अर्धनग्न, कृशकाय बूढ़ा व्यक्ति बिहार के चंपारण के पास एक नदी के किनारे बैठा है, उसकी आंखें उदासी से नम हैं, वह अपनी चादर उस पार बैठी एक गरीब महिला और उसके बच्चे की ओर बहा देता है ताकि वे अपना तन ढक सकें. महात्मा गांधी की जीवनी पर आधारित रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी का यह दृश्य शायद निःस्वार्थ राजनीति की सबसे मर्मस्पर्शी स्पष्ट छवि पेश करता है. वह महापुरुष जिसे हम बापू के रूप में प्यार करते हैं और महात्मा के रूप में आदर, जनसेवा के दर्शन का सर्वोच्च प्रतीक था. उसने लाखों वंचितों की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए अपना सब कुछ दे दिया. लगभग एक सदी बाद उस पीढ़ी के उच्च नैतिक मानदंडों के कोई अवशेष नजर नहीं आते- न फिल्मों में, न असल जीवन में.
आज जनता के पैसे से जुटाई गई सुरक्षा के बीच हमारे नेता जिस तरह आलीशान गाड़ियों में प्रादा प्रादो जैसे विदेशी ब्रांडों का बेबाक प्रदर्शन करते हुए फर्राटे भरते नजर आते हैं, वह इस बात का प्रतीक है कि राजनीति अब एक निजी हित साधने के उद्यम में बदल गई है. खादी और गांधीवादी मूल्यों का दिखावा तो '80 वाले दशक में गुची पसंद पीढ़ी के राजनीति के मैदान में उतरने से बहुत पहले ही गांधी टोपी के साथ परिदृश्य से बाहर हो चुके थे. यह बदलाव 1985 में मुंबई में कांग्रेस शताब्दी समारोह में राजीव गांधी के भाषण में परिलक्षित होता है. उनका कहना था कि राजनीति, ''सत्ता और ताकत की दलाली भर रह गई है, ये दलाल जन आंदोलनों को सामंती कुलतंत्र में तब्दील करने के लिए प्रश्रय देते हैं.'' हां, ऐसे लोग भी हैं जो राजनीति में जनता की सेवा करने के लिए ही आते हैं, लेकिन ये लोग अपवाद भर हो गए हैं, नियम नहीं हैं.
सार्वजनिक जीवन में प्रवेश अब समय और मेहनत का ऐसा निवेश है, जिसकी फसल राजनीतिक उद्यमिता के द्वारा काटी जा सकती है. इंडिया टुडे और एम्पावरिंगइंडिया. ओर्ग (लिबर्टी इंस्टीट्यूट का एक उपक्रम) ने हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की संपत्ति के बारे में जो रिपोर्ट तैयार की है वह शासकों और शासितों के बीच स्तब्धकारी अंतर को उजागर करती है.
ऐसे देश में, जहां 77 फीसदी से अधिक जनसंख्या या अनुमानतः 8.36 करोड़ लोगों की रोज की आमदनी सिर्फ 20 रु. हो और 30 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हों, लगभग 50 फीसदी राज्यसभा सदस्य और लगभग एक-तिहाई लोकसभा सदस्यों के पास 1 करोड़ रु. या उससे अधिक की संपत्ति है. सिर्फ चोटी के 10 राज्यसभा सदस्यों और 10 लोकसभा सदस्यों की संपत्ति को ही जोड़ें तो यह कुल 1,500 करोड़ रु. से अधिक की बैठती है. पिछला लोकसभा चुनाव हारने वालों में नगालैंड के नीमथुंगो-जिनकी संपत्ति 9,005 करोड़ रु. की है-समेत 10 प्रमुख उम्मीदवारों की संपत्ति 9,329 करोड़ की है. विधानसभा सदस्य तो कई सांसदों की तुलना में कहीं अधिक धनी हैं. 30 राज्यों में सबसे धनी विधायकों की कुल संपत्ति 2,042 करोड़ रु. की है. और गौर करने वाली बात तो यह है कि इन 150 करोड़पति विधायकों में से 59 के पास पैन कार्ड तक नहीं हैं.
