कुरेमल की कुल्फी, पंजाबी गाने! विंबलडन अचानक इतना देसी क्यों हुआ?

सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले इन्फ्लूएंसर्स इन दिनों विंबलडन के रॉयल बॉक्स में नज़र आए तो हर कोई हैरान था. सवाल यही था कि आखिर ये वहां क्यों और कैसे पहुंचे. जवाब पूरी तरह से मार्केटिंग पर निर्भर करता है, क्यूंकि मामला पैसा कमाने का है. यही वजह है कि विंबलडन थोड़ा देसी हुआ है और वो ऐसे ही नहीं हुआ है.

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विंबलडन की कोशिश है कि भारत की मार्केट में अपनी पैठ बढ़ाई जाए. विंबलडन की कोशिश है कि भारत की मार्केट में अपनी पैठ बढ़ाई जाए.

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 16 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:18 AM IST

लंदन के सेंटर कोर्ट की हरी घास पर जब टेनिस की गेंद टप्पा खाती है, तो ब्रिटिश स्टाइल में वहां केवल स्ट्रॉबेरीज़ एंड क्रीम का स्वाद और एक ब्रिटिश गरिमा महसूस होती थी. क्यूंकि अंग्रेज़ों को इस बात का गुरूर रहता है कि वो रॉयल हैं, इसलिए विंबलडन में आपको रॉयल बॉक्स मिलता है, सब सूट-बूट में सेट लगते हैं. 

लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई है. विंबलडन के ऑफिशियल इंस्टाग्राम रील्स पर बड़े-बड़े प्लेयर्स के सबसे कलात्मक शॉट्स के बैकग्राउंड में 'पहला नशा' बज रहा है. पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए सेरेना विलियम्स की आक्रामक दहाड़ को 'पटाखा गुड्डी' के गाने से सजाया गया है, और नोवाक जोकोविच के सर्व को डिवाइन के 'बाज़ीगर' बीट्स के साथ पेश किया जा रहा है. 

वैसे ये बात अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, दिल्ली की 120 साल पुरानी दुकान 'कुरेमल मोहनलाल कुल्फी वाले' के साथ मिलकर विंबलडन 'स्ट्रॉबेरीज़ एंड क्रीम कुल्फी' बेच रहा है. करीब डेढ़ सौ साल पुराने इस अति-पारंपरिक खेल का यह 'देसी' अवतार अकारण नहीं है. दरअसल, सारा खेल पैसे का है. ये ग्लोबल स्पोर्ट्स मार्केट और भारतीय डिजिटल स्पेस में आ रहे एक बहुत बड़े आर्थिक और रणनीतिक बदलाव का हिस्सा है.

और सबसे बड़ी बात, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इंडियन स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग मार्केट का बदलता ढांचा और जियो-हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म का उदय या यूं कहे कि मजबूरी है. डिज्नी स्टार और वायकॉम18 के ऐतिहासिक विलय के बाद बनी इस दिग्गज कंपनी के पास अब 55 करोड़ से अधिक मंथली एक्टिव यूजर्स का विशाल साम्राज्य है. लेकिन ये इंडिया है, यहां मैक्सिमम ऑडियंस मुफ्त में इस्तेमाल चाहती है.

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यही वजह है कि क्रिकेट के महंगे राइट्स, खास तौर पर आईसीसी के करीब 3 बिलियन डॉलर के प्रसारण अधिकार ने इस नई कंपनी के बही-खातों पर भारी दबाव डाला था. खुद कंपनी की रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2025 में कंपनी को महंगे स्पोर्ट्स राइट्स के कारण होने वाले भारी-भरकम नुकसान के लिए करीब 25,760 करोड़ रुपये का नुकसान करना पड़ा था. 

लेकिन वित्त वर्ष 2026 के आंकड़ों से स्पष्ट है कि कंपनी ने इस घाटे की भरपाई के लिए अपनी रणनीति बदल दी है. इस प्रावधान को 31.12% घटाकर 17,742 करोड़ रुपये करना यह दिखाता है कि जियोस्टार अब केवल 'स्केल' यानी भीड़ बटोरने के बजाय 'प्रॉफिटेबिलिटी' यानी मुनाफे की तरफ बढ़ रहा है.

 

क्रिकेट से होने वाले भारी नुकसान की भरपाई का सबसे आसान रास्ता 'एलिट स्पोर्ट्स' यानी प्रीमियम खेलों को बढ़ावा देना है. भारत में क्रिकेट को देखने वाली ऑडियंस काफी बड़ी और विविध है, लेकिन विज्ञापन देने वालों के नज़रिए से, क्रिकेट देखने वाली भीड़ में बाइंग पावर का अनुपात बहुत बिखरा हुआ है.

