आदित्य कुमार
शिक्षा का अलख जगाने के लिए लखनऊ के आदित्य कुमार साइकिल से बीते लगभग 20 वर्षो से गांव-गांव घूम-घूमकर वंचित तबके के बच्चों को पढ़ाते हैं. उनके माता-पिता को शिक्षा के महत्व से अवगत कराते हैं. वे कहते हैं, 'साइकिल मेरा घर और स्कूल है. अब तक मैं करीब पांच हजार गरीब, अनाथ व जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे चुका हूं. जब मैं सड़कों पर रहता था, तो एक शिक्षक ने मेरी जिंदगी बदल दी थी और स्नातक पूरी करने में मेरी मदद की. इसी ने मुझे ऐसा करने को प्रेरित किया'.
राजेश शर्मा
दिल्ली में मेटो ब्रिज के नीचे गरीब बच्चों को पढ़ाने वाले राजेश शर्मा एक जनरल स्टोर चलाते हैं. उनकी खास बात ये है कि वे रोज दो घंटे बच्चों को फ्री में पढ़ाते हैं. यही नहीं वे बच्चों को किताबें आदि भी देते हैं. उनके पास बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई जगह नहीं है इसलिए वो बच्चों को यहां शिक्षित करते हैं.
आनंद कुमार
आनंद कुमार बिहार में सुपर 30 कोचिंग चलाते हैं. हर साल उनके पढा़ए लगभग सभी बच्चेस IIT के लिए सेलेक्टब होते हैं. खास बात ये है कि आनंद कुमार गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं और उनसे फीस तक नहीं लेते. आनंद कुमार ऐसा 15 सालों से अधिक समय से कर रहे हैं. आनंद हर साल ऐसे बच्चोंऔ को चुनते हैं जो सुविधाओं से वंचित परिवारों से हैं. गरीबी रेखा से नीचे हों और मेधावी हों. आनंद ना केवल इन बच्चों को पढ़ाते हैं बल्कि वे इन्हेंा अपने घर पर रखते हैं और उनकी मां उनके लिए भोजन बनाती हैं.
गगनदीप सिंह
गगनदीप सिंह, राजस्थान के जैसलमेर में स्पेशल नीड वाले बच्चों को पढ़ाते हैं और उनके लिए एजुकेशनल प्रोग्राम्स चलाते हैं. गगन ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विजुअली हैंडीकैप्ड से ट्रेनिंग ली है.
अन्नपूर्णा मोहन
तमिलनाडु में एक ऐसी शिक्षिका हैं, जिन्होंने छात्रों की खातिर अपनी ज्वेलरी बेच दी. तमिलनाडू के सरकारी स्कूल पंचायत यूनियन प्राइमरी स्कूल कठमांडू में क्लास 3 के बच्चों को पढ़ाने वाली अन्नपूर्णा मोहन ने अपने छात्रों को वैश्विक स्तर की सुविधा देने के लिए अपने गहने तक बेच दिए.
फादर जूलियन
कंप्यूटर से जुड़ी शिक्षा देने के लिए ये अध्यापक वो सब करता है जो उसके बस में है. इनका नाम है फादर जूलियन, ये कर्नाटक के चित्रादुर्गा जिले में डॉन बॉस्को इंस्टीट्यूट चलाते हैं. उन्होंने एक खास तरह की बस में स्कूल चलाना शुरू किया है, इनके स्कूल को यहां 'स्कूल ऑन व्हील्स' कहा जाता है. वे साल 2012 से इस बस में 20-20 बच्चों के बैच को कम्प्यूटर की फ्री ट्रेनिंग देते हैं.
दिनेश कुमार
उज्जैन के लसुड़िया चुवड़ गांव में चार साल तक एक किराए के कमरे में बच्चों को पढ़ाने वाले दिनेश कुमार जैन ने आखिरकार अपने छात्रों की पढ़ाई के लिए एक छत की लड़ाई जीत ही ली. दरअसल, दिनेश कुमार जिस सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, उसकी छत टूटी थी, जिसकी मरम्मत के लिए दिनेश कुमार ने 12 बार एजुकेशन डिपार्टमेंट को खत लिखा. खत पर संज्ञान तो नहीं लिया गया, पर बिल्डिंग की खस्ता हालत को देखते हुए स्कूल सील कर दिया गया. वहां पढ़ने वाले सभी छात्रों की पढ़ाई खतरे में आ गई. दिनेश 6 साल तक नई बिल्डिंग की मांग करते रहे. उनकी मांग से परेशान होकर डिपार्टमेंट ने उनका तबादला कर दिया. हालांकि दिनेश ने अपनी जगह तो नहीं बदली, पर वो इसके लिए हाईकोर्ट पहुंच गए. तबादला रद्द हो गया. अब दिनेश एक किराए के घर में बच्चों को पढ़ाते हैं.