मणिपुर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने पूर्वोत्तर भारत की पहली ट्रांसजेंडर डॉक्टर, डॉ. बीओनसी लैशराम (Dr. Beoncy Laishram) की कानूनी लड़ाई में उनके पक्ष में फैसला सुनाया है. कोर्ट ने मणिपुर के शिक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालय और मेडिकल काउंसिल को उनके नए नाम और लिंग के साथ नए सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया है. डॉ. बीओनसी ने अपनी पहचान को कानूनी मान्यता देने के लिए याचिका दायर की थी. डॉ. बीओनसी लैशराम का जन्म का नाम 'बोबोई लैशराम (Male)' था.
2019 में लिंग पुनर्मूल्यांकन सर्जरी के बाद, इम्फाल पश्चिम के जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें 'डॉ. बीओनसी लैशराम' के नाम से 'महिला' लिंग का ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र और पहचान पत्र जारी किया. उनके आधार, पैन और वोटर आईडी में भी यह जानकारी अपडेट हो चुकी है.
हालांकि, BOSEM, COHSEM और मणिपुर विश्वविद्यालय ने नियमों की कमी का हवाला देते हुए उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में बदलाव करने से इनकार कर दिया था.
कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला...
मणिपुर हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने फैसला सुनाया कि ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 एक स्पेशल कानून है, जो सामान्य नियमों को खत्म करता है. कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 6, 7 और 10 के तहत शैक्षणिक संस्थानों का यह दायित्व है कि वे एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रिकॉर्ड को सही करें. कोर्ट ने BOSEM, COHSEM, एमयू और मणिपुर मेडिकल काउंसिल को एक महीने के अंदर डॉ. बीओनसी के लिए नए सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया है.
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कोर्ट का यह फैसला ट्रांसजेंडर लोगों के लिए एक बड़ा कदम है. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि जब तक औपचारिक संशोधन नहीं हो जाते, अधिनियम की धारा 6 और 7 को मणिपुर के सभी मौजूदा कानूनों, नियमों और उपनियमों में तब तक शामिल माना जाएगा. राज्य सरकार के मुख्य सचिव को भी इस फैसले का पालन करने के लिए राज्य के सभी प्रतिष्ठानों को निर्देश जारी करने का आदेश दिया गया है.