scorecardresearch
 

नीत्शे: वो विचारक जिसने कहा था 'ईश्वर मर चुका है' और 'दूसरों से जलना अच्छा है'

नीत्शे जिनके विचार देवत्व की स्थापना को खारिज करते हैं और मनुष्यता को सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ सोपान पर स्थापित करते हैं. नीत्शे मनुष्य को मानवतावादी आदर्शों का ही अनुसरण करने को कहते हैं. वह मानते हैं कि ईश्वरीय गुणों से आभूषित होने की चाह रखने की बजाय श्रेष्ठ मनुष्य बनना अधिक श्रेयस्कर और लोक कल्याणकारी है.

सुपर ह्युमन की अवधारणा को जन्म देने वाले दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (फाइल फोटो) सुपर ह्युमन की अवधारणा को जन्म देने वाले दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नीत्शे के दर्शन के केंद्र में ईश्वर नहीं मानव है
  • सुपरमैन की अवधारणा को जन्म देकर आशा का संचार किया
  • 'ईश्वर मर चुका है' के उद्घोष से दर्शन की दुनिया में हलचल

डाह, ईर्ष्या...जलन या फिर Envy क्या है? इसका मनोविज्ञान क्या है? क्या ये नकारात्मक संवेग है? या इसका पोषण सुखद परिणाम भी दे सकता है? इन्हीं सवालों को परिभाषित किया है ईश्वर की मौत की उद्घोषणा करने वाले और सुपर मैन या अति मानव (ubermensch) की कल्पना करने वाले जर्मनी के दार्शनिक (German philosopher) फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) ने. 

नीत्शे जिनके विचार देवत्व की स्थापना को खारिज करते हैं और मनुष्यता को सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ सोपान पर स्थापित करते हैं. नीत्शे मनुष्य को मानवतावादी आदर्शों का ही अनुसरण करने को कहते हैं. वह मानते हैं कि ईश्वरीय गुणों से आभूषित होने की चाह रखने की बजाय श्रेष्ठ मनुष्य बनना अधिक श्रेयस्कर और लोक कल्याणकारी है.

रोजाना की जिंदगी की बात करें तो ईर्ष्या एक भावनात्मक संवेग है. जो तब पैदा होती है जब एक व्यक्ति के पास दूसरे की श्रेष्ठता, उपलब्धि या अधिकार का अभाव होता है. और वह सोचता है कि ये कामयाबी उसे कैसे हासिल हुई? वह चिढ़ता है. यही भावना ईर्ष्या (Envy) है. 

अब समझ लीजिए आप एक आई फोन खरीदते हैं, महंगी चमचमाती कार के मालिक बन जाते हैं और अपने दोस्तों को दिखाते हैं. यह मोबाइल, ये कार आपके दोस्तों के बीच ईर्ष्या की वजह बन सकती है. लेकिन ये एक सहज भावना है. 

Envy को स्वीकार (Own) करो

नीत्शे अपनी कल्पनाओं के मनुष्य से बड़ी साफगोई से कहते हैं कि इस Envy को स्वीकार (Own) करना सीखो. यह एक सहज मानवीय आवेग है. अपनी किताब  On The Genealogy of Morality में नीत्शे कहते हैं कि ईर्ष्या को लेकर हमारे अंदर अपराध बोध की भावना भर दी जाती है. दरअसल नीत्शे जिस तत्कालीन क्रिश्चयन समाज की आलोचना कर रहे थे वहां ईर्ष्या एक नकारात्मक भावना थी. लेकिन नीत्शे इसे स्वीकार करने को कहते हैं. उन्होंने कहा कि अगर आपके अंदर किसी को लेकर डाह-जलन की भावना पैदा होती है, तो इसे हम दुनिया से तो छिपाते ही हैं खुद से भी छिपाते हैं. 

मैकियावेली: यूरोप का वो 'चाणक्य', जिसने कहा- शासकों का 'कुटिल' होना अच्छा है! 

क्यों पैदा होती है जलन की भावना?

नीत्शे का मानना है कि किसी व्यक्ति के अंदर ईर्ष्या की भावना पैदा न हो ये तार्किक रूप से संभव नहीं है, वो भी तब जब हम आधुनिक विश्व (फ्रांसीसी क्रांति के बाद का वक्त) में रहते हैं. वे कहते हैं कि जनतंत्र और सामंतवादी व्यवस्था के खात्मे ने महात्वाकांक्षाओं के द्वार खोल दिए हैं. अब सभी को ये सोचने-समझने का अधिकार है कि उसकी हैसियत दूसरों के बराबर है. 

