सिंधु से इश्क, हड़प्पा का हवाला? पानी की लड़ाई में PAK को याद आई प्राचीन सभ्यता

पाकिस्तान सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना दावा नई ताकत से कर रहा है. यह उस देश के लिए एक अहम शिफ्ट है जो 712 ईसवी में बिन कासिम द्वारा सिंध की विजय को अपनी नींव का क्षण मानता था. पाकिस्तान को अचानक हड़प्पा और मोहन जोदड़ो से इतना लगाव क्यों हो गया है?

Advertisement
सिंधु घाटी सभ्यता पर पाकिस्तान के नए प्रेम की वजह क्या है?  (File PHOTO: ITG) सिंधु घाटी सभ्यता पर पाकिस्तान के नए प्रेम की वजह क्या है? (File PHOTO: ITG)

सुशीम मुकुल

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:51 PM IST

पाकिस्तान बरसों से छात्रों को यह पढ़ाता आ रहा है कि उसका इतिहास 712 ईसवी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध की जीत के साथ शुरू हुआ. लेकिन इस मुल्क ने सिंधु घाटी सभ्यता के मोहन जोदड़ो में नई खुदाई शुरू की है. 1965 में अमेरिकी पुरातत्वविद् जॉर्ज डेल्स की खुदाई के बाद से यह जगह काफ़ी हद तक अछूती रही थी. 5,000 साल पुराने इस शहर में यह खुदाई जून 2025 में शुरू हुई. यह घटनाक्रम भारत द्वारा 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू करने और सिंधु जल संधि को स्थगित करने के कुछ महीनों बाद हुआ. 

Advertisement

पहलगाम हमले के बाद भारत ने जब सिंधु जल समझौता निलंबित किया तो पाकिस्तान की हेकड़ी निकल गई. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के प्रमुख बिलावल भुट्टो ने भारत द्वारा सिंधु जल संधि को निलंबित करने के खिलाफ पाकिस्तान के विरोध को एक सभ्यतागत दावे से जोड़ दिया.  

उन्होंने मोहनजो-दड़ो और सिंधु घाटी सभ्यता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पाकिस्तान सिंधु का "असली संरक्षक" है. उन्होंने कहा कि इसी वजह से पाकिस्तान का इस नदी पर इसके "रक्षक" के तौर पर ऐतिहासिक अधिकार है. 

पाकिस्तान लगातार सिंधु घाटी सभ्यता और अपनी इस्लाम-पूर्व विरासत का हवाला देकर सिंधु की विरासत के मुख्य उत्तराधिकारी के तौर पर अपने दावे को मज़बूत कर रहा है, और वह सिंधु घाटी की कहानी का इस्तेमाल भारत को चुनौती देने और सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर अपने दावों को मज़बूत करने के लिए कर रहा है. 

Advertisement

इस बीच बिलावल भुट्टो और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ जैसे पाकिस्तानी नेताओं ने भारत पर ज़ुबानी हमले तेज कर दिए हैं. वे अक्सर सिंधु जल संधि को रोके रखने के भारत के फ़ैसले को लेकर नई दिल्ली को युद्ध की धमकी देते रहे हैं. 

हाल फिलहाल ही में पाकिस्तान ने इस्लाम-पूर्व काल की तक्षशिला, गांधार और सिंधु घाटी की विरासत को अपनाना शुरू किया है. सिंधु घाटी सभ्यता के मोहन जोदडो के अलावा, पाकिस्तान ने हाल ही में अपने इस्लाम-पूर्व अतीत की विरासत वाली जगहों पर भी दावा करना शुरू किया है. पाकिस्तान के लिए यह एक अहम बदलाव है, क्योंकि अब तक उसके इतिहास में मुख्य रूप से मुहम्मद बिन कासिम की जीत पर ही जोर दिया जाता रहा है. 

साथ ही, सरकार समर्थित डॉक्यूमेंट्री, सेमिनार और अंतरराष्ट्रीय आउटरीच प्रोग्राम सिंधु घाटी सभ्यता को पाकिस्तान की पहचान के एक अहम हिस्से के तौर पर पेश कर रहे हैं. 

प्राचीन तक्षशिला को टूरिज्म कैंपेन, म्यूज़ियम से जुड़ी पहलों और हेरिटेज प्रोग्राम के ज़रिए ज़ोर-शोर से प्रमोट किया गया है. यह जगह भारत के शुरुआती महाविहारों में से एक का घर है और यहां अकैमेनिड, मौर्य, इंडो-ग्रीक और कुषाण काल ​​की धरोहर हैं. यह अपनी वैदिक, बौद्ध और ग्रीको-बौद्ध परंपराओं के लिए जानी जाती है.

Advertisement

इसी तरह गांधार की बौद्ध विरासत और बलूचिस्तान में नवपाषाण युग के स्थल मेहरगढ़ को उन कहानियों में शामिल किया गया है जो पाकिस्तान को हजारों साल पुरानी, ​​बिना किसी रुकावट के चली आ रही सभ्यता की विरासत का उत्तराधिकारी बताती हैं. 

यह तमाशा इतना बढ़ गया है कि कुछ पाकिस्तानी अब दावा करते हैं कि "पाकिस्तान ही असली और एकमात्र सच्चा भारत है." X पर अपनी बायो में इस व्यक्ति ने लिखा, "महान सिंधु नदी के इतिहास को फिर से अपनाना है."

