ईरान को बायपास कर UAE-ओमान बना सकते हैं नया होर्मुज स्ट्रेट, तेल का खेल ही पलट जाएगा!

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का असलियत में 11 किलोमीटर चौड़ा जलमार्ग ही कई देशों के लिए ईंधन सप्लाई का सबसे अहम मार्ग है. भू-राजनीतिक तनाव की वजह से जब जब ईरान नाराज होता है ये रास्ता बंद हो जाता है. इस रास्ते के एक और UAE है तो दूसरी ओर ओमान और नुकीले छोर पर है ईरान. आखिर UAE और ओमान इसका विकल्प क्यों नहीं तैयार करते.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बायपास कर नहर बनाने की संभावना को दिखाती एक तस्वीर. (Photo: ITG) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बायपास कर नहर बनाने की संभावना को दिखाती एक तस्वीर. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 10 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:20 PM IST

फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' एशिया के कई देशों के लिए रणनीतिक और सामरिक रूप से सबसे अहम जलमार्ग है. दुनिया का लगभग पांचवें हिस्से का कच्चा तेल इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है और अलग अलग देशों तक पहुंचता है. फिर इस तेल की रिफाइनिंग होती है. उसके बाद ये तेल हमारे आपके कारों, बाइक में पहुंचता है और इसका दूसरा इस्तेमाल होता है. 

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Strait of Hormuz को दुनिया का सबसे अहम समुद्री चोक-पॉइंट माना जाता है. दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल इसी संकरे जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. ऐसे में जब भी इस इलाके में तनाव बढ़ता है. खासतौर पर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तब यह सवाल उठने लगता है कि आखिर संयुक्त अरब अमीरात और ओमान मिलकर ऐसा कोई नया समुद्री रास्ता क्यों नहीं बना लेते जो होर्मुज' को बायपास कर दे. 
जब जब होर्मुज' का संकट पैदा होता है. इस सवाल पर चर्चा होती है. 

आप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की तस्वीर देखिए. इस तस्वीर को देखने से पता चलता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है. ये स्ट्रेट यानी कि पतला सा जलमार्ग अभी लगभग बंद है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की पश्चिमी दिशा में UAE है और पूर्वी ओर ओमान है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का जो नुकीला हिस्सा है उस पर ओमान का मालिकाना हक है. अगर एक सामान्य व्यक्ति देखे तो उसे लग सकता है कि दोनों छोरों को काटकर बीच में एक नहर क्यों नहीं बनाई जा सकती है. ये नहर इतना चौड़ा हो कि इससे तेल के टैंकर आसानी से आवाजाही कर सकें. 

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: 11 KM में सारा खेल होता है

गौरतलब है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जहां सबसे संकरा है वहां उसकी चौड़ाई लगभग मात्र 39 किलोमीटर रह जाती है. यह ईरान और ओमान के बीच का सबसे तंग हिस्सा है. जहाजों के चलने वाले असली रास्ते के लिए यहां Traffic Separation Scheme (TSS) लागू है. इसके तहत आने वाले जहाजों को 2 मील चौड़ा रास्ता चाहिए, जबकि जाने वाले जहाजों को भी 2 मील चौड़ा रास्ता चाहिए और इन दोनों जहाजों के बीच 2 मील का गैप होता है. यानी कुल उपयोगी रास्ता सिर्फ 6 मील (लगभग 11 किलोमीटर) का है. बाकी चौड़ाई में बड़े टैंकर नहीं चलते क्योंकि यहां गहराई कम है. इसलिए बड़े जहाजों के भूतल से टकराने का खतरा ज्यादा है. 

सवाल उठता है कि UAE और ओमान इस नुकीली जमीनी को काटकर नया नहर क्यों नहीं बनाते हैं.

पहली नजर में यह विचार आसान लगता है, लेकिन हकीकत में यह परियोजना भूगोल, तकनीक और राजनीति तीनों के लिहाज से बेहद जटिल है.

पहली बाधा- हजर पर्वत श्रृंखला

सबसे बड़ी बाधा भूगोल है. फारस की खाड़ी मूल रूप से एक बंद समुद्री खाड़ी है, जिसका प्राकृतिक निकास सिर्फ होर्मुज' से ही होता है. UAE और ओमान के बीच जो जमीन है, वहां ऊंची और कठोर चट्टानों वाली हजर पर्वत श्रृंखला फैली हुई है. इस इलाके में समुद्र से समुद्र तक नहर बनाने का मतलब होगा सैकड़ों किलोमीटर लंबी खुदाई और पहाड़ों को काटना. विशेषज्ञों का मानना है कि यह इंजीनियरिंग की दृष्टि से बेहद कठिन और खर्चीला प्रोजेक्ट होगा.