{mospagebreak}अब राज्य की आर्थिक ताकत और विधायकों के बैंक बैलेंस में कोई संबंध ढूंढ़ना न शुरू कर दीजिए. उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संख्या में गरीब हैं, कहें कि एक-तिहाई से अधिक जनसंख्या यानी 5.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं. लेकिन इस प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती देश के 30 मुख्यमंत्रियों में सबसे धनी हैं. इसी राज्य में 113 करोड़पति विधायक भी हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश में 6 करोड़ लोगों में से 2.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन यह राज्य 80 करोड़पति विधायकों पर 'गौरवान्वित' हो सकता है. इस अध्ययन में मार्क्सवादी एक अपवाद बनकर उभरे हैं. 10 राज्यों में माकपा के 301 विधायक हैं, लेकिन सिर्फ दो ऐसे हैं जिनकी घोषित संपत्ति 1 करोड़ रु. से अधिक की है. माकपा के टिकट पर जिन 537 लोगों ने चुनाव लड़ा था, उनमें से सिर्फ सात के पास 1 करोड़ रु. से अधिक की संपत्ति थी, और उनमें से पांच तो चुनाव हार गए.
जैसीकि पुरानी कहावत है, सत्ता और सत्ता देती है और पैसा पैसे को खींचता है. विधानसभा चुनाव के पिछले दौर को ही लें. इसने संपत्ति में वृद्धि की तुलना का अवसर मुहैया करवाया. राजस्थान और मध्य प्रदेश में, जहां भाजपा सत्ता में थी, उम्मीदवारों की औसत संपत्ति पांच गुना बढ़ गई. कर्नाटक में भी, जहां कांग्रेस और देवेगौड़ा के जद (एस) ने बारी-बारी से शासन किया, कांग्रेसी सदस्यों की संपत्ति में पांच गुना वृद्धि हुई. अच्छी बात यही है कि पैसा हमेशा चुनाव में सफलता की गारंटी नहीं होता. 2004 में कुल 365 करोड़पतियों ने लोकसभा चुनाव लड़ा था; उनमें से 88 की जमानत जब्त हो गई, और 114 दूसरे नंबर पर रहे. पिछले साल दिसंबर में कांग्रेस ने एक बार फिर यह महत्वपूर्ण सबक सीखा, जब उसने देखा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में हारने वाले कांग्रेसी औसतन जीतने वालों की तुलना में अधिक पैसे वाले थे. लेकिन बाकी दूसरी चीजें समान हों तो पैसा महत्वपूर्ण तो होता ही है.
सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता से जुड़ी दूसरी चीजों की तरह ही, हम उसे ही आधार मान रहे हैं, जो हमारे राजनैतिक समुदाय ने घोषित करने की सोची है. आखिरकार, उम्मीदवार द्वारा संपत्ति के बारे में किए गए खुलासे अधिक से अधिक मई, 2002 और मार्च, 2003 के सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों द्वारा अनिवार्य करार दिए गए नियम का पालन ही तो है. उपलब्ध सूचना में काफी विसंगतियां हैं. लोकसभा के 542 सदस्यों में से 522 की ही संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध है. इसी तरह राज्यसभा में सिर्फ 215 सदस्यों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है. और सूचनाओं की पुष्टि करने या जांच की कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं की गई है. न ही उम्मीदवारों के सामने संपत्ति के स्त्रोत का खुलासा करने की बाध्यता है, न ही उम्मीदवारों की संपत्ति में सतत वृद्धि की घोषणा करना अनिवार्य है. मिसाल के तौर पर, मिजोरम में 10 सर्वाधिक धनी उम्मीदवारों में से एक के पास भी पैन कार्ड नहीं था, हालांकि उनकी संपत्ति 1 करोड़ रु. से अधिक की है.
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह कि हालांकि जो सांसद मंत्री हैं वे अपनी संपत्ति का वार्षिक ब्यौरा देते हैं, लेकिन वह जानकारी जनता को उपलब्ध नहीं होती. असल में यह तथ्य पड़ताल की उस अवधारणा को ही नकार देता है, जो सत्ता के दुरुपयोग को रोक कर संपत्ति जमा करने पर अंकुश लगा सकता था. बेशक जो चीज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए थी, वह सूचना के अधिकार कानून के तहत भी नहीं दी जा रही है. यह दुख की ही बात है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यालय-जो ईमानदारी का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है-को भी सूचना न देने के फैसले में शामिल कर लिया गया है.
