पाकिस्तान और सऊदी अरब की दोस्ती का इम्तिहान एक बार फिर होने वाला है. पश्चिम एशिया में लड़ाई का एक और मोर्चा खुलता दिख रहा है. कई वर्षों से सीजफायर का पालन कर रहे सऊदी अरब और यमन विद्रोही फिर से एक दूसरे पर हमला करने लगे हैं. इससे पाकिस्तान की भूमिका पर फिर से ध्यान गया है, जिसने पिछले साल सउदी अरब के साथ आपसी रक्षा समझौता किया था और तब से उस देश में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है. इससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या पाकिस्तान जो पहले से ही बलूचिस्तान में विद्रोह और अफ़गानिस्तान सीमा पर तनाव से जूझ रहा है, हूतियों के खिलाफ लड़ाई में रियाद का साथ देगा.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के तहत दोनों देश एक दूसरे पर हुए बाहरी हमले की दिशा में एक दूसरे को सैन्य सहायता देंगे.
ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि सऊदी अरब के अभा एयरपोर्ट पर हुए हमले के बाद क्या पाकिस्तान सऊदी की मदद के लिए आगे आएगा.
इस सवाल को समझने से पहले ताजा विवाद को समझना जरूरी है.
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच ताजा संकट की शुरुआत रविवार को हुई. जब ईरान का एक विमान यमन के सना एयरपोर्ट पर उतर रहा था.
सऊदी समर्थित यमनी सरकार का आरोप था कि इस विमान के जरिए हूतियों तक सैन्य उपकरण और वरिष्ठ अधिकारी पहुंचाए जा रहे हैं. इस विमान को लैंड होने से रोकने के लिए सऊदी समर्थित यमनी सरकार ने रनवे को ही उड़ा दिया ताकि ईरान का विमान लैंड न कर सके. रनवे की हालत इतनी खराब हो गई कि इस विमान दूसरे एयरपोर्ट पर लैंड करना पड़ा.
इसके लिए हूतियों ने सीधे सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराया. जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल हमलों की धमकी दी और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य बंद करने की चेतावनी दी. इससे 2022 से चली आ रही अनौपचारिक युद्धविराम व्यवस्था लगभग टूट सी गई. इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में ईरान-अमेरिका तनाव, लाल सागर में जहाजों पर हूती हमले और सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं भी हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव यमन के गृहयुद्ध से आगे बढ़कर ईरान और उसके विरोधी देशों के बीच क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का नया चरण बन गया है.
असल में ये तनाव पिछले 10 दिनों से बढ़ रहा है. इस महीने की शुरुआत में ईरान का एक विमान खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए हूती प्रतिनिधिमंडल को ले जाने के लिए सना पहुंचा था. शायद एक दशक में यह पहली बार था जब ईरान का कोई विमान सना में उतरा.
हूतियों का दावा है कि सऊदी लड़ाकू विमानों ने उस विमान को उतरने से रोकने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हो पाए.
पाकिस्तान सऊदी अरब से कैसे निभाएगा दोस्ती?
सऊदी अरब और हूती लड़ाकों की लड़ाई ने पुराने प्रश्न को फिर से जिंदा कर दिया है. क्या पाकिस्तान वादा निभाएगा.
इस साल की शुरुआत में ईरान द्वारा सऊदी अरब के एनर्जी ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर कई बैठकें हुई हैं. सऊदी की लड़ाई में दखल देने के नाम पर पाकिस्तान के पांव फूलने लगते हैं. ऐसे मौके पर पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ अपने ही इलाके में संघर्ष शुरू करके खुद को इस युद्ध में घसीटने से बचा लेता है.
नवंबर 2025 से अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान का युद्धविराम लागू था. फिर भी 28 फरवरी को ईरान के साथ टकराव शुरू होते ही पाकिस्तान ने काबुल में हवाई हमले कर दिए. हालांकि पाकिस्तान के पास अचानक अफ़गानिस्तान पर हमला करने की कोई ठोस वजह नहीं थी. लेकिन अफ़गानिस्तान के साथ इस टकराव ने पाकिस्तान को सऊदी रक्षा समझौते की शर्तों से बचने का मौका दे दिया. पाकिस्तान सऊदी को कह सकता था कि वो खुद आंतरिक अशांति में व्यस्त है.
लेकिन अब मसला हूतियों का है. पाकिस्तान ने कभी भी आधिकारिक तौर पर यमन में हूतियों से लड़ाई नहीं की है और न ही उनके ख़िलाफ़ लड़ाकू फ़ौज तैनात की है.
1970 के दशक से पाकिस्तान ने समय-समय पर 8,000 से ज़्यादा सऊदी सैनिकों को ट्रेनिंग दी है. 1960 के दशक में यमन में मिस्र के युद्ध को लेकर बढ़े तनाव के दौरान भी पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब गए थे.
असल में 2015 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्ते तब खराब हो गए थे जब इस्लामाबाद ने यमन में गृहयुद्ध के दौरान सऊदी के नेतृत्व वाले दखल के लिए सैनिक भेजने से इनकार कर दिया था.
पाकिस्तान एक बार फिर मुश्किल स्थिति में फंस गया है. इस बार उसे कई मोर्चों पर अशांति का सामना करना पड़ रहा है. बलूच विद्रोहियों के हमले, पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन और अफगानिस्तान सीमा पर तनाव से पाकिस्तान तनाव में है.
इस वक्त सऊदी अरब में लगभग 8,000 पाकिस्तानी सैनिक, 16 लड़ाकू विमान और चीन का एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हैं. ये तैनाती मई में की गई थी जब मध्य पूर्व में तनाव कम हो गया था.
फिलहाल सऊदी- हूती विद्रोहियों के बीच हालात अस्थिर बने हुए हैं. सऊदी अरब और हूतियों के बीच हमलों का सिर्फ़ एक दौर हुआ है. अगर हूती सऊदी अरब पर हमले और बढ़ाते हैं, तो पाकिस्तान पर रियाद के साथ अपने कमिटमेंट को पूरा करने का दबाव तुरंत बढ़ेगा.
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