डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड प्लान को लेकर दुनिया भर में बहस छिड़ी हुई है. अब ट्रंप ग्रीनलैंड को कैसे लेंगे ये तो समय बताएगा. लेकिन भौगोलिक तौर पर ग्रीनलैंड अमेरिकी महाद्वीप की तरफ खिसक रहा है. ग्रीनलैंड हर साल दो सेंटीमीटर खिसक रहा है. वह भी उत्तर-पश्चिम की तरफ. यानी वो स्थिर नहीं है. गतिशील है.
हाल की एक रिसर्च में पूरे ग्रीनलैंड द्वीप में 58 स्टेशनों से लिए गए अत्यंत सटीक जीपीएस डेटा से पता चला है कि ग्रीनलैंड हर साल लगभग दो सेंटीमीटर साइडवेज खिसक रहा है. यह सामान्य टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से अलग है. वजह है बर्फ की विशाल चादरों का पिघलना. जिससे जमीन पर वजन कम हो रहा है.
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क्लाइमेट चेंज की वजह से बर्फ का वजन कम हो रहा है. यह प्रक्रिया अंतिम हिमयुग से हो रही है. इससे नीचे की चट्टान उछल रही है. इससे द्वीप के कुछ हिस्से बाहर की ओर फैल रहे हैं, जबकि अन्य सिकुड़ रहे हैं, जिससे ग्रीनलैंड का कुल क्षेत्रफल प्रभावी रूप से छोटा हो रहा है.
ग्रीनलैंड में क्या हो रहा है?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है. यहां की बर्फ की मोटी परतें हजारों सालों से जमी हुई हैं, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघल रही हैं. जब बर्फ पिघलती है, तो उसका वजन कम होता है. नीचे की धरती पर दबाव घटता है. चट्टानें ऊपर की ओर उछलती हैं.
इसे हम रिबाउंड कहते हैं. लेकिन यह रिबाउंड हर जगह एक समान नहीं है. कुछ जगहों पर धरती फैल रही है. कुछ जगहों पर सिकुड़ रही है. नतीजा यह है कि पूरा द्वीप सिकुड़ रहा है. साइडवेज खिसक रहा है.
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रिसर्चरों ने जीपीएस स्टेशनों का इस्तेमाल करके इस बदलाव को मापा है. जीपीएस एक ऐसी तकनीक है जो सैटेलाइट्स की मदद से जगहों की सटीक लोकेशन बताती है. इन स्टेशनों से पता चला कि ग्रीनलैंड की धरती हर साल 2 सेंटीमीटर खिसक रही है.
यह बदलाव अंतिम हिमयुग से शुरू हुआ था, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन से और तेज हो गया है. हिमयुग के समय बर्फ का वजन इतना ज्यादा था कि जमीन नीचे दब गई थी. अब बर्फ पिघलने से वह वापस अपनी जगह पर आ रही है, लेकिन असमान तरीके से.
यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है?
यह भूगर्भीय परिवर्तन वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर और जलवायु मॉडलिंग के लिए बड़े प्रभाव डाल सकता है. वैज्ञानिकों को अब नेविगेशन सिस्टम, सैटेलाइट मैपिंग और समुद्र स्तर की वृद्धि के अनुमानों को फिर से कैलिब्रेट करना पड़ेगा, क्योंकि फिक्स्ड रेफरेंस पॉइंट्स खुद ही हिल रहे हैं. उदाहरण के लिए...
लीड रिसर्चर डॉ. दंजल लॉन्गफोर्स बर्ग कहते हैं कि ये छोटे लेकिन मापने योग्य बदलाव बताते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र कितनी तेजी से गर्म हो रहा है. ग्रीनलैंड हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी की ठोस परत भी गर्म होते ग्रह के दूरगामी प्रभावों से सुरक्षित नहीं है.
वैज्ञानिक आधार और स्रोत
यह अध्ययन 2025 में प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है Estimation and Attribution of Horizontal Land Motion Measured by the Greenland GNSS Network. इसे जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: सॉलिड अर्थ में छापा गया है.
रिसर्चरों ने ग्रीनलैंड जीएनएसएस नेटवर्क का इस्तेमाल किया, जो जीपीएस की तरह काम करता है. यह अध्ययन दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन न सिर्फ मौसम को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पृथ्वी की संरचना को भी बदल रहा है.
यह खबर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अगर ग्रीनलैंड जैसी विशाल भूमि बदल रही है, तो पूरी दुनिया पर इसका क्या असर होगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए, वरना ऐसे बदलाव और बढ़ सकते हैं.
ऋचीक मिश्रा