अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने H-1B और PERM वर्क वीजा में धोखाधड़ी को लेकर अपनी पहली जांच शुरू कर दी है. एक वरिष्ठ संघीय अधिकारी ने इस बड़े पैमाने पर की जा रही जांच का फ्रेमवर्क बताते हुए आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी कॉग्निजेंट का नाम लिया है.
अमेरिकी श्रम विभाग के इन्स्पेक्टर जनरल एंथनी डी'एस्पोसिटो ने बुधवार को फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए इसकी पुष्टि की. उन्होंने बताया कि जांच के दौरान विदेशी श्रम धोखाधड़ी से निपटने के लिए प्रशासन की अब तक की सबसे तेज कोशिशों के तहत दर्जनों समन जारी किए गए हैं.
इस मामले को लेकर व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर लिखा, 'ट्रंप प्रशासन ने अपनी पहली बड़ी H-1B वीजा धोखाधड़ी जांच शुरू की है.'
दर्जनों सम्मन जारी, व्हिसलब्लोअर्स ने किए बड़े खुलासे
महानिरीक्षक एंथनी डी'एस्पोसिटो ने खुलासा किया कि जांचकर्ताओं को देश की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों से जुड़ी जानकारियां मिली हैं. उन्होंने परमानेंट रेजीडेंसी की स्पॉन्सरशिप और H-1B वीजा को लेकर चल रही चिंताओं के बीच कॉग्निजेंट कंपनी का जिक्र किया.
उन्होंने कहा, 'हमारे पास व्हिसलब्लोअर्स हैं जो कॉग्निजेंट जैसी कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के बारे में बात कर रहे हैं. हम हर सुराग का पता लगाने के लिए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की धोखाधड़ी टास्क फोर्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने जा रहे हैं.'
हालांकि, अधिकारी ने कॉग्निजेंट पर किसी भी तरह के गलत काम का सीधा आरोप नहीं लगाया. उन्होंने सिर्फ व्हिसलब्लोअर्स से मिली जानकारी के रेफ्रेंस में कंपनी का नाम लिया.
वीजा धोखाधड़ी को संगठित अपराध से जोड़ा
ट्रंप सरकार का तर्क है कि वीजा से जुड़ी धोखाधड़ी सिर्फ इमिग्रेशन नियमों का उल्लंघन नहीं है. ये तेजी से बड़े आपराधिक नेटवर्कों से जुड़ती जा रही है. डी'एस्पोसिटो ने कहा, 'ये एक और उदाहरण है जहां धोखाधड़ी हिंसक अपराधों को बढ़ावा दे रही है.'
उन्होंने दावा किया कि विदेशी श्रम के गलत इस्तेमाल और मानव तस्करी सीधे तौर पर ड्रग कार्टेल और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गिरोहों से जुड़े हुए हैं. सरकार इस जांच को अमेरिकी मजदूरों की सुरक्षा करने और पब्लिक सिक्योरिटी में सुधार लाने के तौर पर देख रहा है.
क्या हैं H-1B और PERM वीजा सिस्टम?
H-1B वीजा एक गैर-प्रवासी वर्क परमिट है. ये अमेरिकी कंपनी मालिकों को चुनिंदा बिजनेसों में विदेशी पेशेवरों को काम पर रखने की अनुमति देता है. ये आमतौर पर तीन साल के लिए दिया जाता है और इसे ज्यादा से ज्यागा छह साल तक बढ़ाया जा सकता है.
PERM प्रोग्राम एक लेबर सर्टिफिकेशन प्रॉसेस है. कंपिनियों को कई विदेशी श्रमिकों को ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए स्पॉन्सर करने से पहले इस प्रक्रिया को पूरा करना जरूरी होता है.
भारतीय टेक पेशेवरों पर पड़ सकता है बड़ा असर
अमेरिकी टेक इंडस्ट्री H-1B वीजा की सबसे बड़ी यूजर है. हाल के सालों में नए आवेदनों में इस सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग 60 से 70 प्रतिशत रही है. इसके अलावा कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर और यूनिवर्सिटीज भी इसका इस्तेमाल करती हैं.
इस जांच पर भारत की पैनी नजर रहेगी, क्योंकि अमेरिका में H-1B वीजा धारकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024 में स्वीकृत हुए कुल H-1B लाभार्थियों में से लगभग 71 प्रतिशत भारत से थे. ये वीजा कार्यक्रम भारतीय इंजीनियरों, सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और रिसर्चर्स के लिए अमेरिका में रोजगार पाने का बड़ा जरिया रहा है.
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100,000 डॉलर की फीस पर कोर्ट लगा चुका है रोक
इस बड़ी जांच से ठीक एक महीने पहले प्रशासन को अदालत से झटका लगा था. एक संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन के उस नियम को खारिज कर दिया था, जिसमें बेहद कुशल विदेशी श्रमिकों के H-1B वीजा के लिए आवेदन करते समय कंपनियों को 100,000 डॉलर की भारी फीस देने के लिए कहा गया था.
अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना टैक्स जैसा शुल्क लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है.
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