लेकिन जरा सामंतकालीन व्यवस्था को याद करें, क्या तब एक कृषक दास (कम्मियां) को राजकुमार से ईर्ष्या करने की जरूरत महसूस हुई होगी. लेकिन आज सब कोई सब से अपनी तुलना करता है और वह अभाव और महात्वाकांक्षा के दीवार से टकराता है. 

ईर्ष्या गलत नहीं है, ये आपकी वास्तविक क्षमता की ओर इशारा है

नीत्शे की दार्शनिक व्याख्या कहती है कि डाह पैदा होना गलत नहीं है. अहम यह है कि हम इस उद्वेग को संभालते कैसे हैं? अगर कोई ईर्ष्या से गुजरने के उस दौर को थाम लेता है तो फिर उसके उत्कर्ष के रास्ते खुल जाते हैं.

वो कहते हैं कि वो हर चीज जो हमें ईर्ष्यालु बनाती है वो हमारी वास्तविक क्षमता का यानी कि हम क्या बन सकते हैं उसकी ओर इशारा करती है. 

ऐसा नहीं है कि नीत्शे ये मानते थे कि हमें हर वो चीज मिल जाती है, जिस की चाह हमें होती है. (उनके जीवन के उठापटक ने उन्हें यह काफी अच्छी तरह से सिखाया था).  उन्होंने केवल इस बात पर जोर दिया कि हमें अपनी वास्तविक क्षमता (हम क्या बन सकते हैं) के प्रति सजग और सचेत होना चाहिए, और इस क्षमता को हासिल करने के लिए वीरोचित प्रयास करना चाहिए, और उसके बाद ही सम्मानजनक ईमानदारी के साथ असफलता का शोक मनाना चाहिए. 

5 साल में पिता का निधन, 24 साल में बने प्रोफेसर

फ्रेडरिक नीत्शे द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से 100 साल पहले उस जर्मनी में पैदा हुए थे जो अविभाजित और बिखरा हुआ था. उनका जन्म 1844 में जर्मन राज्य सैक्सनी के रोकेन शहर में हुआ था. उनके पिता पादरी थे . जब नीत्शे पांच साल के हुए तो पिता की मृत्यु हो गई. माता और बहन के साये में पालन पोषण हुआ. विद्यार्थी के रूप में नीत्शे ब्रिलिएंट रहे. ग्रीक भाषा पर उनका असाधारण अधिकार था. अपनी मेधा के दम पर वह मात्र 24 साल की उम्र में बेस्ल विश्वविद्यालय में भाषा-विज्ञान के प्रोफेसर बन गए.  

रूसो: वो विचारक जिसने दुनिया को बताया कि गरीबी कर्मों का फल नहीं! 

लेकिन मानव की अनंत क्षमताओं के इस अन्वेषक को क्लास रूम के लेक्चर कहां अच्छे लगने वाले थे. कुछ सालों बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और लगे भटकने स्विटजरलैंड और इटली में. यहां एकाकीपन में जीवन गुजरा. यही वो वक्त था जब उन्होंने  Human, All too Human, The gay science, Thus Spoke Zarathustra, Beyond Good and Evil, On the Genealogy of Morality, The antI christ जैसे किताबों की रचना की. 

बचपन का धार्मिक नीत्शे तर्क शक्ति के विकास के साथ ही बागी हो गया

पादरी के परिवार में जन्म लेने की वजह से बचपन और लड़कपन का नीत्शे अंत:करण से धार्मिक था. बाइबिल को पढ़कर वह भाव विभोर हो उठता और परमेश्वर की कल्पनाओं में खो जाता. लेकिन ज्यों ज्यों जवानी आई मस्तिष्क में तर्क शक्ति का अंकुरण होने लगा. फिर तो धार्मिक नीत्शे बागी हो गया. धीरे-धीरे क्रिश्चयन मान्यताओं से उनका मन उचट गया. 

नीत्शे की मान्यता है कि क्रिश्चयनिटी रोमन साम्राज्य के दौरान उन दब्बू लोगों के मन में हुआ जो अपनी दमित इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थ थे. इसलिए रोमन काल के दासों ने कायरता को ही नैतिक सदगुण का रूप दे दिया. 

