एक आवाज... और वैभव सूर्यवंशी पर अब फैसला टालना मुश्किल

आयरलैंड सीरीज में भारत की हार के बाद 15 साल के वैभव सूर्यवंशी को लेकर बहस और तेज हो गई है. अब इस चर्चा को नया मोड़ तब मिला, जब सुनील गावस्कर ने इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 से ही वैभव को खिलाने की वकालत कर दी.

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गावस्कर की खुली पैरवी... अब वैभव सूर्यवंशी पर नजरें टीम मैनेजमेंट पर. (Photo, Getty) गावस्कर की खुली पैरवी... अब वैभव सूर्यवंशी पर नजरें टीम मैनेजमेंट पर. (Photo, Getty)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:13 AM IST

'अगर इंग्लैंड को पहले ही मैच में शॉक देना है, तो वैभव सूर्यवंशी को खिलाइए.' सुनील गावस्कर के इस एक बयान ने वैभव सूर्यवंशी को लेकर चल रही पूरी बहस का केंद्र बदल दिया है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 15 साल के इस लड़के की बारी कब आएगी. सवाल यह है कि क्या भारतीय टीम मैनेजमेंट अब भी 'प्रोसेस' का हवाला देकर फैसले को टाल सकता है?

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आयरलैंड के खिलाफ लगातार दो हार के बाद हालात बदल चुके हैं. जिस 'प्रोसेस' को अब तक सबसे मजबूत दलील माना जा रहा था, वही अब सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है. अब इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 में सबसे बड़ा सवाल यही होगा- वैभव खेलेंगे या नहीं.

हार ने बदल दिया पूरा समीकरण

सीरीज शुरू होने से पहले टीम मैनेजमेंट के पास मजबूत तर्क था. संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा टी20 विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा थे. उन्होंने अपनी जगह प्रदर्शन से बनाई थी, इसलिए उन्हें शुरुआती मौके मिलना स्वाभाविक था.

अगर भारत आयरलैंड में सीरीज जीत गया होता, तो शायद यह बहस भी इतनी तेज नहीं होती. लेकिन दो हार ने बता दिया कि मौजूदा कॉम्बिनेशन में बदलाव की गुंजाइश है. जब नतीजे नहीं मिल रहे, तो बदलाव पर चर्चा भी लाजिमी है.

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सुनील गावस्कर ने सिर्फ सलाह नहीं दी, दबाव भी बढ़ा दिया.  गावस्कर ने साफ कहा कि वैभव को आयरलैंड के खिलाफ ही मौका मिल जाना चाहिए था. उनके मुताबिक, युवा खिलाड़ी को परखने के लिए वह सबसे सही मंच था. लेकिन उससे भी बड़ा संदेश उन्होंने इंग्लैंड सीरीज के लिए दिया.

गावस्कर की बात इसलिए अहम है, क्योंकि उन्होंने उस सवाल को आवाज दी है, जो अब हर क्रिकेट प्रशंसक के मन में है.

गावस्कर ने कहा कि अब वैभव को पहले ही टी20 में खिलाना होगा. चाहे ओपनिंग कराइए या नंबर-3 पर उतारिए, लेकिन उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर रखने का कोई ठोस कारण नहीं बचा है. उन्होंने तो यहां तक कहा कि अगर भारत इंग्लैंड को पहले मैच में चौंकाना चाहता है, तो वैभव उसका सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकते हैं.

यानी अब यह सिर्फ भविष्य की तैयारी नहीं, वर्तमान की रणनीति का सवाल भी है. यह वैभव बनाम संजू नहीं, चयन नीति की परीक्षा है. इस बहस को वैभव सूर्यवंशी बनाम संजू सैमसन बनाकर देखना आसान है, लेकिन अधूरा भी.

असल सवाल यह है कि क्या भारतीय क्रिकेट सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर चलेगा या फिर मौजूदा फॉर्म, विपक्ष और भविष्य- तीनों को बराबर महत्व देगा?

किसी खिलाड़ी को बाहर बैठाना सजा नहीं होता. कई बार वह टीम की जरूरत होती है. अगर कठिन फैसले लेने से ही बचा जाए, तो प्रतिस्पर्धा का मतलब खत्म हो जाएगा.

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सबसे कठिन फैसला यहीं है

अगर वैभव को खिलाना है, तो किसी को जगह छोड़नी होगी. संजू सैमसन आयरलैंड सीरीज की दो पारियों में 5 और 0 रन ही बना सके. दो पारियां किसी खिलाड़ी का भविष्य तय नहीं करतीं, लेकिन टीम मैनेजमेंट को बदलाव पर विचार करने का आधार जरूर देती हैं.

अगर वैभव उनकी जगह आते हैं, तो यह सैमसन के खिलाफ फैसला नहीं होगा.यह वैभव के पक्ष में फैसला होगा. दोनों बातों में बड़ा फर्क है. सिर्फ खिलाड़ी नहीं, कॉम्बिनेशन भी बचाना होगा.


अगर वैभव सीधे संजू सैमसन की जगह आते हैं, तो टीम का संतुलन नहीं बिगड़ेगा. लेकिन अगर संजू, अभिषेक और वैभव- तीनों को साथ खिलाने की कोशिश हुई, तो बल्लेबाजी और गेंदबाजी के बीच संतुलन साधना मुश्किल हो सकता है.

टी20 क्रिकेट में पांच विशेषज्ञ गेंदबाजों के साथ उतरना अब लगभग अनिवार्य हो चुका है. शिवम दुबे उपयोगी ऑलराउंडर हैं, लेकिन उनसे हर मैच में चार ओवर की उम्मीद नहीं की जा सकती. यानी वैभव को शामिल करने का रास्ता ऐसा होना चाहिए, जिससे बल्लेबाजी भी मजबूत रहे और गेंदबाजी भी कमजोर न पड़े.

'प्रोसेस' की नहीं, फैसले की घड़ी है

भारतीय क्रिकेट के सामने अब सिर्फ एक चयन नहीं, एक संदेश देने का मौका है. क्या वह असाधारण प्रतिभा को सही समय पर पहचानने का साहस रखता है? या फिर 'प्रोसेस' के नाम पर इंतजार को ही नीति बनाए रखेगा?

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सुनील गावस्कर अपना पक्ष साफ कर चुके हैं. अब बारी टीम मैनेजमेंट की है. अगर इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 में भी वैभव सूर्यवंशी डगआउट में बैठे दिखाई दिए, तो बहस सिर्फ उनकी गैरमौजूदगी की नहीं होगी. तब सवाल भारतीय क्रिकेट की चयन-प्रक्रिया का होगा- क्या 'प्रोसेस' कहीं प्रतिभा पर भारी पड़ रही है, या फिर टीम इंडिया सही समय पर बड़ा फैसला लेने से हिचक रही है?

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