राष्ट्रवादी कांग्रेस के दोनों गुटों में घड़ी पर छिड़ी जंग में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में कोई बदलाव करने से इंकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस के वी विश्वनाथन ने कहा कि पीठ दोनों गुटों के नाम और निशान को लेकर पिछले महीने दिए अपने आदेश में कोई बदलाव या सुधार नहीं करने जा रही है.
बता दें कि पीठ ने इसी साल 19 मार्च को निर्देश दिए थे, जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुट के चुनाव चिह्न का स्पष्टीकरण था. शरद पवार गुट अपने नाम के साथ शरद चंद्र पवार भी लिखेगा. उसका निशान तूरा बजाता आदमी होगा. अजित पवार गुट के पास पार्टी का नाम और घड़ी चिह्न तो होगा, लेकिन उनको अखबारों में उद्घोषणा करनी होगी कि अलार्म घड़ी अभी सुप्रीम कोर्ट में विवादित है. फाइनल निर्णय आने तक ये अजित पवार गुट के पास है.
कोर्ट में विचाराधीन है सिंबल का आवंटन
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आपके पक्ष के कुछ लोग भी आदेश की गलत व्याख्या कर सकते हैं. आदेश का उद्देश्य इसे सार्वजनिक करना था. सिंबल का आवंटन न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए वे इसे अस्थायी रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर हम पाते हैं कि पार्टी ने इसका पालन किया है तो हो सकता है कि एक या दो पदाधिकारी जानबूझकर ऐसी अवहेलना कर रहे हों.
बड़े विज्ञापन जारी करने की सलाह
अजित पवार के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि आदेश के मुताबिक हमने मराठी, हिंदी और अन्य भाषाओं में विज्ञापन जारी किए हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन फ्रंट मे नहीं छापे गए, एक कोने मे छापे गए हैं. हम यह स्पष्ट कर दें कि हम आदेश में कोई संशोधन नहीं कर रहे हैं. हमें पार्टियों की ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है. लेकिन आप बड़े विज्ञापन जारी कर सकते हैं. साथ ही हम जमीनी स्तर पर कठिनाई को समझते हैं, लेकिन आपके पदाधिकारियों को भी समझना चाहिए. हालांकि ट्वीटर पर शब्दों को लिखने की एक सीमा होती है.
डिस्क्लेमर के बाद छापे गए विज्ञापन
इस दौरान अभिषेक मनु सिंघवी ने शरद पवार गुट की ओर से दलील रखी. उन्होंने बताया कि 24 मार्च को अजित पवार गुट का एक बैनर लगा था. उस बैनर विज्ञापन का हवाला देते हुए सिंघवी ने कहा कि उसमें भी घड़ी का चिह्न अंकित है और शरद पवार की तस्वीर भी है. विज्ञापन में लिखा है कि सुप्रिया ताई तीन बार चुनाव जीत गईं, इसका मतलब ये नहीं है कि विकास हो गया! ये सब डिस्क्लेमर के बाद हुआ है.
भविष्य में तय होगा, किसे मिलेगी 'घड़ी'
उस विज्ञापन में केंद्रीय कार्यालय और मुंबई कार्यालय का पता भी मूल कार्यालय का है. कार्यक्रम एक न्यूज चैनल पर चला, जिसमें वो बैनर दिखाया गया. सोशल मीडिया पर भी ये सब मौजूद है. सिंघवी ने अजित पवार ग्रुप के कई विज्ञापनों के जरिए बताने की कोशिश की है कि सुप्रीम कोर्ट में भरोसा देने के बाद भी ये लोग सिंबल का इस्तेमाल बिना डिस्क्लेमर के करते रहे कि ये घड़ी का चिह्न सुप्रीम कोर्ट में विवाद का विषय है. सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि ये घड़ी भविष्य में किस गुट के पास रहेगी.
अजित गुट नहीं कर रहा निर्देश का पालन!
सिंघवी ने कहा कि कोर्ट ने अजित पवार गुट को घड़ी का निशान इस उद्घोषणा के साथ इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी कि ये टेबल अलार्म घड़ी का चिह्न सुप्रीम कोर्ट में विवादित है. भविष्य में ये चिह्न किसके पास रहेगा, उसका फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा. लेकिन अजित गुट इसका पालन नहीं कर रहा. विज्ञापनों पर डिस्क्लेमर कहीं नहीं है.