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ऐसे तैयार होते हैं मार्कोस कमांडो, चौंका देगी ट्रेनिंग की कहानी

ऐसे तैयार होते हैं मार्कोस कमांडो, चौंका देगी ट्रेनिंग की कहानी
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जैसे भारतीय थल सेना में कई रेजिमेंट हैं, जिनसे नाम से दुश्मन कांपता है...वैसे ही भारतीय नौसेना में मार्कोस कंमाडो हैं जो अकेले दुश्मन के दांत खट्टे कर देते हैं. मार्कोस चाहे आतंकवाद से जंग लड़नी हो या फिर समुंदर की गहराई में कोई ऑपरेशन को अंजाम देना हो, यह अपनी विशेष ट्रेनिंग की वजह से दुश्मन के मंसूबों को नाकाम कर देते हैं.
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भारत की मार्कोस कमांडो सबसे कुशल कमांडो में मानी जाती है. सबसे कुशल बनने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है तब वो मार्कोस बनते हैं. ये हर तरह के ऑपरेशंस में काम करते हैं लेकिन समुंद्री ऑपरेशन में इन्हें महारथ हासिल होती है.
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बता दें कि मार्कोस का नाम पहले मरीन कमांडो फोर्स (एमसीएफ) हुआ करता था. मार्कोस को दुनिया की बेहतरीन यूएस नेवी सील्स की तर्ज पर विकसित किया जाता है. इन्हें 26/11 मुंबई हमले के ऑपरेशन में बुलाया गया था और इस दौरान यह सामने आए थे. इनकी यूनिफॉर्म के साथ भी खास तरह से डिजाइन की जाती है.
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ये दुनियाभर की स्पेशल फोर्स के साथ कई संयुक्त अभ्यास करते हैं. भारतीय नौसेना की इस स्पेशल यूनिट का गठन 1987 में किया था, समुद्री लुटेरों और आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए समुद्री ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए इनका गठन किया गया.
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हर कोई मार्कोस नहीं बन सकता इसके लिए स्पेशल लोगों का चयन किया जाता है. मार्कोस के सेलेक्शन के लिए मानदंड काफी मुश्किल होता है. अगर मार्कोस के लिए चुन भी लिए जाते हैं उन्हें कठोर ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है जो लगभग 2.5 से 3 साल तक चलती है. ज्यादातर 20 साल की उम्र वाले लोगों को इसके लिए चुना जाता है. हजारों में से कोई एक चुना जाता है.
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इनकी कठिन ट्रेनिंग का हिस्सा होता है 'डेथ क्रॉल' जिसमें जवान को जांघों तक भरी हुई कीचड़ में भागना होता है. इतना ही नहीं उनके कंधे पर 25 किलोग्राम का बैग भी होता है. इसके बाद 2.5 किलोमीटर का ऑबस्टेकल कोर्स होता है. मार्कोस नौसेना के स्पेशल मरीन कमांडोज हैं और किसी भी स्‍पेशल ऑपरेशन के लिए इन्हें बुलाया जाता है. ये समुद्री ऑपरेशंस में इतने माहिर होते हैं कि पानी के अंदर ही तैरते हुए विरोधी तटों तक पहुंच सकते हैं.
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इन्हें हर तरह के हथियार से ट्रेनिंग दी जाती है फिर चाहे वो चाकू हो, स्नाइपर राइफल हो, हैंडगन हों या सबमशीन गन हो. ये कमांडो हमेशा सार्वजनिक होने से बचते हैं. नौसेना के सीनियर अफसर का यह भी कहना है कि इनके परिवारवाले भी इस बात को नहीं जानते कि ये कमांडो हैं.
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इनके पास जो हथियार होते हैं वो दुनिया के सबसे बेहतर हथियारों में से होते हैं. बेहतरीन राइफल्स में से एक इजरायली TAR-21 है जो मार्कोस इस्तेमाल करते हैं. मार्कोंस की ट्रेनिंग के लिए HALO और HAHO जंप को क्वालिफाई करना पड़ता है.
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HALO (High Attitude Low Opening) में जमीन से 11 किलोमीटर ऊंचाई से कूदना होता है और पैराशूट जमीन के पास आकर खोलना होता है. जबकि HAHO (High Altitude High Opening) जंप में 8 किलोमीटर की ऊंचाई से कूदना होता है और कूदने के बाद 10 से 15 सेकंड के अंदर ही पैराशूट को खोलना होता है. HAHO जंप -40 डिग्री के जमा देने वाले तापमान पर होती है.
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मार्कोस की ज्यादातर ट्रेनिंग आईएनएस अभिमन्यू (INS Abhimanyu) में होती है, जो इनका आधार घर भी होता है. (फोटो साभार- रॉयटर्स)
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