Sea Drone अटैक... ईरान के जहाजों और ठिकानों पर अमेरिकी हमले, VIDEO

ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर हवाई हमले शुरू हो चुके हैं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है. इस बीच, यूएस सेंट्रल कमांड ने ईरान पर किए गए हमले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है.

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यूएस सेंट्रल कमांड ने बताया, यह पहली बार है जब अमेरिकी सेना ने कॉम्बैट ऑपरेशन में समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल किया है. (Photo:X/@CENTCOM) यूएस सेंट्रल कमांड ने बताया, यह पहली बार है जब अमेरिकी सेना ने कॉम्बैट ऑपरेशन में समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल किया है. (Photo:X/@CENTCOM)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:50 PM IST

अमेरिका और ईरान के बीच जंग एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है. सोमवार को दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर नए सिरे से मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे तनाव और बढ़ गया है. हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और संघर्ष के और गहराने की आशंका जताई जा रही है.

इस बीच यूएस सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो जारी करते हुए बताया कि कल CENTCOM की सेनाओं ने कई 'वन-वे अटैक सरफेस ड्रोन' का इस्तेमाल करके ईरान में सबमरीन और जहाज के मेंटेनेंस फैसिलिटी पर हमला किया. तीन कोर्सेर अनमैन्ड सरफेस वेसल्स ने बंदर अब्बास नेवल बेस के पोर्ट पर हमला किया.

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यूएस सेंट्रल कमांड ने आगे बताया कि यह पहली बार है जब अमेरिकी सेना ने कॉम्बैट ऑपरेशन में समुद्री ड्रोन (Sea Drone) का इस्तेमाल किया है. इन हमलों से ईरान की कमर्शियल शिपिंग पर लगातार हमले करने की क्षमता कम हो गई है.

वहीं, ईरान का कहना है कि उसने रणनीतिक रूप से अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को एक बार फिर बंद कर दिया है, जबकि अमेरिका का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग कमर्शियल शिपिंग के लिए खुला है.

ताजा हमले कतर, कुवैत, ओमान, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन तक पहुंच गए हैं, जिससे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ गई है. वाशिंगटन ने होर्मुज के आसपास ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हमले किए हैं, जबकि तेहरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है और अहम शिपिंग रूट की रक्षा करने का संकल्प लिया है.

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फिर से शुरू हुई इस लड़ाई ने पिछले महीने हुए अमेरिका-ईरान के अंतरिम समझौते पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया है. इस समझौते का मकसद होर्मुज को फिर से खोलना और 60 दिनों की बातचीत के बाद एक व्यापक शांति समझौते का रास्ता बनाना था.

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