नीत्शे अपनी प्रेमिका लायो सैलोमी के साथ (सबसे पीछे)- फोटो- विकीपीडिया

नीत्शे कहते हैं कि यही वजह रही कि क्रिश्चन वैल्यू सिस्टम में सेक्सहीनता की अवस्था को चारित्रिक शुद्धता का नाम दे दिया गया. बदला न ले पाने की शक्ति को क्षमा का नाम दे दिया गया और जिससे लोग नफरत करते थे उसकी अधीनता को आज्ञाकारिता का नाम दे दिया गया. 

नीत्शे के दर्शन के अनुसार ईसाइयत ने निष्क्रियता का एक आवरण खड़ा किया और जीवन की सारी संभावनाओं को सोख लिया. नीत्शे का एक प्रसिद्ध कथन है, 'दो महान नशीले यूरोपीय पदार्थ हैं, शराब और ईसाई धर्म."

कभी शादी नहीं की, गर्लफ्रेंड से तीन बार तिरस्कार की ग्लानि

जो नीत्शे ईर्ष्या को स्वीकार करने की सीख देते हैं उन्होंने जीवन में खूब तिरस्कार झेला. गर्लफ्रेंड ने तीन बार रिजेक्ट कर दिया, सेक्स को लेकर कुंठित रहे, माता को पसंद नहीं करते थे, बहन से बनती नहीं थी. जीवन के इन झंझावातों से होकर जो किरदार गुजरा वो नीत्शे कहलाया. 

अल्बर्ट आइंस्टाइन: बीसवीं सदी का सबसे विद्वान आदमी

नीत्शे जीवन भर अविवाहित रहे. जिस प्रेमिका लायो सैलोमी को उन्होंने चाहा उन्हें एक के बाद एक तीन बार अपना प्रेम प्रस्ताव दिया, लेकिन हर बार उन्हें अस्वीकृति मिली. अचरज यह है कि बावजूद इसके वे लंबे समय तक उनके साथ रहे. लायो सैलोमी एक मनोविश्लेषक थीं. एक मनोविश्लेषक और विचारक के बीच सेक्स, धर्म, जीवन को लेकर गहरे मतभेद रहे.

कौन है नीत्शे का सुपरमानव?

1883 में लिखे अपने किताब Thus Spoke Zarathustra में नीत्शे ने अतिमानव, सुपरमैन या Ubermensch की चर्चा की है. नीत्शे का मानना है कि मानव का विकास (Evolution) अंतिम चरण में नहीं पहुंच गया है. इसका क्रम जारी है और इसी क्रम में वह सुपरमैन की चर्चा करते हैं. नीत्शे का सुपरमैन अपनी नैतिकताओं का दायरा खुद तय किया होगा. उसकी इच्छा शक्ति मजबूत होगी. वह नए मूल्यों को खुद बनाएगा. वह मृत्यु, ईश्वर की समस्याओं का समाधान लेकर आएगा. नीत्शे कहते हैं कि अतिमानव सामान्य मानव के आचार संहिता का पालन नहीं करेगा क्योंकि ये जड़ है. 

नीत्शे की रचना

हालांकि सुपरमैन की स्थापना में मनुष्य के निगेटिव शेड्स को भी मान्यता देते हैं. उनके अनुसार ये अतिमानव अपना रास्ता खुद बनाएगा, वह रणनीतिक रूप से स्वार्थी भी हो सकता है, वह मानवता को परिष्कृत करेगा और विकास के अगले क्रम में ले जाएगा. वह कष्ट को अच्छी चीजों की प्राप्ति के लिए अनिवार्य मानेगा. 

महामानव एक ऐसा मनुष्य होगा, जो अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए तैयार रहेगा. हो सकता है समाज में उसे समझने वाले कम हो इसलिए उसे अकेलेपन से भी जूझना पड़ेगा. नीत्शे का लक्ष्य था कि एक प्रजाति के रूप में मानव का लक्ष्य सुपरमैन को जन्म देना है. 

कहा जाता है कि नीत्शे की इस सुपरमैन अवधारणा का इस्तेमाल हिटलर ने अपने फायदे के लिए किया. उसने फासीवाद के प्रचार प्रसार के लिए वैचारिक आधार के रूप में इसे अपनाया.

