कार्यकाल खत्म, फिर भी कुर्सी बरकरार? ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाई कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछे सवाल

ग्राम पंचायत का कार्यकाल खत्म हो गया, लेकिन वही ग्राम प्रधान अगर प्रशासक बनकर कुर्सी पर बने रहें तो क्या इसे कार्यकाल बढ़ाना माना जाएगा? क्या इससे राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका कमजोर होती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार से कुछ ऐसे ही तीखे सवाल पूछे हैं, जिनका जवाब अब सरकार को कोर्ट में देना होगा.

Advertisement
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने की सुनवाई. (Photo: Representational) इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने की सुनवाई. (Photo: Representational)

आशीष श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 10 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:56 PM IST

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि इससे जुड़े गंभीर संवैधानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना जरूरी है.

दरअसल, यह सुनवाई संजय कुमार शर्मा की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर हुई. याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब किसी ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, तो उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाकर पंचायत की कमान सौंपना क्या संविधान के अनुरूप है?

Advertisement

सुनवाई के दौरान अदालत ने सबसे अहम सवाल यही उठाया कि क्या ग्राम प्रधान को प्रशासक बनाना, उसके कार्यकाल को परोक्ष रूप से बढ़ाने जैसा नहीं है? अगर ऐसा है, तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और नियमित चुनाव कराने की संवैधानिक व्यवस्था का क्या होगा?

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठते हैं और उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की संबंधित धारा की वैधता पर विचार किया जाना आवश्यक है. कोर्ट ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होकर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया.

यह भी पढ़ें: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 49 साल पहले ₹300 की रिश्वत लेने वाले लेखपाल की सजा बरकरार, 41 साल पुरानी अपील खारिज

कोर्ट ने कहा कि विचारणीय प्रश्न यह है कि ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से क्या पंचायत का कार्यकाल अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाता है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस व्यवस्था से राज्य निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं? क्योंकि पंचायत चुनाव कराना और समय पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी कराना राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है.

Advertisement

इन सवालों के जवाब के लिए हाई कोर्ट ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है. अदालत चाहती है कि सरकार स्पष्ट करे कि इस व्यवस्था का कानूनी आधार क्या है और इसे संविधान के अनुरूप कैसे माना जा सकता है. मामले की संवैधानिक गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने इसे पंचायत व्यवस्था से जुड़ी अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ टैग कर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है. यानी अब इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर सुनवाई होगी.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »