भारत का फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup) खेलना अभी भी एक सपना है, शायद इतना दूर कि फिलहाल उस पर गंभीरता से बात करना भी मुश्किल लगता है. लेकिन भारत का फीफा वर्ल्ड कप को जीना? वह सपना नहीं, हकीकत है. और हर चार साल में पूरा देश उसे जीता भी है. फीफा वर्ल्ड कप आते ही भारत के कई शहर अचानक फुटबॉल की दुनिया में बदल जाते हैं. सड़कों पर अर्जेंटीना और ब्राजील के झंडे दिखाई देने लगते हैं. ऑफिस में लोग जर्सी पहनकर पहुंचते हैं. रात 3 बजे तक मैच देखने के बाद भी अगले दिन चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि उत्साह होता है. यहां तक कि वह अंकल भी, जिन्होंने पूरे साल क्लब फुटबॉल का एक मैच नहीं देखा होता, अचानक फुटबॉल एक्सपर्ट बन जाते हैं. उन्हें ला लीगा टेबल शायद न पता हो, लेकिन अर्जेंटीना का स्कोर जरूर पता होता है. सुबह की चाय पर मेसी बनाम रोनाल्डो की बहस शुरू हो जाती है.
क्रिकेट के दीवाने देश में फीफा वर्ल्ड कप हमेशा यह याद दिलाता है कि भले ही भारत टूर्नामेंट में नहीं खेलता, लेकिन दर्शकों की दुनिया में उसकी मौजूदगी बेहद बड़ी है. यही वजह है कि फीफा वर्ल्ड कप 2026 के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स को लेकर बना सस्पेंस भारतीय फुटबॉल फैन्स को सिर्फ अजीब नहीं, बल्कि अपमानजनक लग रहा है. फैन्स को यह डर नहीं है कि टूर्नामेंट शुरू होने के बाद उन्हें मैच देखने को नहीं मिलेंगे. ज्यादातर लोगों को भरोसा है कि आखिरकार कोई ना कोई डील हो ही जाएगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक जी (Zee) करीब 30-35 मिलियन डॉलर में ब्रॉडकास्ट राइट्स हासिल करने के बेहद करीब है और जल्द इसका आधिकारिक ऐलान भी हो सकता है. लेकिन असली नाराजगी कहीं और है. फुटबॉल फैन्स समझ रहे हैं कि यह कहानी सिर्फ एक वर्ल्ड कप तक सीमित नहीं रहने वाली. उन्होंने पहले भी ऐसे हालात देखे हैं. और एक बार फिर सबसे ज्यादा इंतजार और सबसे ज्यादा कीमत फैन्स को ही चुकानी पड़ रही है.
भारत के लिए वर्ल्ड कप सिर्फ टूर्नामेंट नहीं, एक त्योहार है. भारतीय फुटबॉल फैंडम हमेशा से विरोधाभासों से भरा रहा है. भारत कभी फीफा वर्ल्ड कप नहीं खेल पाया, घरेलू फुटबॉल ढांचा अब भी कमजोर है. राष्ट्रीय टीम दुनिया के बड़े मंच से काफी दूर नजर आती है. लेकिन हर चार साल में पूरा देश ऐसे जीता है जैसे वह वर्ल्ड कप का हिस्सा हो. कोलकाता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. वर्ल्ड कप आते ही शहर फुटबॉल कार्निवल में बदल जाता है. मोहल्ले अर्जेंटीना और ब्राजील के खेमों में बंट जाते हैं. लियोनेल मेसी, नेमार जूनियर और क्रिस्टियानो रोनाल्डो के विशाल कटआउट सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं. वहीं केरल के मलप्पुरम में महीनों पहले से अर्जेंटीना के झंडे और बैनर नजर आने लगते हैं. यही वजह है कि मौजूदा स्थिति फैन्स को और ज्यादा अजीब लग रही है.
आखिर मामला इतना गंभीर कैसे हुआ?
दुनिया का सबसे बड़ा फुटबॉल टूर्नामेंट शुरू होने वाला है, लेकिन महीनों से बहस इस बात पर चल रही है कि भारत में इसे दिखाएगा कौन. आखिर मामला यहां तक पहुंचा कैसे? जो काम सामान्य बिजनेस डील की तरह खत्म होना चाहिए था, वह धीरे-धीरे एक बड़े कॉर्पोरेट ड्रामे में बदल गया. फीफा ने शुरुआत में 2026 और 2030 वर्ल्ड कप भारत में दिखाने के लिए करीब 100 मिलियन डॉलर मांगे. बाद में यह कीमत घटकर लगभग 35 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई. जियोस्टार (JioStar) की करीब 20 मिलियन डॉलर की पेशकश ठुकरा दी गई. सोनी (Sony) ने दिलचस्पी दिखाई, लेकिन औपचारिक बोली नहीं लगाई. टूर्नामेंट के 104 मैचों में सिर्फ 14 मैच भारत में आधी रात से पहले शुरू होंगे. फाइनल भारतीय समयानुसार रात 12.30 बजे शुरू होगा. 2026 वर्ल्ड कप में रिकॉर्ड 48 टीमें और 104 मैच होंगे. 2022 में कतर में आयोजित वर्ल्ड कप में फीफा की कुल ग्लोबल ऑडियंस का लगभग 2.9 प्रतिशत हिस्सा भारत से आया था. तब 110 मिलियन से ज्यादा भारतीय दर्शकों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर टूर्नामेंट देखा था.
विडंबना यह है कि फीफा वर्ल्ड कप पहले से ज्यादा बड़ा हो चुका है. ज्यादा टीमें, ज्यादा मैच और ज्यादा कंटेंट. फिर भी दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश में ब्रॉडकास्टर ढूंढना फीफा के लिए एक बड़ी समस्या बन गया. पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण मैचों का समय माना जा रहा है. ब्रॉडकास्टर्स का तर्क है कि देर रात और सुबह होने वाले मुकाबलों से विज्ञापन राजस्व पर असर पड़ता है. ऊपर से डील में देरी होने की वजह से स्पॉन्सरशिप बेचने के लिए भी बहुत कम समय बचा है. PwC India में मीडिया, एंटरटेनमेंट और स्पोर्ट्स के पार्टनर राजेश सेठी के मुताबिक यह सिर्फ नेगोशिएशन का मसला नहीं, बल्कि साफ बिजनेस इश्यू है. उनका कहना है कि भारत की आबादी बड़ी जरूर है, लेकिन विज्ञापनदाता सिर्फ जनसंख्या नहीं, बल्कि एक्टिव दर्शकों के हिसाब से पैसा लगाते हैं.
राजेश सेठी ने यह भी कहा कि क्रिकेट ने भारत में अपनी कमर्शियल ताकत इसलिए बनाई क्योंकि ब्रॉडकास्टर्स, स्पॉन्सर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स ने दशकों तक उसके इकोसिस्टम में निवेश किया. जबकि फुटबॉल की ग्लोबल संस्थाओं ने भारत को अक्सर सिर्फ कमाई के बाजार की तरह देखा, डेवलपमेंट मार्केट की तरह नहीं. लेकिन फीफा भारत को नजरअंदाज भी नहीं कर सकता. दूसरी तरफ स्पोर्ट्स लॉ एक्सपर्ट आहना मेहरोत्रा का मानना है कि भारत फीफा के लिए बहुत बड़ा बाजार है और उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा. भारत दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश है. यहां मोबाइल इंटरनेट बेहद सस्ता है और डिजिटल दर्शकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. प्रीमियर लीग और ला लीगा जैसी यूरोपीय लीग पहले ही भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत कर चुकी हैं. ट्रॉफी टूर होते हैं, क्लब एक्टिवेशन होते हैं और मेसी के भारत आने की अफवाह तक राष्ट्रीय खबर बन जाती है.
... तो यहां दिखेगा इस बार वर्ल्ड कप
ऐसे में फीफा के लिए यह चिंता की बात जरूर होगी कि भारत जैसे बड़े बाजार में ब्रॉडकास्टर्स की दिलचस्पी कमजोर क्यों पड़ रही है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि चार साल पहले ऐसा संकट क्यों नहीं था. इसका जवाब भारत के बदलते मीडिया मार्केट में छिपा है. पहले वर्ल्ड कप राइट्स के लिए कई कंपनियां बोली लगाती थीं. सोनी ने पुराने एडिशन दिखाए, वायकॉम 18 (Viacom18) ने कतर 2022 के लिए बड़ी रकम खर्च की. लेकिन रिलायंस-डिज्नी मर्जर के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है.
अब जियोस्टार के पास बाजार में ज्यादा ताकत है. सोनी पीछे हट गया और जी ने हाल ही में स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग में वापसी की है. ऐसे में फीफा पहली बार ऐसे बाजार में नेगोशिएट कर रहा था जहां ब्रॉडकास्टर्स पर ज्यादा दबाव नहीं था. अच्छी खबर यह है कि भारतीय फैन्स को शायद अपना वर्ल्ड कप देखने में कोई दिक्कत नहीं होगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक जी जल्द डील फाइनल कर सकता है और सभी 104 मैच टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे.
लेकिन असली असर आगे दिखेगा. अगर फीफा आखिरकार 100 मिलियन डॉलर की बजाय करीब 30 मिलियन डॉलर पर डील करता है, तो यही कीमत भविष्य के फुटबॉल राइट्स की नई शुरुआत बन सकती है. इसका असर बाकी फुटबॉल प्रॉपर्टीज पर भी पड़ेगा. ब्रॉडकास्टर्स आगे चलकर बड़े गारंटी अमाउंट देने की बजाय रेवेन्यू शेयर मॉडल की मांग कर सकते हैं. मिलियन डॉलर की डील पर बहस करने वाले लोग रात 3 बजे उठकर अर्जेंटीना, ब्राजील या फ्रांस के मैच नहीं देख रहे होते. यह काम हमेशा फैन्स करते हैं और अक्सर कीमत भी वही चुकाते हैं.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क