लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बाद प्रशासन ने आसपास बने बेसमेंट कॉम्प्लेक्सों की जांच कर रही है. हादसे वाली जगह से करीब 400 मीटर दूर बने कॉम्प्लेक्सों की पड़ताल के लिए LDA, फायर और बिजली विभाग की संयुक्त टीमें मौके पर पहुंचीं. जांच के दौरान जब आजतक ने वहां मौजूद अधिकारियों, कर्मचारियों से पूछा कि ऐसी चेकिंग किसी बड़े हादसे के बाद ही क्यों शुरू होती है, तो किसी ने साफ जवाब नहीं दिया. कई लोग कैमरे पर बोलने से कतराते रहे, तो कुछ ने बात करने से ही साफ मना कर दिया.
'हम ऑथराइज नहीं हैं...' कहकर पल्ला झाड़ते रहे अधिकारी
जांच के नाम पर दुकानों में दाखिल हो रही इस संयुक्त टीम के सामने जब आजतक ने माइक लगाया, तो अजीबोगरीब नजारा देखने को मिला. टीम में शामिल एक शख्स ने कहा कि वे बयान देने के लिए अधिकृत नहीं हैं, वहीं दूसरे ने कहा कि वे छोटे कर्मचारी हैं, बड़े साहब से बात करनी चाहिए. हद तो तब हो गई जब मौके पर मौजूद लोग एक-दूसरे को 'साहब' बताकर अपना पल्ला झाड़ते रहे. सवाल यह है कि जब हादसे में कई घरों के चिराग बुझ गए, तब अपनी जवाबदेही से इस तरह पीछे हटना कितना सही है?
ओवरलोडिंग पर बिजली विभाग का तर्क, कहा- नोटिस देने में लगते हैं 3-4 महीने
जब मौके पर चेकिंग कर रहे बिजली विभाग के एक जिम्मेदार से सवाल किया गया कि जिस जगह हादसा हुआ वहां तो बिजली की भारी ओवरलोडिंग थी, तब उन्होंने रूटीन प्रोसेस का हवाला दिया. उनका कहना था कि ओवरलोडिंग मिलने पर नोटिस जारी करने में 3 से 4 महीने का वक्त लग जाता है. इस पर जब पूछा गया कि इन 3-4 महीनों के बीच अगर कोई बड़ा हादसा हो जाए, मासूमों की जान चली जाए, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? इस बात पर उन्होंने पूरी जिम्मेदारी विद्युत सुरक्षा निदेशालय पर डाल दी कि एनओसी देना उनका काम है.
ग्राउंड रिपोर्ट में यह साफ दिखा कि पूर्व में हुए चारबाग, लवाना जैसे बड़े हादसों से जिम्मेदार लोगों ने कोई सबक नहीं लिया है. ऐसे हादसों के बाद महज हफ्ता-दस दिन की कार्रवाई होती है, फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है. अब जब मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के सख्त निर्देश आए हैं, तब जाकर ये संयुक्त टीमें बेसमेंट का सर्वे करने निकली हैं. हाथ में डायरी लेकर सिर्फ कागजी खानापूर्ति करने वाले कर्मचारियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि अलीगंज के उस विवादित कॉम्प्लेक्स पर पहले चेकिंग क्यों नहीं की गई. जवाब तो वो माता-पिता चाहते हैं जिनके घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए हैं.
समर्थ श्रीवास्तव