'ईश्वर मर चुका है' का कोलाहल

नीत्शे ने जब कहा कि ईश्वर मर चुका है तो पश्चिम प्रज्ञा में हलचल मच गई. जिस चर्च और क्रिश्चयन अस्तित्त्व का ही सबसे बड़ा आधार ईश्वर था, नीत्शे ने उसे ही चुनौती दे दी थी.  

हालांकि नीत्शे का ये कथन प्रतीकात्मक ज्यादा है. इसे यूरोप के ज्ञानोदय काल (Enlightenment of Europe) से जोड़कर देखा जा सकता है. जब मनुष्य ज्ञान, विज्ञान, तर्क और कला के दम पर अपना मुक्तिदाता स्वयं बन रहा था.

ईसाइयत के बारे में आलोचनात्मक विचार रखने के बावजूद नीत्शे एक विश्वास प्रथा को कायम रखने के पक्ष में थे. नीत्शे ने भविष्यवाणी की थी कि धर्म को त्यागने का अर्थ यह होगा कि मनुष्य को मार्गदर्शन, सांत्वना, नैतिक विचारों और आध्यात्मिक महत्वाकांक्षा के लिए नए रास्तों और माध्यमों की तलाश करनी होगी. इसलिए वे एक सुधारों के साथ एक फेथ सिस्टम को बरकरार रखने के पक्ष में थे. 

नीत्शे मानते थे कि धर्म के लोप से जो स्थान बनेगा, आदर्श स्थिति तो यह होगी कि उसे संस्कृति यानी कि दर्शन, कला, संगीत और साहित्य से भरा जाए. लेकिन उन्हें समकालीन यूरोप की जीवन पद्धति को लेकर क्षोभ था. 

नीत्शे मानव के स्वछंद और सहज विकास की पैरवी करते हुए इस हद तक चले जाते हैं कि वह विश्वविद्यालयों पर दोषारोपण करने लगते हैं और कहते हैं ये संस्थाएं मानवता को खत्म कर रही है और लोगों को नीरस शैक्षणिक गतिविधियां के जाल में फंसा रही है. नीत्शे के अध्ययन के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ मानव है. वह मानते थे कि मानव-व्यक्तित्व का विकास ही मनुष्य की संपूर्ण क्षमताओं को प्रकट करेगा. 

कोचवान द्वारा घोड़े की पिटाई का वो क्षण...

दुनिया के इतने स्थापित विचारों को चुनौती देने वाले नीत्शे के अंदर एक कोमल मन बसता था. इसकी अभिव्यक्ति उस घटना से होती है जिसके बाद 10 सालों तक नीत्शे पक्षाघात के शिकार रहे और जीवन में कभी उबर नहीं पाए. 

यह 1889 का वर्ष था, तारीख थी 3 जनवरी. इटली के तूरीन शहर में कार्लो अल्बर्टो नाम की गली में नीत्शे शहर के केंद्र की ओर जा रहे थे. नीत्शे ने देखा कि एक कोचवान अपने घोड़े पर चाबुक दर चाबुक बरसा रहा था. घोड़ा आगे बढ़ नहीं रहा था और कोचवान के हाथ रुक नहीं रहे थे. हठात् नीत्शे आगे बढ़े और घोड़े के गले से लिपट गये और लगे जोर-जोर से रोने. इसके बाद नीत्शे वहीं गिर पड़े. ये ऐसा मानसिक आघात था जिससे नीत्शे कभी उबर नहीं पाए. 

अगले 10 सालों तक उनकी ऐसी ही स्थिति बनी रही. वे पक्षाघात के शिकार हो चुके थे. आखिरकार 25 अगस्त 1900 को मात्र 56 साल की आयु में वह दुनिया छोड़ गए. 

श्रेष्ठ मानव ही मनुष्यता की सबसे बड़ी आशा

नीत्शे का मानना था कि हर कालखंड दर्शन और अपने वजूद के सवालों से दो चार होता है. इनके जवाब मनुष्य को भविष्य का रास्ता दिखा जाते हैं. नीत्शे ने  पुनर्जागरण के बाद पैदा हुए सामूहिक लोकतंत्र और ईश्वर के अस्तित्व पर उठे सवाल को पहचाना. इस पर मंथन किया. उन्होंने मानव जाति को कुछ अहम समाधान सुझाए, जिसका मूल यह है कि श्रेष्ठ और संपूर्ण मनुष्य ही अब मानव की सबसे बड़ी उम्मीद है. इसे ही उन्होंने अपने दर्शन में अतिमानव या सुपरमैन कहकर पुकारा है.

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें