Quote of the Day: महान् लक्ष्य को लेकर चलने वाले पुत्र को, दुराग्रही पिता की कोई परवाह नहीं करनी चाहिए और सब छोड़कर घर से भाग जाना चाहिए- राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन का कहना है कि अगर आपके जीवन का कोई बहुत बड़ा और नेक सपना है, लेकिन आपके पिता अपनी जिद या पुरानी सोच के कारण आपको आगे बढ़ने से रोक रहे हैं, तो आपको उनकी गलत जिद के आगे झुकना नहीं चाहिए. ऐसे में अपने सपने को पूरा करने के लिए अगर घर छोड़ना भी पड़े, तो बिना डरे छोड़ देना चाहिए.
इस बात को हम 3 आसान बिंदुओं में समझ सकते हैं:
सोच का अंतर: कई बार माता-पिता अपनी सोच बच्चों पर थोपने लगते हैं. जब उनका यह बर्ताव आपके बड़े सपनों के रास्ते की रुकावट बन जाए, तो उनका अंधा विरोध करने के बजाय अपने लक्ष्य को चुनना ज़्यादा सही है.
बड़े लक्ष्य के लिए बड़ा कदम: जैसे भगवान बुद्ध ने अगर अपने पिता का महल और परिवार नहीं छोड़ा होता, तो वे कभी बुद्ध नहीं बन पाते. इतिहास गवाह है कि कुछ बड़ा हासिल करने के लिए कभी-कभी मोह-माया और बंधनों को तोड़ना पड़ता है.
यह भागना नहीं, शुरुआत है: जब समझाने के सारे रास्ते बंद हो जाएं, तो चुपचाप घुट-घुट कर जीने से बेहतर है कि आप अपने सपनों के लिए अकेले चल पड़ें. इसे कायरता या घर से भागना नहीं कहते, बल्कि अपने जीवन को सही दिशा में ले जाना कहते हैं.
निष्कर्ष:
एक समझदार संतान का फर्ज सिर्फ माता-पिता की हर बात (चाहे वह गलत ही क्यों न हो) को आंख बंद करके मानना नहीं है. असली कर्तव्य अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाना है. इसलिए जब जिंदगी में कोई बड़ा मकसद सामने हो, तो कमजोर समझौतों की बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ जाना ही सही फैसला होता है.
राहुल सांकृत्यायन के बारे में
राहुल सांकृत्यायन (1893–1963) को हिंदी साहित्य का महापंडित कहा जाता है. वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान और इतिहासकार थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान एक घुमक्कड़ (यायावर) के रूप में है. उन्होंने पूरी दुनिया की यात्रा की और तिब्बत से लेकर रूस तक के दुर्लभ ग्रंथों व ज्ञान को हिंदी जगत के सामने लाए. उनका मानना था कि घूमना या घूमने की प्रवृत्ति ही इंसान की सोच को व्यापक बनाती है और बंधनों से मुक्त करती है.
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