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हजर पर्वत श्रृंखला

कैसे काट पाएंगे 10 करोड़ वर्ष पुराने पर्वत

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का जो सबसे नुकीला हिस्सा है उसे मुसंदम पेनिन्सुला कहा जाता है. Musandam Peninsula अरब प्रायद्वीप का वह टुकड़ा है जो रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज पर स्थित है. यह इलाका प्रशासनिक रूप से ओमान का हिस्सा है, लेकिन भौगोलिक रूप से मुख्य ओमान से अलग होकर UAE के ऊपर की तरफ एक “एक्सक्लेव” की तरह स्थित है. 

मुसंदम पेनिन्सुला की तस्वीर

अगर इसे काटकर एक नहर बनाया जाए तो जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाइपास कर इधर से गुजर सकते हैं. लेकिन ये इतना आसान नहीं है. मुसंदम पेनिन्सुला की जमीन सामान्य रेतीली जमीन नहीं है. यह हजर माउंटेन रेंज का हिस्सा है, जो टेक्टोनिक प्लेटों की टक्कर से बनी है. जब अरबियन प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच टकराव हुआ, तब समुद्र के नीचे मौजूद चट्टानें ऊपर उठकर पहाड़ों में बदल गईं.

भूवैज्ञानिकों के अनुसार इस इलाके की चट्टानें लगभग 9 से 10 करोड़ साल पुरानी मानी जाती हैं. इनमें मुख्य रूप से कठोर चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसी चट्टानें हैं. यही वजह है कि यहां की पर्वत श्रृंखलाएं बेहद सख्त और खड़ी हैं. 

समंदर से सीधे निकलते हैं पर्वत

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मुसंदम की खासियत यह है कि यहां पहाड़ लगभग सीधे समुद्र से उठते हैं. यही कारण है कि यहां गहरी खाड़ियां बन गई हैं. अगर यहां नहर बनानी हो तो सिर्फ जमीन काटना ही नहीं पड़ेगा, बल्कि कई जगह ऊंचे पहाड़ों को भी काटना होगा, जिसकी ऊंचाई कई सौ मीटर तक है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें नहर बनाने के लिए 60 मील तक चट्टानों वाले पर्वतों को काटना पड़ेगा. 

इंजीनियरों ने इस संभावना पर विचार भी किया. इसकी 200 अरब डॉलर तक आई. 

पैसे के अलावा राजनीति भी है. ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट के सफल होने के लिए ओमान और UAE को राजनीतिक रूप से सहमत होना पड़ेगा. 

ईरान का विरोध भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. होर्मुज जलडमरूमध्य का उत्तरी किनारा ईरान के नियंत्रण में है और यह इलाका उसकी रणनीतिक ताकत का बड़ा आधार है. अगर कोई नया जलमार्ग बनता है जिससे खाड़ी के तेल जहाज सीधे रब सागर तक पहुंचने लगें, तो इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल सकता है. ऐसे में ईरान का विरोध और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है. 

अबु धाबी से सोहार तक क्यों न नहर बनाया जाए?

एक और विकल्प है. क्यों न UAE की ओर से अबु धाबी और ओमान की ओर से सोहार तक नहर बनाया जाए और दो सागरों को जोड़ दिया जाए.  इससे जहाज सीधे फारस की खाड़ी से निकलकर अरब सागर में पहुंच सकते हैं और स्ट्रेट ऑफ होरमजु को बायपास किया जा सकता है. 

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अबू धाबी और सोहार के बीच सीधी दूरी लगभग 300–350 किमी के आसपास पड़ती है. अगर जहाजों के लिए नहर बनानी हो तो उसे चौड़ा, गहरा और सुरक्षित बनाना पड़ेगा. इतनी लंबी समुद्री नहर बनाना दुनिया की किसी भी मौजूदा नहर से बड़ा प्रोजेक्ट होगा. तुलना के लिए बता दें कि स्वेज नहर की लंबाई 193 किमी लंबी है और पनामा नहर की लंबाई  82 किमी लंबी है. 

लेकिन यहां भी बाधा हजर पर्वत श्रृंखला है. इन दोनों शहरों के बीच हजर पर्वत श्रृंखला खड़ी है, जो अरब प्रायद्वीप की सबसे कठोर और ऊंची चट्टानी संरचनाओं में से एक है. कई जगह पहाड़ 1000–2000 मीटर तक ऊंचे हैं. इन्हें काटना असंभव तो नहीं लेकिन इंजीनियरिंग की दृष्टि से बेहद कठिन और महंगा काम है. 

इसकी लागत असाधारण होगी. इतनी लंबी नहर और पहाड़ी भूभाग को देखते हुए इसकी लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक जा सकती है. साथ ही लगातार ड्रेजिंग (गाद हटाना) और रखरखाव भी महंगा होगा. फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच समुद्री धाराएं, ज्वार और जलस्तर अलग हैं. इतने बड़े जलमार्ग को संतुलित रखने के लिए कई लॉक सिस्टम या विशाल जल-प्रबंधन संरचनाएं बनानी पड़ सकती हैं. जिससे प्रोजेक्ट और जटिल हो जाएगा. 

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