असम अब तक लाचित बरफुकन की वीरता का जश्न मनाता रहा है जिन्होंने 1671 में सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को हराया था. लेकिन अब भाजपा सरकार ने ध्यान राजा पृथु पर केंद्रित किया है. राजा पृथु लाचित से करीब 400 साल पहले हुए थे और उन्होंने तुर्क-अफगान सेनापति बख्तियार खिलजी की सेना को परास्त किया था.
मंगलवार को असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि साल 1206 में महाराज पृथु ने खिलजी की सेना का सफाया किया था. उन्होंने इसे 'असम की अनंत वीरता गाथा' बताया. सरमा ने कहा कि नालंदा जो हमारी प्राचीन सभ्यता का प्रतीक था, उसको उजाड़ने के बाद खिलजी कामरूप की ओर बढ़ा था. लेकिन महाराज पृथु ने उसकी सेना को मात दी. इसी विरासत को सम्मान देने के लिए असम कैबिनेट ने राज्य के सबसे लंबे फ्लाईओवर का नाम 'महाराज पृथु फ्लाईओवर' रखने का फैसला किया है.
कौन थे कामरूपा के राजा पृथु?
राजा पृथु (जिन्हें पृथु राय भी कहा जाता है) 13वीं सदी के कामरूपा साम्राज्य के राजा थे जो आज का असम है. माना जाता है कि उनका शासनकाल लगभग 1195 से 1228 तक रहा. मुख्यधारा के इतिहास में उनका नाम उतना प्रमुख नहीं दिखता, लेकिन स्थानीय लोककथाओं, अभिलेखों और परंपराओं में उन्हें महान रक्षक और नायक माना गया है.
पृथु खेन वंश से थे, जिन्हें नरकासुर का वंशज बताया जाता है. वे कामतेश्वरी देवी (देवी दुर्गा का स्वरूप) की उपासना करते थे. स्थानीय अभिलेख बताते हैं कि उन्होंने जलपाईगुड़ी (उत्तर बंगाल) और रंगपुर (आज का बांग्लादेश) क्षेत्र में किले और मंदिरों का निर्माण भी कराया. जब खिलजी 12 हजार घुड़सवार और 20 हजार पैदल सेना लेकर असम पहुंचा.
साल 1205–1206 में नालंदा और बंगाल को उजाड़ने के बाद बख्तियार खिलजी तिब्बत की ओर बढ़ना चाहता था और उसका रास्ता कामरूप से होकर जाता था. इतिहासकार कनकलाल बरुआ ने अपनी किताब अर्ली हिस्ट्री ऑफ कामरूप (1933) में लिखा है कि खिलजी की सेना कामरूप में घुसी थी लेकिन वहीं नष्ट हो गई.
खिलजी की फौज में करीब 12 हजार घुड़सवार और 20 हजार पैदल सैनिक थे. उसने एक जनजातीय सरदार अली मेच को फुसलाकर अपने पक्ष में कर लिया, जिसने खिलजी की सेना को असम के कठिन इलाकों से गुजरने में मदद की. लेकिन जैसा इतिहासकार प्रताप चंद्र चौधरी ने कहा था कि जब लगभग पूरा भारत मुस्लिम सेनाओं के कब्जे में आ चुका था, असम में उनकी घुसपैठ की कोशिशें बार-बार नाकाम हुईं.
राजा पृथु ने कैसे खिलजी को हराया
राजा पृथु ने युद्ध से पहले 'स्कॉर्च अर्थ' रणनीति अपनाई यानी रास्ते के गांव खाली कर दिए और अनाज व संसाधन हटा दिए ताकि दुश्मन को कुछ न मिले. जब खिलजी की सेना प्राग्ज्योतिषपुर (आज का गुवाहाटी) पहुंची तो उसे अचानक घेर लिया गया. ये हमला मुख्य रूप से बोडो, कोच राजबंशी और केवट समुदाय के योद्धाओं ने किया, जिनका नेतृत्व राजा पृथु कर रहे थे. खिलजी ने गांवों को लूटकर आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन उसका रास्ता रोक दिया गया.
बरुआ के अनुसार राजा पृथु ने खिलजी के लिए रास्ते और पुल को तोड़ दिया था. पीछे से भी रास्ता बंद कर दिया और खिलजी की रसद काट दी. खिलजी घबरा गया और एक मंदिर में शरण ली लेकिन जब चारों ओर से राजा की सेना ने घेर लिया तो वह अपने घुड़सवारों के साथ नदी में कूद पड़ा. अधिकांश वहीं मारे गए.
ऐतिहासिक प्रमाण
गुवाहाटी के उत्तर में ब्रह्मपुत्र के किनारे 'कनाई बरसी' शिलालेख में भी दर्ज है कि तुर्क असम में घुसे थे और पूरी तरह नष्ट हो गए थे. बरुआ ने कहा कि ये शिलालेख 13वीं सदी का है, हालांकि इसमें यह साफ नहीं लिखा है कि तुर्कों को किसने हराया. इतिहासकारों का मानना है कि खिलजी की हार इतनी जबरदस्त थी कि वो कभी संभल नहीं पाया और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई.
कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया (वॉल्यूम-3) में ब्रिटिश अधिकारी वोल्सले हैग ने लिखा कि राजा पृथु ने सिर्फ खिलजी को ही नहीं, बल्कि दिल्ली सल्तनत के ग्यासुद्दीन के सेनापति हिसानुद्दीन इवाज को भी हराया था. भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक, 'राजा पृथु राय ने खिलजी को ऐसी पराजय दी कि वह फिर कभी युद्ध लड़ ही नहीं पाया और अपमानजनक हार से शर्मसार होकर मर गया.'
असम का संघर्ष और परंपरा
सीएम सरमा ने कहा कि 1205 से 1682 के बीच असम पर 18 बड़े इस्लामी हमले हुए, लेकिन एक-एक कर सबको रोका गया. 'महाराज पृथु से लेकर लाचित बरफुकन और आखिर में इटाखुली की लड़ाई तक, असम कभी झुका नहीं. जबकि भारत का बड़ा हिस्सा खिलजी, तुगलक, अफगान और मुगलों के अधीन हो गया, असम ने हमेशा प्रतिरोध किया. यही हमारी विरासत है, बलिदान और अडिग आत्मा की कहानी.'
आज सदियों बाद, राजा पृथु की गाथा जो मुख्यधारा में गुम हो चुकी थी, फिर जीवित हो रही है. असम सरकार द्वारा फ्लाईओवर का नाम उनके नाम पर रखे जाने से एक बार फिर उन्हें सम्मान मिला है.