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जयंती विशेषः आलोचना के शिखर पुरुष डॉ रामविलास शर्मा की 3 कविताएं

आधुनिक हिंदी साहित्य की आलोचना में डॉ रामविलास शर्मा का नाम इतना स्थापित है कि उनके कवि रूप की उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि होनी चाहिए. आज उनकी जयंती पर साहित्य आजतक पर तीन कविताएं

डॉ रामविलास शर्मा [ सौजन्यः India Today ] डॉ रामविलास शर्मा [ सौजन्यः India Today ]

आधुनिक हिंदी साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में डॉ रामविलास शर्मा का नाम इतना स्थापित है कि उनके कवि रूप की उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि होनी चाहिए. वजह यह भी है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना के क्षेत्र में डॉ शर्मा सबसे प्रतिष्ठित व स्थापित नाम हैं. शर्मा की साहित्यिक यात्रा की शुरुआत 1933 में महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के संपर्क में आने से हुई. साल 1934 में  ‘निराला’ पर एक आलोचनात्मक लेख के रुप में उनका लेख ‘चांद’ पत्रिका में प्रकाशित क्या हुआ, उनकी लेखनी सृजन के नए आयाम गढ़ने लगी.

डॉ रामविलास शर्मा ने मार्क्सवाद की भारतीय संदर्भ में सबसे सटीक व्याख्या की थी. वह पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर थे. किंतु उनके दिलों में हिंदी धड़कती थी. डॉ रामविलास शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में 10 अक्टूबर, 1912 को हुआ था. वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वह ऋग्वेद के परम जानकार, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद और दार्शनिक थे. उन्होंने समाज, संस्कृति, इतिहास, धर्म और दर्शन को अपनी आलोचना का मौलिक तत्त्व बनाया. पर कवि के रूप में वह कितने महत्त्वपूर्ण थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अज्ञेय ने 1943 में खुद के द्वारा संपादित 'तारसप्तक' में उनकी रचनाओं को जगह दी थी. डॉ रामविलास शर्मा की जयंती पर साहित्य आजतक पर उनकी तीन कविताएं

1.
तैर रहे बादल

तैर रहे हैं
ललछौंहे आकाश में
सिंगाल मछलियों-से
सुरमई बादल

खिल उठा
अचानक
विंध्या की डाल पर
अनार-पुष्प-सा
नारंगी सूर्य

मंडराने लगी
झूमती फुनगियों पर
धूप की
असंख्य तितलियाँ

उतर रही है
उतावले डग भरती
नर्मदा घाटी में
बारिश की
चुलबुली सुबह.

2.
अल्हड़ फुहारें 


मेले के लिए
सतरंगे परिधानों से सजी-संवरी
अल्हड़ फुहारें
जोहती हैं बेकली से बाट
जाने कब जुतेंगी
निगोड़ी
ये हवाओं की बैलगाड़ियां .

3.
केरल


एक घनी हरियाली का सा सागर
उमड़ पड़ा है केरल की धरती पर
तरु पातों में खोए से हैं निर्झर
सुन पड़ता है केवल उनका मृदु स्वर

इस सागर पर उतरा वर्षा का दल
पर्वत शिखरों पर अंधियारे बादल
हरियाली से घनी नीलिमा मिलकर
सिन्धु राग-सी छाई है केरल पर

घनी घूम की गुंजें शिखर-शिखर पर
झूम रहा हो मानो उन्मद कुंजर
ऐसे ही होंगे दुर्गम कदलीवन
कविता में पढ़ते हैं जिनका वर्णन

सीमा तज कर एक हो गए सरि सर
बांहें फैलाए आता है सागर
कल्पवृक्ष हैं यहीं, यहीं नंदन वन
नहीं किंतु सुर सुंदरियों का नर्तन

घनी जटाएं कूट कूट कर बट कर
पेट पालते है ज्यों त्यों कर श्रमकर
यही वृक्ष है निर्धन जनता का धन
अर्धनग्न फिर भी नर नारी के तन

जिन हाथों ने काट काट कर पर्वत
यहां बनाया है दुर्गम वन में पथ
कब तक नंदन में श्रमफल से वंचित
औरों की संपदा करेंगे संचित

अर्ध मातृ सत्ताक व्यवस्था तज कर
नई शक्ति से जागे है नारी नर
लहराता है हरियाली का सागर
फिर सावन छाया है इस धरती पर.

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