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रूसो: वो विचारक जिसने दुनिया को बताया कि गरीबी कर्मों का फल नहीं!

फ्रांस की जनता को अपनी दुर्दशा का भान तो था पर इसे वो ईश्वरीय न्याय या फिर हमारे अपने शब्दों में कहें तो भाग्य का फेर मानकर चुप बैठा हुआ था. चर्च भी उसे कुछ ऐसा ही सिखाता था. लेकिन रूसो ने अपनी रचनाओं से इस धारणा को झिंझोड़ कर रखा दिया.

फ्रांस की क्रांति के लिए जमीन तैयार करने वाले विचारक रूसो फ्रांस की क्रांति के लिए जमीन तैयार करने वाले विचारक रूसो
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रूसो ने बताया, गरीबी ईश्वरीय न्याय नहीं है
  • मनुष्य में निहित संप्रभुता सर्वोपरि
  • धर्म के वितंडे को झकझोरने वाले रूसो
  • फ्रांसीसी क्रांति के लिए तैयार की जमीन

18वीं सदी का मध्यकाल था. यूरोप में धर्म का वितंडा अपने प्रचंड रूप में विद्यमान था. चर्च और पोप के शब्द ही कानून थे. उसे राज्य सत्ता का वरदहस्त हासिल था. फ्रांस का कुलीन वर्ग अपने एश्वर्य में डूबा हुआ क्रांति के सपने देख रहे राजनीतिक चिंतकों की सोच का उपहास उड़ाता. फ्रेंच नोबेलिटी को लगता था कि यथास्थिति बदल ही नहीं सकती है. ब्रेड और सस्ती शराब की जुगाड़ में जुटा एक आम फ्रांसीसी दैवतुल्य राजा के खिलाफ बागी हो जाएगा. इसका अंदाजा उसे नहीं था. 

लेकिन बदलाव तो शुरू हो चुका था. फ्रांस में बौद्धिक नवजागरण की हवा चलने लगी थी. लोगों में अकुलाहट थी. इसी सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में पेरिस में अवतरण हुआ रूसो का. पूरा नाम था ज्यां जाक रूसो.

रूसो का जन्म जिनेवा में हुआ था, लेकिन बौद्धिक स्पंदन की चिंगारी उन्हें फ्रांस में मिली. फ्रांस का तत्कालीन समाज, बहुसंख्यकों की गरीबी और कुलीनों की विलासिता ने रूसो के मन में मंथन पैदा कर दिया. 

एक निबंध से इंटेलेक्चुअल बन गए रूसो

रूसो जब युवा थे तो फ्रांस में कला, विज्ञान आधुनिकता पर खूब बहस हो रही थी. रूसो को एक निबंध प्रतियोगिता की जानकारी मिली. इस प्रतियोगिता का विषय था 'विज्ञान और कला का विकास सामाजिक शुचिता को निखारती है अथवा नैतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है?' 

इस प्रतियोगिता ने अप्रत्याशित रूप से रूसो को पहली बार यूरोप के बौद्धिकों में स्थापित कर दिया. इस निबंध में रूसो ने कहा कि सभ्यताएं और विकास ने मानव की स्थिति में सुधार नहीं किया है. रूसो ने तर्क देते हुए कहा कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के विकास ने उस मनुष्य का नैतिक पतन किया है जो कभी खुश था और संतुष्ट जीवन जीता था. 

बाद में रूसो की ये विचारधारा उनके दर्शन का मूल चरित्र बन गई. यूरोप के प्रगतिवादियों ने रूसो की तीखी आलोचना की, लेकिन अपने तर्कों के दम पर रूसो इस बौद्धिक सर्किल में पहली बार घुसपैठ कर चुके थे.   

गरीबी ईश्वरीय न्याय नहीं है

फ्रांस की जनता को अपनी दुर्दशा का भान तो था पर इसे वो ईश्वरीय न्याय या फिर हमारे अपने शब्दों में कहें तो भाग्य का फेर मानकर चुप बैठा हुआ था. चर्च भी उसे कुछ ऐसा ही सिखाता था. 

लेकिन रूसो ने अपनी रचनाओं से इस धारणा को झिंझोड़ कर रखा दिया. उन्होंने ब्रेड की चिंता में जकड़े नागरिकों के मन में अधिकारों और हक के लिए स्फूरण पैदा किया. उन्होंने गरीबों को बताया कि उन्हें अपने हाल में शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है. ये भेद कृत्रिम है और इसे राज और धर्म सत्ता ने अपने फायदे के लिए बनाया है. स्टेट इस यथास्थिति को बरकार रखने के लिए धार्मिक नैतिकता और कई दूसरे वितंडे का सहारा लेता है. उन्होंने युवा-युवतियों के दिलों में बदलाव की आग जलाई और कहा कि या तो इस स्थिति को बदल देना है या फिर इस कोशिश में न्योछावर हो जाना है. अपनी पुस्तक Discourse on Inequality में उन्होंने इस पर विस्तार से चिंतन किया है. 

