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Gujarat Assembly Election 2022: माणावदर सीट पर बीजेपी के लिए क्या आसान होगी जीत?

गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी मैदान में उतरने वाले सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से तैयारियों में जुटे हैं. हालांकि यह बात और है कि अभी तक गुजरात विधानसभा के चुनावों की तारीख का ऐलान नहीं हुआ है. जूनागढ़ जिले की माणावदर विधानसभा सीट भी कई मायनों में खास है.

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मानावदर विधानसभा सीट. मानावदर विधानसभा सीट.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रुई की फैक्ट्रियां खत्म होने की कगार पर पहुंचीं
  • पानी की समस्या लोगों के लिए है बड़ी मुसीबत

गुजरात में कुल 182 विधानसभा सीटें हैं. वहीं जूनागढ़ जिले में पांच विधानसभा क्षेत्र हैं. इन्हीं में से माणावदर विधानसभा सीट खास है. माणावदर सीट से जवाहर पैथलजी चावड़ा विधायक हैं. सबसे कम उम्र में जवाहर चावड़ा ने कांग्रेस से चुनाव लड़कर रतिभाई सुरेजा को साल 2002 में हराया था.

इसके बाद 2002, 2007, 2012 और 2014 में जीत हासिल की. साल 2017 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए और दूसरे ही दिन विजय रुपाणी सरकार में प्रवासन विभाग के कैबिनेट मंत्री बने थे. साल 2019 में हुए चुनाव में फिर से जीत हासिल की, पर गुजरात के नए कैबिनेट मंत्रिमंडल में जवाहर भाई को शामिल नहीं किया गया.

माणावदर का परिचय

गुजरात में पश्चिमी क्षेत्र में जूनागढ़ जिले से 35 किमी दूर स्थित माणावदर कभी नवाबों की नगरी था. कहा जाता है कि जूनागढ़ के नवाब के चचेरे भाई यहां रहते थे. जब देश आजाद हुआ, उससे पहले तक माणावदर पाकिस्तान के कब्जे में था, जिसको बाद में भारत से जोड़ा गया. यहां आज भी ऐतिहासिक इमारतें हैं.

माणावदर की सामाजिक स्थिति

मानावदर विधानसभा सीट.

माणावदर में एक समय तमाम रुई की फैक्ट्रियां थीं, लेकिन इस समय यह कारोबार दम तोड़ रहा है. यहां 150 से भी ज्यादा फैक्ट्रियां थीं, पर अब 2 भी मजबूरी से चल रही हैं. एक ओर मौसम की मार और दूसरी और टैक्स जैसे मुद्दे ने रुई की फैक्ट्रियों पर बोझ लाद दिया. रुई कपास के उत्पादन में भी मानावदर सबसे ऊपर था, पर अब पानी की किल्लत और सिंचाई की समस्या के चलते किसान अन्य फसलें का उत्पादन करने लगे हैं.

माणावदर की राजकीय स्थिति

माणावदर में किसानों की संख्या ज्यादा है. पाटीदार समुदाय यहां 40 प्रतिशत है, जबकि आहिर, मेर और दलित की संख्या मिलाकर बाकी के 40 प्रतिशत है. यहां सालों से बीजेपी से रतिभाई सुरेजा जीतते आ रहे थे. 1962 के चुनाव शुरू होने के बाद अब तक तीन साल बीजेपी और तीन साल कांग्रेस जीतती आई है. साल 2017 में कांग्रेस से जीतने के बाद जवाहर चावड़ा ने 2018 में बीजेपी में ज्वाइन कर ली, जिससे 2019 में फिर चुनाव हुए, जिसमें जवाहर चावड़ा जीत गए.

माणावदर की समस्याएं

माणावदर में मुख्य समस्या पानी की किल्लत है. मानावदर में चार दिन में एक बार पानी मिलता है. यहां बारिश सबसे ज्यादा होने के बावजूद पानी की किल्लत रहती है. लोगों का कहना है कि जवाहर चावड़ा जब तक कांग्रेस के विधायक थे, तब तक पानी की समस्या थी और वे इस समस्या को लेकर किसानों के पक्ष में लड़ रहे थे, लेकिन जब से बीजेपी में चले गए हैं, मुख्य समस्याओं को भूल गए. अब वे बांधों का पानी छोड़कर उन पर रिवर फ्रंट बनाने के लिए 25 करोड़ खर्च कर रहे हैं.

मानावदर विधानसभा सीट.

दूसरा रुई की फैक्ट्रियों का सवाल है तो सालों पहले यह कारोबार मानावदर की पहचान था. इस बिजनेस की ओर 1995 के बाद सरकार ने ध्यान नहीं दिया है। यहां हर साल भारी बारिश के सीजन में पूरा माणावदर और ज्यादातर गांव पानी मे डूब जाते हैं. किसानों की फसल बर्बाद होती हैं इस पर भी अभी तक किसी विधायक ने ध्यान नहीं दिया है.

विधायक का परिचय

जवाहर चावड़ा जूनागढ़ के उद्योगपति पैथलजी चावड़ा के बेटे हैं. पिता की तरह पक्के कांग्रेसी रहे, पर 2018 में रातोंरात बीजेपी में जुड़े और दूसरे ही दिन कैबिनेट मंत्री बने, जिसकी वजह से उनके साथी कार्यकर्ता काफी नाराज हुए.

माणावदर में 20 अगस्त 1964 को जन्मे जवाहर चावड़ा दसवीं तक पढ़े हैं. खेती और व्यापार मुख्य व्यवसाय है. पिता पैथलजी चावड़ा ने दूसरे दिवंगत पुत्र की स्मृति में खोली डॉक्टर सुभाष अकेडमी शिक्षण संस्थान चलाते हैं. हाल ही में इस संस्था को महाविद्यालय का दर्जा दिया गया है.

क्रिमिनल केसः जवाहर चावड़ा पर तीन क्रिमिनल केस हैं.

संपति: 103 करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति  2019 के एफिडेविड में दर्ज करवाई है. गुजरात के सबसे धनी विधायकों में जवाहर चावड़ा शामिल हैं.

जवाहर चावड़ा जब तक कांग्रेस में रहे, प्रजा के सेवक के रूप में लोगों के लिए आक्रामक रूप से लड़ते रहे, लेकिन बीजेपी में जुड़ते ही जैसे सबकुछ ठीक हो गया. रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट लाए, पर पानी की समस्या अब भी हल नहीं हुई. यह सवाल लोग पूछ रहे हैं. बीजेपी में जुड़ने से नाराज लोगों को मनाने का काम अब गांव गांव जाकर कर रहे हैं, लेकिन क्या इस बार जीत आसान होगी?

(भार्गवी जोशी के इनपुट के साथ)

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