद्ध जो सामने वाले कुंज में दिखाई देते थे और जिनके सरों पर फूलों की ख़ूबसूरत टोकरियां और तुर्रे सुसज्जित थे वो क़ौम से मोहब्बत करने वाले भिक्षुक हैं जिन्होंने उच्च कोट की हिम्मत, नफ़्स को मारना, एहतियात पसन्द, अपने ऊपर नियन्त्रण रखने वाले और पुरजोश हिम्मत के साथ जीवन के खतरों से भरे मार्गों से गुज़र कर क़ौमी और मुल्की सेवाओं को बड़ी सरगरमी और जांबाज़ी के साथ अंजाम दिया है और जिनकी बेलोस देश प्रेम और जांबाज़ी के बदले में अंततः साधारण प्रसिद्ध और अमिट जीवन के ज़िन्दा जावेद फूलों के ताज रखे गए.' (पृष्ठ-69)
दिलचस्प बात यह है कि सुरूर साहब अपने इस निबंध का समापन जिन शेरों के साथ करते हैं वे तो बिल्कुल फ़ारसी के शेर ही लगते हैं-
           हां बे दर शोज़ आलमे-फ़ानी,
           हवसे-दिल दरू चे मीरानी.
           ज़ाहिरा गर चे हस्त नक़्शोनिगार,
           वातिनश जुमला हस्त वीरानी.
           दीगरां आमदन्दो बगज़िश्तंद
           चन्द रोज़े तू नीज़ महमानी.
        ‌    (पृष्ठ-70)

यह उचित होगा कि सुरूर साहब की काव्य-भाषा के एक-दो नमूने उनके पहले काव्य-संग्रह 'जामे- सुरूर' से भी देख लिए जाये-

'अक़्ले-दकीका‌ रस का दौड़ा समन्द बरसों
रौंदा किया‌ जहां के पस्त-ओ- बुलन्द बरसों
ढूंडा किया तुझे मैं ज़ार-ओ-नज़न्द बरसों
बामे-फ़लक पे फेंकी उड़कर कमंद बरसों
             तेरा पता न पाया ओ ला मकान वाले
             सारे जहां में ढूंड़ा सारे जहान वाले'
               ( ज़मज़मा-ए-तौहीद, पृष्ठ-76)

'शुभ मुहूरत वो अजब थी वो अजब शुभ थी लगन
कि जब आकाश से उतरा था ‌तेरा सिंहासन
नज़र आई तेरी सूरत में अजब हुस्न की जोत
तूने देवी हमें अपने जो दिखाए दर्शन
इक चकाचौंध का आलम दमे-नज़्ज़ारा था
गोरा गोरा तने-नाज़ुक था सरापा कुन्दन
शोला-ए-हुस्ने-दिल अफरोज़ भड़क उठता था
रुखे-रोशन पे जो पड़ जाती थी सूरज की किरन'
‌ ‌   (लक्ष्मी जी, पृष्ठ-79)
यहां सुरूर साहब की भाषा के बारे में सुप्रसिद्ध उर्दू शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के विचार जान लेना बेहद प्रासंगिक होगा-
'अगर हम ईमान के स्थान पर मुसलमानों की उर्दू शैली पर ध्यान दें तो हमारी समझ में वास्तविकता आ जाएगी कि हमारे मुसलमान भाई अपने देशवासी हिन्दुओं के जीवन की बहुत ही उपयोगी बातों से अब तक वंचित रहे हैं. प्रेमचन्द ने, दुर्गा सहाय सुरूर ने, चकबस्त ने, स्वयं मैंने उर्दू दर्पण को तनिक भी ठेस लगाए बिना अन्दर से उर्दू ज़बान को इस तरह बदल दिया है कि यह काम आरम्भ में किसी मुसलमान के लिए असम्भव था. और ऐसे हिन्दू के लिए भी असम्भव था जिसकी प्रवृत्ति मुसलमानों की उर्दू की भांति केवल अनुकरणात्मक और कृतज्ञतात्मक हो. (फ़िराक़ गोरखपुरी: गुफ़्तगू, पृष्ठ-72)

फ़िराक़ साहब की यह टिप्पणी बताती है कि उन्होंने उर्दू ज़बान पर सुरूर साहब के प्रभाव को किस शिद्दत के साथ स्वीकार किया है! उनकी  टिप्पणी यह भी बताती है कि सुरूर साहब एक ख़ास किस्म की उर्दू का दकियानूसी अनुसरण और पैरोकारी करने के बजाय उसमें बहुत प्रभावी तरीके से ज़मीनी और सांस्कृतिक स्तर पर बदलाव के कारक बने.
यह कैसा विचित्र संयोग है कि सुरूर जहानाबादी समग्र की सामग्री एक हिन्दू शायर के अवदान पर केंद्रित है, इसका शोध और संकलन एक मुस्लिम विद्वान और आलोचक ने किया है, इसका प्रकाशन आर्य समाज से जुड़े लोगों ने किया है और इसमें खलनायक की-सी भूमिका में रहा व्यक्ति एक ईसाई था! ऐसा कदाचित भारत जैसे सांस्कृतिक बहुलता वाले देश में ही सम्भव हो सकता था !
यदि प्रोफेसर राजेन्द्र जिज्ञासु की पुस्तक 'हृदय की तड़पन' को छोड़ दिया जाय तो हिन्दी में सुरूर जहानाबादी पर यह पहली ही अधिकृत पुस्तक है, समग्र तो यह पहला है ही. डॉ अलिफ़ नाज़िम का प्रयास और उनकी शोध की ईमानदारी समग्र की बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने जिस निष्ठा भाव से पूरी सामग्री का शोध और संकलन किया है वह किसी संस्था द्वारा किए जाने वाले बड़े प्रोजेक्ट जैसा है. उन्होंने इस सामग्री को प्रकाशित करके उर्दू और हिन्दी दोनों के जानकारों के लिए बड़े उपकार का कार्य किया है. इसका मूल्यांकन आने वाला समय और साहित्यिक इतिहास निश्चित रूप से गंभीरता के साथ करेगा और इसके आधार पर इतिहास में ज़रूरी संशोधन व परिवर्धन भी किया जा सकेगा. लोग निश्चित रूप से यह जानने  के लिए भी प्रेरित होंगे कि सुरूर जहानाबादी की रचनात्मकता ने अपने समकालीन और परवर्ती उर्दू शायरी को किस-किस सीमा तक प्रभावित और प्रेरित किया है?
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पुस्तकः मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्र
लेखक एवं संपादनः डॉ अलिफ़ नाज़िम
विधाः शोध
भाषाः हिंदी
पृष्ठ संख्याः 824, डिमाई साइज़
मूल्यः ₹1200 (हार्ड बाउंड)
प्रकाशकः वेद प्रचार मण्डल, 4702, हॉस्पिटल बाज़ार, बठिण्डा, पंजाब-151005.

# यह पुस्तक समीक्षा कमलेश भट्ट कमल ने की है. कमल एक जानेमाने गीतकार, ग़ज़लकार, हाइकुकार और बाल कथाकार होने के साथ ही साहित्य के पारखी हैं. संपर्कः 'गोविन्दम्', 1512, कारनेशन-2, गौड़ सौंदर्यम अपार्टमेंट, ग्रेटर नोएडा वेस्ट, गौतम बुद्ध नगर- 201318 (उ.प्र.).

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