यूपी सरकार को हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, हेड कांस्टेबल की विधवा को 50 लाख देने का दिया आदेश

कोरोना महामारी के दौरान हजारों सरकारी कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर जरूरी सेवाएं जारी रखने में जुटे रहे. कई कर्मचारी ड्यूटी के दौरान संक्रमण की चपेट में आए. उनकी मौत हो गई. ऐसे मामलों में मुआवजे और सरकारी नीतियों की व्याख्या को लेकर लगातार अदालतों का रुख महत्वपूर्ण रहा है.

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महामारी में ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी भी कोविड वॉरियर, हाई कोर्ट ने मुआवजे का आदेश दिया. (Photo: Representational) महामारी में ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी भी कोविड वॉरियर, हाई कोर्ट ने मुआवजे का आदेश दिया. (Photo: Representational)

aajtak.in

  • लखनऊ,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:52 PM IST

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है. इसके साथ ही निर्देश देते हुए कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए संक्रमण से जान गंवाने वाले हेड कांस्टेबल की विधवा को 50 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए. कोर्ट ने कहा कि महामारी के दौरान जरूरी सेवाओं में तैनात सरकारी कर्मचारियों को भी 'कोविड ड्यूटी' पर माना जाएगा.

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कोर्ट ने दिवंगत हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप की पत्नी सेम्मा भारती की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुआवजा देने से इनकार किया गया था. अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर 50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि जारी की जाए. उत्तर प्रदेश सरकार ने 11 अप्रैल 2020 को मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था.

सरकार का कहना था कि बलवंत प्रताप कोविड-19 की रोकथाम, इलाज या संक्रमण नियंत्रण से सीधे जुड़ी ड्यूटी पर तैनात नहीं थे. हालांकि, जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए. के. चौधरी की खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि चीफ मेडिकल ऑफिसर और पुलिस विभाग की ओर से जारी प्रमाणपत्रों सहित आधिकारिक रिकॉर्ड से कई तथ्यों का साफ पता चलता है.

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इसके अनुसार बलवंत प्रताप को कोविड-19 की रोकथाम और नियंत्रण, लोगों में जागरूकता फैलाने, संक्रमित लोगों की सहायता करने के लिए तैनात किया गया था. अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस विभाग ने पहले ही उनके परिवार को एक्स-ग्रेशिया मुआवजा देने की सिफारिश की थी. इसके बावजूद राज्य सरकार ने दावा खारिज कर दिया. हाई कोर्ट ने कहा कि 'कोविड ड्यूटी' की परिभाषा भी बताई.

अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि 'कोविड ड्यूटी' का मतलब केवल अस्पतालों में मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों तक सीमित नहीं हो सकती. कोर्ट ने साफ किया कि महामारी के दौरान पुलिस, बिजली, पानी की आपूर्ति, टेलीफोन और अन्य जरूरी सेवा विभागों में काम करने वाले सरकारी कर्मचारी भी कोविड ड्यूटी का हिस्सा थे.

कोर्ट ने कहा कि इन कर्मचारियों ने महामारी के दौरान जरूरी सार्वजनिक सेवाओं को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई. उनके काम ने राज्य को संक्रमण के प्रसार को रोकने, मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और व्यवस्था बनाए रखने में मदद की थी. इसलिए उन्हें भी 'कोविड वॉरियर्स' के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए. दिवंगत हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप सरकारी नीति के दायरे में स्पष्ट रूप से आते हैं.

इसके तहत महामारी से जुड़े कार्यों के दौरान कोविड-19 से संक्रमित होकर जान गंवाने वाले कर्मचारियों के परिवारों को मुआवजा दिया जाता है. इसी आधार पर अदालत ने 27 अगस्त 2024 को जारी राज्य सरकार के रिजेक्शन ऑर्डर को रद्द कर दिया. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि सेम्मा भारती को आठ सप्ताह के भीतर 50 लाख रुपए का मुआवजा जारी कर दिया जाए.

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