{mospagebreak}और सबसे बुरी बात तो यह है कि जहां केंद्रीय मंत्रियों को अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना पड़ता है, राज्यों के मंत्रियों के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. फिर भी सत्ता और संपत्ति का यह व्यभिचारी साथ पूरे राजनैतिक परिदृश्य में व्याप्त है. घोषित संपत्ति और वास्तविकता के बीच की यह दरार इतनी सुस्पष्ट है कि उसकी अनदेखी की ही नहीं जा सकती. ऊंचे पदों के लिए चुने गए नेताओं की घोषित संपत्ति और उनकी विलासिता भरी जीवनशैली के बीच के अंतर को देखिए तो आपको विरोधाभास सहज ही समझ में आ जाएगा. तो जाहिर है कि बेनामी संपत्ति को तो अभी छुआ ही नहीं गया है. ऐसे देश में, जहां प्रतिभा को अनुरूप अवसर नहीं मिल पाता, राजनीतिक सत्ता नीतियों में हेर-फेर और बदलाव के जरिए नेताओं के लिए सोने की खान तक पहुंचाने की सीढ़ी बन जाती है. मध्य और उच्च मध्यवर्ग के लिविंग रूम ऐसी चर्चाओं से भरपूर होते हैं कि किसका बेटा, बेटी या दामाद चल या अचल संपत्ति जमा करने के लिए बेनामी रास्ता अख्तियार कर रहा है.
सरकार के लिए पिछले विश्वास मत के दौरान संसद में लहराए गए नोट, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पिछले चुनाव के दौरान चला हवाई अभियान, डमी उम्मीदवार खड़ा करने पर खर्च किया गया पैसा, पार्टी कार्यालयों को दिया गया पैसा, टोयोटा एसयूवी में यात्राएं, जिसमें एक बार का खर्च ही 75 लाख रु. बैठता है, और देश भर में यात्रा के लिए नेताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले निजी चार्टर विमान रईसमिजाजी के ऐसे संकेतक हैं, जिनकी अनदेखी करना कठिन है.
बैंक अधिकारी और दलाल कॉर्पोरेट घोटालों के बारे में कोई बहुत दबी जबान में बात नहीं करते. कम-से-कम दो एअरलाइनों, कई अचल संपत्ति उद्यमों, फार्मास्युटिकल इकाइयों और इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की बेनामी मिल्कियत और उससे असल में लाभान्वित होने वाली शख्सियतों के बारे में भी अटकलें बहुत गरम हैं. स्लीपिंग पार्टनर (निष्क्रिय साझीदार) की कॉर्पोरेट जगत की अवधारणा को राजनीति की दुनिया में नई व्याख्या मिल गई है. जब तक असली आय, संपत्ति और नेताओं को मिलने वाले पैसे का स्त्रोत अपारदर्शी रहेगा, तब तक प्रशासन इसके दुष्परिणाम भुगतता रहेगा और विकास की बैलेंसशीट पर लोकतंत्र देनदारियों वाले खाते में ही रखा जाता रहेगा.
{mospagebreak}अमीरी में भी नेतृत्व
राहुल बजाज
निर्दलीय
राज्यसभाः महाराष्ट्र
कुल संपत्तिः190.6 करोड़ रु.
टी. सुब्बरामी रेड्डी
कांग्रेस
राज्यसभाः आंध्र प्रदेश
कुल संपत्तिः 239.6 करोड़ रु.
अनिल एच. लाड
कांग्रेस
राज्यसभाः कर्नाटक
कुल संपत्तिः175 करोड़ रु.
जया बच्चन
समाजवादी पार्टी
राज्यसभाः उत्तर प्रदेश
कुल संपत्तिः 214.3 करोड़ रु.
एम. कृष्णप्पा
कांग्रेस
विधायकः विजयनगर, कर्नाटक
कुल संपत्तिः136 करोड़ रु.
एमएएम रामस्वामी
जनता दल (एस)
राज्यसभाः कर्नाटक
कुल संपत्तिः 107.7 करोड़ रु.
आनंद सिंह
भाजपा
विधायकः विजयनगर, कर्नाटक
कुल संपत्तिः 239 करोड़ रु.
अनिल वी. सालगांवकर
निर्दलीय
विधायकः सानवोर्डेम, गोवा
कुल संपत्तिः 91.4 करोड़ रु.
एन. ए. हरीस
कांग्रेस
विधायकः शांतिनगर, कर्नाटक
कुल संपत्तिः 85.3 करोड़ रु.
महेंद्र मोहन
समाजवादी पार्टी
राज्यसभाः उत्तर प्रदेश
कुल संपत्तिः 85 करोड़ रु.