हाल ही में पाकिस्तान में ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर टिमोथी केन ने तक्षशिला का दौरा करने के बाद इस शहर को ज्ञान का केंद्र बताया. उन्होंने लिखा कि तक्षशिला "पूरे इलाके और उसके बाहर के लोगों, विचारों और संस्कृतियों" को जोड़ता था और पाकिस्तान की "समृद्ध विरासत" की याद दिलाता है. 

इस पोस्ट पर पाकिस्तानी कमेंटेटर अकबर अली शाह का जवाब ज़्यादा अहम था. उन्होंने कहा कि "सिंधु नदी पाकिस्तान की है और उससे जुड़ा इतिहास भी पाकिस्तान का ही है." X पर लिखते हुए शाह ने तर्क दिया कि "तक्षशिला, सिंधु घाटी और खुद नदी" "पाकिस्तानी विरासत" का हिस्सा हैं. उन्होंने आगे कहा कि "आप उस नदी की विरासत का दावा नहीं कर सकते जिस पर आपका कब्जा नहीं है."

Advertisement

शाह ने सिंधु नदी को वह ताकत बताया जिसने पाकिस्तान को "धर्म, भाषा या जातीयता" से ऊपर उठकर एकजुट किया और कहा कि पाकिस्तान के लिए यह नदी वैसी ही है "जैसी मिस्र के लिए नील नदी है."

विरासत को लेकर सामने आए ये चौंकाने वाले विचार दिखाते हैं कि पाकिस्तान की पहचान को इस्लाम-पूर्व सभ्यता वाले अतीत से जोड़ने की कोशिशें बढ़ रही हैं, जिसे उसने दशकों तक स्वीकार न करने का फैसला किया था. इसी कोशिश के तहत पाकिस्तान सिंधु घाटी सभ्यता को भारत के साथ सिंधु जल विवाद से जोड़ रहा है. 

सिंधु से पाकिस्तान के नए प्रेम की कहानी क्या है?

सिंधु घाटी सभ्यता को पाकिस्तान का अचानक से फिर से याद करना कोई इत्तेफ़ाक नहीं है. यह सिंधु जल संधि को लेकर चल रहे गंभीर संकट के बाद हुआ है. तब से पाकिस्तानी नेता बार-बार अपनी विरासत को जियो पॉलिटिक्स से जोड़ते रहे हैं.

बिलावल भुट्टो-ज़रदारी और उनके पिता पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़रदारी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने में सबसे आगे रहे हैं. बिलावल भुट्टो-ज़रदारी ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान ही उस सभ्यता का "असली संरक्षक" है जो इस नदी के किनारे फली-फूली थी. एक और भाषण में उन्होंने भारत के कदम को खुद "सिंधु घाटी सभ्यता" पर हमला बताया.

Advertisement

इन संदेशों का एक साफ मकसद लगता है और इनमें नैरेटिव गढ़ने की साफ बू आती है. 

पाकिस्तान को 5,000 साल पुरानी नदी-सभ्यता का वारिस बताकर इस्लामाबाद एक कानूनी और जल-विज्ञान से जुड़े विवाद में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलू जोड़ने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान का यह तर्क कि सिंधु पर पाकिस्तान का खास अधिकार है क्योंकि मोहन जोदड़ो, हड़प्पा और इसका रिवर सिस्टम का ज़्यादातर हिस्सा उसके पास है, मूल रूप से गलत है. 

सिंधु जल संधि विवाद के लिए पानी की उपलब्धता, जलवायु के दबाव और दोनों देशों की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों का वैज्ञानिक और आज के हिसाब से आकलन जरूरी है. खासकर भारत का यह पुराना तर्क कि संधि में पानी का बंटवारा एकतरफा है और अब मौजूदा हकीकत को नहीं दिखाता.

पुरातत्व के सबूत भी पाकिस्तान के दावे की तस्वीर को उलझा देता है. हालांकि सिंधु सभ्यता की कुछ सबसे पुरानी और मशहूर जगहें आज पाकिस्तान में हैं, लेकिन हड़प्पा की ज़्यादातर जानी-मानी जगहें आज के भारत में हैं, खासकर घग्गर-हाकरा सिस्टम के सूखे रास्तों के किनारे, जिसे कई विद्वान प्राचीन सरस्वती नदी मानते हैं. भौगोलिक नज़रिए से भी इस सभ्यता का ज़्यादातर हिस्सा आज के भारत में है, न कि पाकिस्तान में. 

Advertisement

इससे भी ज़रूरी बात यह है कि न तो पुरातत्व और न ही प्राचीन इतिहास यह तय करता है कि पानी पर किसका अधिकार है. सिंधु जल का मामला समझौतों से चलता है, न कि सभ्यता की विरासत के दावों से. समझौतों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए. इसलिए मोहन जोदड़ो का ज़िक्र करने से पाकिस्तान का पक्ष मज़बूत हो सकता है और उसे विदेशों में कुछ सहानुभूति मिल सकती है, लेकिन इससे विवाद की कानूनी हकीकत नहीं बदलती है.  आखिर में पानी की बदलती ज़रूरतों पर भारत की चिंताओं और इस तर्क पर ध्यान देना होगा कि संधि अब मौजूदा हकीकत को नहीं दिखाती. पाकिस्तान को आतंकवाद का निर्यात भी बंद करना होगा. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »