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क्या था ज्ञानवापी पर 1937 का फैसला, जानिए कब कौन कोर्ट लेकर गया मामला?

Kashi Vishwanath Gyanvapi Masjid: बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है. सर्वे के बाद हिंदू पक्ष ने ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने का दावा किया है तो मुस्लिम पक्ष ने 1937 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया है.

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काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद अगल-बगल बने हैं. (फाइल फोटो)
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद अगल-बगल बने हैं. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1936 में पहली बार कोर्ट गया था ज्ञानवापी मामला
  • 1937 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था
  • 1937 से 1991 तक इस मामले में विवाद नहीं हुआ
  • 1991 में फिर अदालत पहुंचा ज्ञानवापी का मामला

Kashi Vishwanath Gyanvapi Masjid: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में कई दिनों से काफी हलचल है. कारण है काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद. वाराणसी की निचली अदालत के आदेश पर तीन दिन तक ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे किया गया. इस सर्वे के बाद हिंदू पक्ष ने यहां शिवलिंग मिलने का दावा किया है. हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने इस दावे को नकार दिया है. 

दरअसल, पांच महिलाओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में बनी ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा करने की इजाजत देने को लेकर वाराणसी कोर्ट में गुहार लगाई थी. महिलाओं की मांग पर कोर्ट ने यहां सर्वे कराने का आदेश दिया था. 

शिवलिंग मिलने का दावा करने के बाद परिसर को सील कर दिया गया है. ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है. वहीं, अल्पसंख्यक कांग्रेस के अध्यक्ष शाहनवाज आलम ने बताया कि 1937 में बनारस कोर्ट ने तय कर दिया था कि कितनी जमीन मस्जिद की होगी और कितनी मंदिर की. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या 1937 में वहां शिवलिंग नहीं था? और जब तब वहां शिवलिंग नहीं था तो अब कैसे मिल गया?

हैदराबाद से सांसद और AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस सर्वे को संविधान के खिलाफ बताया. उन्होंने कहा कि ये सर्वे 1991 के पूजा स्थल कानून का खुलेआम उल्लंघन है. ओवैसी ने कहा कि देश अपने ही बनाए कानून को नहीं मान रहा है. 

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ज्ञानवापी मस्जिद परिसर. (फाइल फोटो)

क्या था 1937 का फैसला?

- वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर को लेकर सबसे पहला मुकदमा 1936 में दीन मोहम्मद बनाम राज्य सचिव का था. तब दीन मोहम्मद ने निचली अदालत में याचिका दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद और उसकी आसपास की जमीनों पर अपना हक बताया था. अदालत ने इसे मस्जिद की जमीन मानने से इनकार कर दिया था.

- इसके बाद दीन मोहम्मद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की. 1937 में हाईकोर्ट ने मस्जिद के ढांचे को छोड़कर बाकी सभी जमीनों पर वाराणसी के व्यास परिवार का हक जताया और उनके पक्ष में फैसला दिया. बनारस के तत्कालीन कलेक्टर का नक्शा भी इस फैसले का हिस्सा बना, जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने का मालिकाना हक व्यास परिवार को दिया गया.

- हालांकि, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव खालिद सैफुल्लाह रहमानी का दावा है कि उस फैसले में कोर्ट ने गवाही और दस्तावेजों के आधार पर फैसला दिया था कि पूरा परिसर (ज्ञानवापी मस्जिद कॉम्प्लेक्स) मुस्लिम वक्फ का है और मुस्लिमों को यहां नमाज पढ़ने का अधिकार है.

- रहमानी का दावा है कि उस फैसले में कोर्ट ने मंदिर और मस्जिद का क्षेत्रफल भी तय कर दिया था. इसके अलावा अदालत ने वजूखाने को मस्जिद की संपत्ति माना था. इसी वजूखाने में अब हिंदू पक्ष शिवलिंग मिलने का दावा कर रहा है.

1991 में फिर अदालत पहुंचा मामला

- इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद 1937 से 1991 तक ज्ञानवापी परिसर को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ. 15 अक्टूबर 1991 में ज्ञानवापी परिसर में नए मंदिर निर्माण और पूजा पाठ की इजाजत को लेकर वाराणसी की अदालत में याचिका दायर की गई.

- ये याचिका काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशज पंडित सोमनाथ व्यास, संस्कृत प्रोफेसर डॉ. रामरंग शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता हरिहर पांडे ने दाखिल की. इनके वकील थे विजय शंकर रस्तोगी.

- याचिका में तर्क दिया गया कि काशी विश्वनाथ का जो मूल मंदिर था, उसे 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था. 1669 में औरंगजेब ने इसे तुड़वाकर यहां मस्जिद बनवा दी. 

- इस याचिका पर सिविल जज (सीनियर डिविजन) ने दावा चलने का आदेश दिया. इसे दोनों पक्षों ने सिविल रिविजन जिला जज के सामने चुनौती दी गई. अदालत ने सिविल जज के फैसले को निरस्त कर दिया और पूरे परिसर के सबूत जुटाने का आदेश दिया.

- इसके बाद ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गई. कमेटी ने दलील दी कि इस मामले में कोई फैसला नहीं लिया जा सकता, क्योंकि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत इसकी मनाही है. हाईकोर्ट ने जिला जज के फैसले पर रोक लगा दी. 

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ज्ञानवापी परिसर में तीन दिन सर्वे चला. इस दौरान कड़ी सुरक्षा रही. (फाइल फोटो-PTI)

लेकिन ये प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट है क्या?

- 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन चरम पर था. अयोध्या में राम मंदिर की मांग के साथ-साथ दूसरी और मस्जिदों में मंदिर निर्माण की मांग उठने लगी थी. इसी दौर में 'अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है...' जैसे नारे भी गूंजने लगे थे.

- ऐसे ही मंदिर-मस्जिद के विवादों पर विराम लगाने के लिए तब की पीवी नरसिम्हा राव एक कानून लेकर आई. इस कानून का नाम था प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट यानी पूजा स्थल अधिनियम. 

- ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वो उसी रूप में रहेगा. उसके साथ कोई छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता. अगर कोई भी व्यक्ति धार्मिक स्थलों के साथ कोई बदलाव करने की कोशिश करता है, तो उसे एक से तीन साल की कैद या जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है.

तो क्या फंस जाएगा ज्ञानवापी का मामला?

- मुस्लिम पक्षकार कहते रहे हैं कि इस कानून के तहत कोई कार्रवाई नहीं हो सकती. 1998 में इसी कानून के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला जज के फैसले पर रोक लगाई थी. 

- हालांकि, हिंदू पक्ष का कहना है कि इस मामले में ये कानून लागू नहीं होता, क्योंकि मस्जिद को मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था, जिसके हिस्से आज भी मौजूद हैं. दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस कानून के तहत इस विवाद पर कोई फैसला नहीं हो सकता.

फिर अयोध्या का विवाद कैसे सुलझा?

- 1991 के इस कानून से अयोध्या विवाद को छूट दी गई थी. उसकी वजह ये थी कि अयोध्या का विवाद आजादी से पहले से ही अदालत में चल रहा था. अयोध्या मामले में 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था. इस फैसले में यहां राम मंदिर बनाने की इजाजत दी गई थी, जबकि मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह जमीन देने का आदेश दिया गया था.

 

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