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इसके उलट विंबलडन, फॉर्मूला 1 या प्रीमियर लीग जैसे खेलों को देखने वाला क्राउड वर्ग बेहद एलिट, शहरी और समृद्ध है. भारत का यह 'प्रीमियम क्लास' या अपर-मिडिल क्लास महंगे ब्रांड्स का मुख्य खरीदार है. जब विंबलडन जैसे एलिट टूर्नामेंट को भारत में आक्रामक ढंग से प्रमोट किया जाता है, तो ब्रॉडकास्टर को उन ब्रांड्स से विज्ञापन मिलते हैं जो आम टीवी चैनलों पर पैसा खर्च नहीं करते. 

लक्जरी गाड़ियां, प्रीमियम घड़ियां, वेल्थ मैनेजमेंट सर्विसेज और आईफोन जैसे महंगे गैजेट्स बेचने वाली कंपनियां इन खेलों के प्रसारण के दौरान करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार रहती हैं. इस तरह, कम दर्शकों में भी अधिक एड रेट्स वसूलकर घाटे को तेजी से कम किया जा रहा है.

इसी रणनीति को भांपते हुए विंबलडन जैसे विदेशी खेल संगठनों ने भी भारतीय बाजार में सीधे पैर पसारने शुरू कर दिए हैं. वे जानते हैं कि यदि उन्हें भारत के इस प्रीमियम और युवा दर्शक वर्ग को बांधे रखना है, तो उन्हें अपनी ब्रिटिश औपचारिकता को छोड़कर थोड़ा 'देसी' तड़का लगाना ही होगा. यही कारण है कि भारतीय सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स को खास तौर पर लंदन बुलाकर सेंटर कोर्ट के अनुभव साझा कराए जा रहे हैं. 

जब एक आम भारतीय यूजर अपने पसंदीदा क्रिएटर को विंबलडन के मैदान पर देखता है, तो टेनिस अचानक से उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा लगने लगता है. क्यूंकि किसी भी आम भारतीय के लिए विंबलडन का मैच देखना एक सपना ही है, क्यूंकि ये महंगा ही इतना है. विंबलडन के किसी नॉर्मल मैच का एक टिकट 15000 से 50 हज़ार तक का मिलता है, लेकिन इसमें कई चोचले हैं. क्यूंकि ये सिर्फ मैच टिकट है, आप भारत से जाएंगे तो आने-जाने का टिकट, होटल, वीज़ा, घूमना-फिरना. सब जोड़ेंगे तो विंबलडन का एक मैच आपको 5-6 लाख का पड़ेगा और जिसके लिए तैयारी 6-7 महीने से पहले करनी होगी.

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संगीत और कुल्फी जैसी सांस्कृतिक साझेदारियों के जरिए विंबलडन ने खुद को भारत के युवाओं के लिए अधिक सुलभ और आकर्षक बना लिया है. तभी आपने देखा होगा कि अचानक ऐसी तस्वीरों की बाढ़ सोशल मीडिया पर आई है, जहां जो लोग इंस्टाग्राम पर अबतक रील बना रहे थे, वो अब विंबलडन के रॉयल कोर्ट से तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं.

जियो-हॉटस्टार अपने प्लेटफॉर्म पर केवल व्यूज दिखाने के पारंपरिक तरीके को बदल रहा है. OpenAI के साथ उनकी हालिया साझेदारी और AI ओरिजिनेटड कंटेंट डिस्कवरी के जरिए वे अब दर्शकों के व्यवहार को ट्रैक कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, यदि कोई यूजर विंबलडन की रील्स देखता है या टेनिस मैच लाइव स्ट्रीम करता है, तो एल्गोरिथ्म उसे तुरंत प्रीमियम लाइफस्टाइल ब्रांड्स के विज्ञापन और इन-ऐप शॉपिंग के विकल्प दिखाने लगता है. 

यह तकनीक और एलिट स्पोर्ट्स का एक ऐसा कॉकटेल है जो सीधे कन्वर्शन यानी बिक्री में बदल जाता. विज्ञापनदाता अब केवल इस बात के लिए पैसे नहीं दे रहे कि उनके विज्ञापन को कितने लोगों ने देखा, बल्कि वे इस बात के लिए मोटी रकम दे रहे हैं कि उनके विज्ञापन को भारत के सबसे अमीर 5% लोगों ने देखा.

इसलिए विंबलडन का यह 'पंजाबी बीट्स' पर थिरकना और ब्रॉडकास्टर्स का एलिट स्पोर्ट्स की तरफ झुकाव कोई संयोग नहीं, बल्कि इंडियन स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग के परिपक्व होने की कहानी है. क्रिकेट हमेशा भारत का पहला प्यार रहेगा, लेकिन जब बात बिजनेस से पैसा कमाने और भारी-भरकम नुकसान को कम करने की आती है, तो विंबलडन जैसे एलिट स्पोर्ट्स ही पैसों के मामले में संकटमोचक की भूमिका निभाते नजर आते हैं. इस पूरी जुगलबंदी ने यह साबित कर दिया है कि खेल के मैदान पर भले ही नियम सख्त हों, लेकिन जब बात बाजार की आती है, तो जीत उसी की होती है जो सही समय पर सही दर्शक को अपनी धुन पर नचा सके.

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