प्रजातंत्र, स्वतंत्रता और समानता के पैरवीकार

इस प्रक्रिया में रूसो प्रजातंत्र, स्वतंत्रता और समानता के पैरवीकार बन जाते हैं. उन्होंने राज्य के दैवीय सिद्धांत को चुनौती दी, जो कहता है कि राज्य ईश्वर द्वारा स्थापित संस्था है, और राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है, इसलिए वह सिर्फ ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, राजाज्ञा का पालन हर नागरिक का धार्मिक कर्तव्य है. इस सिद्धांत में राजसत्ता पैतृक है, अर्थात पिता के बाद पुत्र सत्ता का अधिकारी होता है.  

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सोशल कान्ट्रैक्ट में दैवीय सिद्धांत की खिल्ली

साल 1762 में रूसो की युगांतकारी रचना The Social Contract (सामाजिक समझौता) छपी. इस किताब में रूसो ने मनुष्य में निहित संप्रभुता को सर्वोपरि माना. सोशल कान्ट्रैक्ट के माध्यम से रूसों ने कहा कि राजा का पद कोई दैवीय वस्तु नहीं है. 

रूसो कहते हैं कि जनता ने कभी राज्य को अपना अधिकार सरेंडर किया ताकि राजा जनता को शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने में सहायता कर सके. पर यदि शासक अपने अधिकारों का दुरूपयोग करता है तो जनता को अधिकार है कि वह ऐसे निरंकुश राजा के विरूद्ध विद्रोह करे. 

रूसो ने मानव के अधिकारों की घोषणा की और स्वतंत्रता और समानता को मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार बताया. उन्होंने कहा कि इन अधिकारों की प्राप्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही मुमकिन है. हालांकि रूसो अपनी किताब में Representative democracy की बजाय  Direct democracy की चर्चा करते हैं. प्रत्यक्ष लोकतंत्र शासन की वो पद्धति है जहां नीति निर्माण में जनता की प्रत्यक्ष रूप से भागीदार होती है. 

मनुष्य को सामाजिक समझौता करने की जरूरत क्यों पड़ी?

रूसो ने इस किताब में बहुत खूबसूरती से बताया है कि मनुष्य को सामाजिक समझौता करने की जरूरत क्यों पड़ी. पहले तो रूसो ये मानते हैं कि आदिम मनुष्य का स्वभाव निछोह और निष्पाप है. वह स्वभाविक रूप से निर्दोष है. रूसो के मुताबिक मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र और पशुतुल्य था. रूसो प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य के लिए Noble savage (भद्र वनवासी) शब्द का प्रयोग करते हैं. इस दौर का मनुष्य अपने आप में संतुष्ट था और वो उसकी इच्छा किसी का अहित करने की नहीं था. इस समय वह एक अज्ञानी होकर सुखी जीवन गुजारता था. उसकी जिंदगी में क्लेष न थे.

इस स्थिति में बदलाव तब आया जब कृषि का आविष्कार हुआ. सीमित जमीन पर मालिकाना हक जमाने की होड़ शुरू हुई. मनुष्य ज्यादा से ज्यादा भूमि पर अधिकार जताने लगा. इसके मनुष्य के शांतिमय जीवन में बड़ी भारी बाधा आई. 

मनुष्य जन्मा स्वतंत्र जरूर है, लेकिन हर जगह  बेड़ियों में कैद है

दरअसल रूसो 'सोशल कान्ट्रैक्ट' के शुरुआत में ही लिखते हैं, "मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, किंतु वह सर्वत्र जंजीरों से जकड़ा हुआ है." 

रूसो दरअसल कहना चाहते हैं कि मनुष्य स्वभावत: अच्छा है लेकिन समाज का निर्माण और वहां से पैदा हुई संपत्ति और प्रभुत्व की इच्छा ही मानवीय अच्छाई में बाधक बनती है." मानव के अज्ञानता और बर्बरता से सभ्यता और समृद्धि के सफर में रूसो की ये पंक्तियां मनुष्य के लिए हमेशा प्रकाश साबित हुई हैं. 

समाज की स्थापना के लिए संपत्ति उत्तरदायी

रूसो समाज की स्थापना के लिए बड़ी रोचक प्रक्रिया बताते हैं. रूसो लिखते, "वह पहला व्यक्ति नागरिक समाज का वास्तविक जन्मदाता और निर्माता था जिसने एक भू-भाग को घेरकर ऐलान किया कि 'यह मेरी जमीन है' और उसे अपने इस कथन पर विश्वास करने वाले सरल व्यक्ति मिल गए."

जमीन पर आधिपत्य और उत्तरोत्तर महात्वाकांक्षा में वृद्धि की इसी प्रक्रिया में मनुष्य का प्राकृतिक दशा का आदर्श रूप नष्ट हो गया और संघर्ष पैदा होने लगे. इस वातावरण का अंत करने के लिए व्यक्तियों ने पारस्परिक समझौते द्वारा समाज की स्थापना का निर्णय किया.

इसी प्रक्रिया में रूसो ने लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. जिसका अर्थ है कि अंतिम शक्ति जनता में निहित है. शासक वर्ग शासन का संचालन जनहित के लिए करेगा न कि अपने स्वार्थों के लिए, इसके अलावा इसके राज करने का अधिकार तबतक है जब तक उसे जनता का भरोसा हासिल है. राज्य की संप्रभुता के लिए उन्होंने 'सामान्य 'इच्छा' शब्द का प्रयोग किया. रूसो 'सामान्य इच्छा पर आधारित एक ऐसे समाज के निर्माण की कल्पना करते हैं, जो स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व पर आधारित हो.

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रूसो की पुस्तक द सोशल कॉन्ट्रैक्ट को तत्कालीन यूरोपीय समाज में जबर्दस्त प्रसिद्धि मिली. किताब की प्रतियां धड़ाधड़ बिकने लगी. किताब के अर्थ और संदेश ने फ्रांसीसी समाज में खलबली मचा दी. इस किताब से पहले ही रूसो अपने विचारों के लिए सरकार की आंखों में खटकने लगे थे. इस किताब के आते ही फ्रांस और जिनेवा की सरकार ने इस किताब पर रोक लगा दी. 

सोशल कॉन्ट्रैक्ट के आने के 27 साल बाद ही हुई फ्रांस की क्रांति

फ्रांस का राजनीतिक तापमान चढ़ने लगा. लुई वंश की राजशाही और तानाशाही के खिलाफ लोग मुखर होने लगे. फ्रांस में क्रांति की आंच सुलगती रही. ये पुस्तक 1762 ईस्वी में आई थी, इसके 27 साल बाद 1789 में फ्रांस की क्रांति हुई और दुनिया का राजनीतिक-सामाजिक स्वरूप हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया. इस क्रांति के साथ ही शासन की लोकतांत्रिक अवधारणा का जन्म हुआ. स्वतंत्रता, समानता और बधुंत्व को इस शासन का आधार बनाया गया.     

फ्रांस की क्रांति पर रूसो के प्रभाव का अंदाजा नेपोलियन बोनापार्ट के एक कथन लगाया जा सकता है कि जिन्होंने कहा था कि यदि रूसो न हुआ होता, तो फ्रांस की क्रांति भी नहीं हुई होती. 

9 दिन में मां चल बसी, 10 साल में पिता

रूसो के दर्शन के निखरने में उनके बचपन का बिखरना शामिल है. रूसो 28 जून 1712 को जेनेवा में पैदा हुए थे, जब 9 दिन के ही थे तब मां चल बसी. रूसो ने आगे चलकर इसे अपना पहला दुर्भाग्य कहा. पिता मामूली घड़ीसाज थे. बालक रूसो का पालन-पोषण मामा-मामी ने किया. रूसो जब 10 साल के हुए तो पिता भी उनको छोड़कर चले गए. 

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माता-पिता के स्नेह लाड से वंचित किशोर रूसो अस्थिर प्रकृति के बन गए. अस्थिरता और आवेग उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया. इस बीच रूसो जिनेवा से फ्रांस आ गए. यहां पर वे अपने आयु में 12 वर्ष बडी लुइस दि वार्न नाम की महिला के संपर्क में आए और दोनों प्रेम के बंधन में बंध गए. इस वक्त रूसो की आयु 17 साल थी.

जीवन में स्थिरता आते ही रूसो धर्म की ओर आकर्षित हुए, वे कैथोलिक रीति-रिवाज को मानने लगे. इस महिला के साथ रूसो का संबंध उतार-चढ़ाव भर रहा. 1744 में रूसो थेरेसा लेवाशियर नाम की एक दूसरी महिला के संपर्क में आए. 
इस रिश्ते से दोनों के पांच बच्चे हुए. 

पांचों बच्चों को अनाथालय भेजा

यहां रूसो की जिंदगी का एक विचित्र पहलू सामने आया. जो रूसो एमिली नाम की अपने पुस्तक बच्चे का सहज पालन पोषण और बाल अधिकारों की पैरवी करते हैं उन्होंने अपने खुद के पांच बच्चों को पालन-पोषण के लिए चर्च के अनाथालय भेज दिया. रूसो के विरोधियों जैसे वाल्तेयर ने इस काम के लिए जीवन भर उनकी आलोचना की.

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