इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 साल पुरानी एक आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है और चकबंदी लेखपाल की एक वर्ष की सजा को बरकरार रखा है. लेखपाल ने लगभग 49 साल पहले 300 रुपये की रिश्वत ली थी, जिसमें वो जो रंगे हाथ पकड़ा गया था. जस्टिस संजीव कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच में इसकी सुनवाई हुई.
हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव कुमार की एकल पीठ ने कानपुर में तैनात रहे तत्कालीन चकबंदी लेखपाल महेश चंद की अपील को खारिज करते हुए उन्हें चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सतर्कता अधिकारियों और स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों द्वारा जाल बिछाने (ट्रैप) की कार्यवाही की पूरी तरह से पुष्टि हो जाती है, तो मुख्य शिकायतकर्ता की अदालत में जांच न होना भ्रष्टाचार के मामले को कमजोर नहीं करता. लेखपाल महेश चंद को अक्टूबर 1985 में कानपुर के पांचवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दोषी ठहराया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
1977 में चक आवंटन के नाम पर मांगी थी रिश्वत
यह पूरा मामला 1 अप्रैल, 1977 का है. ग्रामीण वीरेंद्र सिंह का अपने ही गांव की एक महिला के साथ चक आवंटन को लेकर विवाद चल रहा था, जिसकी अपील चकबंदी अधिकारी के समक्ष लंबित थी. उसी सुबह बस में सफर के दौरान लेखपाल महेश चंद और कानूनगो चंद्र सेन ने वीरेंद्र सिंह से विपक्षी पार्टी की अपील खारिज करवाने के बदले 400 रुपये की रिश्वत मांगी. वीरेंद्र सिंह ने मौके पर ही कानूनगो को 100 रुपये दे दिए. इसके बाद उन्होंने कानपुर में अपने बेटे के साथ सतर्कता विभाग (विजिलेंस) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई.
होटल में जाल बिछाकर रंगे हाथ दबोचा गया लेखपाल
सतर्कता विभाग ने एक सुनियोजित जाल बिछाया और 100-100 रुपये के तीन नोटों पर फिनोलफथेलिन पाउडर लगाया. उसी दोपहर वीरेंद्र सिंह ने कानपुर के एक होटल में महेश चंद को ये चिह्नित नोट सौंप दिए, जिसे उसने अपनी पैंट की जेब में रख लिया. सतर्कता दल ने तुरंत धावा बोलकर लेखपाल को दबोच लिया. जब उसके हाथों और जेबों को सोडियम कार्बोनेट के घोल से धोया गया, तो उनका रंग लाल हो गया, जिससे रिश्वत के नोटों के संपर्क की पुष्टि हो गई.
चार दशक बाद हाईकोर्ट ने खारिज कीं आरोपी की दलीलें
निचली अदालत ने सह-आरोपी कानूनगो को बरी कर दिया था, लेकिन महेश चंद को दोषी ठहराया था, जिसके बाद वह जमानत पर बाहर था. हाईकोर्ट में आरोपी का तर्क था कि मुख्य गवाह वीरेंद्र सिंह की गवाही नहीं हुई और सार्वजनिक होटल में रिश्वत लेना असंभव है. हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया, क्योंकि चिकित्सकीय साक्ष्यों के अनुसार शिकायतकर्ता का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं था. कोर्ट ने विजिलेंस टीम और स्वतंत्र गवाहों के बयानों को पूरी तरह विश्वसनीय माना और आरोपी के बांड रद्द कर उसे जेल भेजने का आदेश दिया.
पंकज श्रीवास्तव