हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में दिवाली के अगले दिन एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है. इसके तहत शिमला से करीब 30 किलोमीटर दूर धामी के हलोग में पत्थरों का अनोखा मेला लगता है. सदियों से मनाए जाने वाले इस मेले को पत्थरों का मेला या खेल कहते हैं. दिवाली के अगले दिन मनाए जाने वाले इस मेले में दो समुदायों के बीच पत्थरों की भारी बारिश होती है.
दरअसल, शुक्रवार को एक अनोखी परंपरा के तहत धामी में दो गुटों की ओर से पत्थरों की भारी बारिश हुई. यह क्रम तब तक जारी रहा जब तक एक पक्ष खून से लथपथ नहीं हो गया. मेले की शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह पूजन से होती है. सैकड़ों सालों से चली आ रही इस परंपरा को लोग आज भी धूमधाम से मनाते हैं.
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300 साल पहले नरबलि बंद करने का दिया था आदेश
धामी मैदान में लगे मेले में सैकड़ों लोग शामिल हुए. धामी रियासत के राजा पूरे शाही अंदाज में मेला स्थल पर पहुंचे. राजपरिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह और पुजारी देवेंद्र भारद्वाज ने बताया कि मान्यता है कि पहले हर साल भद्रकाली को नरबलि दी जाती थी. लेकिन करीब 300 साल पहले धामी स्टेट की रानी ने सती होने से पहले नरबलि बंद करने का आदेश दिया.
मां भद्रकाली के चबूतरे पर खून सो होता है तिलक
इसके बाद पशुबलि शुरू हुई. समय के साथ इस पर भी रोक लग गई. इसके बाद पत्थर मेला शुरू हुआ. मेले में जब कोई व्यक्ति पत्थर लगने से लहूलुहान हो जाता है, तो मां भद्रकाली के चबूतरे पर उसका (खून) तिलक लगाया जाता है. राजपरिवार और लोगों का दावा है कि आज तक पत्थर लगने से किसी की मौत नहीं हुई है. इस दौरान अगर राजपरिवार में किसी की मौत होती है, तो सबसे पहले मेले की रस्में निभाई जाती हैं. इसके बाद दाह संस्कार किया जाता है.